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छोटी होती बदलाव की खबरें?

छोटी होती बदलाव की खबरें?

Newstrack 12 hrs ago

School Dropout in India: हाल ही में 'चिरायु चराइदेव' पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार चराइदेव में प्राथमिक स्तर के ड्रॉपआउट की दर 8.61 प्रतिशत से घटकर अब 4.4 प्रतिशत हो गई है, जबकि माध्यमिक स्तर पर यह दर 25.7 प्रतिशत से घटकर 12.4 प्रतिशत रह गई।

औसत विद्यार्थी उपस्थिति भी 46.41 प्रतिशत से बढ़कर 61.76 प्रतिशत हो गई है। यह सब कुछ अपने आप या अचानक कोई जादू की छड़ी घुमाने से नहीं हुआ है। इस बात पर काम किया गया कि बच्चे आखिर स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं? इसके पीछे नवंबर , 2024 में शुरू किए गए वे प्रयास थे, जिनके तहत सरकारी विभागों, स्कूलों, सेना और सामुदायिक संगठनों ने मिलकर स्कूल ड्रॉपआउट, बाल श्रम, बाल विवाह, मानव तस्करी और नशे जैसी समस्याओं पर काम किया। यानी स्कूलों को सिर्फ पढ़ाई करने की जगह न मानकर बच्चों के सामाजिक जीवन से इसे जोड़ा गया। पिछले छह महीनों में 28 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराने और पिछले तीन महीनों में तीन बाल विवाह रोकने की बात भी कही गई है। अग्निवीर ट्रेनिंग के लिए 873 उम्मीदवारों ने नामांकन कराया। अपने बेहतरीन काम के लिए चिरायु चराइदेव' ने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (जन-प्रशासन) में असम सरकार का 'कर्मश्री अवॉर्ड 2025-26' भी जीता।

उधर फ्रांस में जर्जर स्कूल इमारतों, बड़ी संख्या में शिक्षकों की कमी आदि समस्याओं को लेकर नाराज छात्रों द्वारा प्रदर्शन किया‌ गया। यह प्रदर्शन अब हिंसक आंदोलन के रूप में बदलकर देश के 12 शहरों और कस्बों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। प्रत्येक कक्षा में 35 से 40 छात्रों को बैठाया जाना, जिससे छात्रों को बैठने के लिए पर्याप्त कुर्सियां तक नहीं मिल पा रहीं हैं, दोपहर में भोजनावकाश के लिए मात्र 1 घंटे का समय मिलना, जिससे छात्रों को बगैर भोजन के पढ़ाई करने पड़ती है, जैसे मुद्दे इसमें उठाए गए। 40 स्कूलों में तोड़फोड़ और कुल मिलाकर 27 करोड रुपए से अधिक का नुकसान व 1000 से भी अधिक स्कूलों के प्रभावित होने का अनुमान है। यह बात फ्रांस की थी। जब बात भारत की करते हैं तो स्थिति इससे कहीं अलग दिखाई नहीं देती या यूं कहें कि बदतर ही दिखाई देती है। अधिकतर सरकारी विद्यालय स्वच्छता, जल जमाव, विद्यार्थियों की उपस्थिति, शिक्षकों की कमी, कक्षाओं की बदहाली जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझते दिखाई दे रहे हैं। गांवों में या स्कूलों के आस-पास जल भराव वाली कक्षाओं में सांपों या मेंढकों का निकल आना तो आम बात है।

जब स्कूलों की और उनके विकास की बात होती हैं तो स्कूलों के रंगे-पुते होने, दरवाजे होने, चमकते फर्श, कंप्यूटर लैब। स्मार्ट बोर्ड। स्मार्ट क्लास की और डिजिटल माध्यमों की पर बात नहीं की जाती है।साफ-सुथरे शौचायलयों की, पीने के साफ पानी की उपलब्धता की, शिक्षकों की उपस्थिति की और विद्यार्थियों की घटती संख्या की भी बात नहीं होती है। क्योंकि कभी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को जानने का प्रयास ही नहीं किया जाता है। बात की जाती है स्मार्ट क्लास और तकनीक की।पर स्कूलों की जर्जर स्थिति को सुधारने पर ध्यान नहीं दिया जाता है। बात की जाती है शिक्षकों और संसाधनों की।पर इस बात पर बात नहीं की जाती कि क्यों शिक्षकों को दूसरे सरकारी कार्यों में लगाया जाता है। शिक्षकों के लगातार कक्षा से बाहर रहने, पाठ्यक्रम पूरा न करा पाने की स्थिति में पढ़ाई के प्रभावित होने पर बात क्यों नहीं की जाती? अगर किसी शिक्षक को बार-बार गैर शैक्षणिक जिम्मेदारियों में लगाया जाएगा तो बच्चों के सीखने का समय कौन लौटाएगा? उनके सामने ए.आई. की चर्चा करना कितना सार्थक होगा?

शिक्षक को दोष देना आसान है। लेकिन समस्या सिर्फ शिक्षक की नहीं बल्कि व्यवस्था की भी है। कई शिक्षक बताते हैं कि इतने कम विद्यार्थियों और पढ़ाने के लिए कमरों की कमी के कारण भी बच्चों को अलग-अलग बैठा कर नहीं पढ़ाया जा सकता है। एक ही कमरे में दो से तीन अलग-अलग कक्षा स्तर के विद्यार्थी पढ़ाई करने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि तकनीक की अगली सीढ़ी पर चढ़ने से पहले क्या पहली सीढ़ी मजबूत हो पाई है? कागजों पर गुणवत्ता और संसाधनों की बहाली अलग सवाल है। लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी उपलब्धता और गुणवत्ता अलग। किसी बच्चे के स्कूल में प्रवेश पा जाने, रजिस्टर में नाम लिख जाने, उसे स्कूली पाठ्यक्रम की किताबें मिल जाने, यूनिफॉर्म और मिड डे मील मिल जाने से ही सिर्फ शिक्षा का काम पूरा नहीं हो जाता। बच्चों की स्कूल में उपस्थिति कितनी है? क्या वह डर या माता-पिता के जबरदस्ती भेजने के बजाय जिज्ञासा लेकर स्कूल आता है? क्या वह अपने स्तर की पढ़ाई कर पा रहा है? क्या वह स्कूल से निकलते समय कुछ अधिक समझदार और आत्मविश्वासी हुआ है? जब परीक्षा परिणाम घोषित होते हैं तब स्कूली बच्चों और स्कूलों की वस्तुस्थिति का पता चलता है। हमारे पास उनका मूल्यांकन करने का पैमाना उनका परीक्षा परिणाम होता है पर सवाल इससे कहीं अधिक बड़ा निकल कर आता है। वह है कि इन सब पर ध्यान देने के बावजूद स्कूलों से ड्रॉपआउट का प्रतिशत क्यों बढ़ रहा? गरीबी, स्कूलों से उनकी दूरी, आर्थिक-भाषाई समस्या, खराब रास्ते की समस्या, पढ़ाई के प्रति घटता आकर्षण जैसे बहुत सारे कारण हो सकते हैं। आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर माध्यमिक ड्रॉपआउट दर 11.5 प्रतिशत है।

चूंकि हर बच्चे की कहानी अलग होती है। लेकिन इतना जरूर है कि स्कूल छोड़ना केवल एक बच्चे का स्कूल छोड़ना ही नहीं होता है, वह उसके भविष्य के अवसरों, रोजगार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक भागीदारी सब पर अपना असर डालता है। किसी भी बच्चों के स्कूल छोड़ देने की खबर कभी खबर नहीं बनती, न ही बन सकती है। इस तरह की खबरें अधिकतर आंकड़े ही बन कर रह जातीं हैं।

बचपन में बच्चा स्कूल आता है क्योंकि माता-पिता भेजते हैं। किशोरावस्था में उसे स्कूल में टिकाए रखने के लिए स्कूल को उसकी दुनिया समझनी पड़ती है, उसकी समस्याओं को भी उसके साथ समझना पड़ता है। उसे सिर्फ किताब नहीं चाहिए। उसे पढ़ाई में उसका भविष्य भी दिखाई देना चाहिए। स्कूलों की बदहाल स्थिति के बीच हम हमेशा समस्या पर बात करते हैं, समाधान पर क्यों नहीं?

जब किसी बच्चे को स्कूल वापस लाया जाता है तो उस बदलाव की खबर इतनी छोटी क्यों होती है? 'चिरायु चराइदेव' पहल भले ही एक छोटी सी खबर हो पर इस सकारात्मक खबर को महत्व मिलना चाहिए, चर्चा मिलनी चाहिए। एक समय उग्रवाद और सामाजिक चुनौतियों से प्रभावित रहे चराइदेव में इस तरह का सकारात्मक बदलाव बहुत सुखदायक है। 'चिरायु चराइदेव' जैसी पहल को आगे जरुर बढ़ाना चाहिए, हर कस्बे में, हर गांव में, हर राज्य में।

शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता तब होगी, जब हम हर उस अधूरी कहानी को स्कूल की किताब में नहीं, जीवन की नई शुरुआत में बदल सकें।

(लेखिका प्रतिष्ठित स्तंभकार हैं।)

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