Dailyhunt
दीदी का अहंकार, भतीजे की बेइज्जती...अभी तो और गहरे जख्म देगी BJP, जानिए कैसे मिट जाएगा TMC का नामोनि

दीदी का अहंकार, भतीजे की बेइज्जती...अभी तो और गहरे जख्म देगी BJP, जानिए कैसे मिट जाएगा TMC का नामोनि

Newstrack 1 week ago

Bengal election result 2026 BJP win: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े किलों में से एक को ढहा दिया है। ममता बनर्जी, जिन्हें कभी बंगाल की राजनीति की 'अजेय योद्धा' माना जाता था, आज सत्ता से बेदखल हो चुकी हैं।

एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणियां सच साबित हुईं और बंगाल की जनता ने बीजेपी के 'सोनार बांग्ला' के वादे पर भरोसा जताते हुए ममता सरकार के 15 साल के शासन का अंत कर दिया। यह हार सिर्फ एक सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के उस कुशासन, तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश है, जिसने बंगाल की जड़ों को खोखला कर दिया था। अब हालात यह हैं कि कल तक जो लोग ममता के गुणगान करते नहीं थकते थे, आज वे ही उन्हें हार के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

जनता का टूटा भरोसा: मुफ्त की योजनाएं भी न बचा सकीं किला

ममता बनर्जी को पूरा भरोसा था कि उनकी 95 से अधिक जनकल्याणकारी योजनाएं और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी वित्तीय सहायता उन्हें सत्ता की कुर्सी तक वापस ले आएंगी। उन्हें लगा था कि जिस तरह अन्य राज्यों में मुफ्त की योजनाओं ने चुनाव जिताए, वैसे ही बंगाल में भी होगा। लेकिन बंगाल की जनता ने बुद्धिमता का परिचय देते हुए यह साफ कर दिया कि केवल प्रलोभन से पेट तो भरा जा सकता है, पर सम्मान और सुरक्षा नहीं खरीदी जा सकती। करोड़ों लाभार्थियों के होने के बावजूद टीएमसी की यह दुर्गति बताती है कि जनता के मन पर जो चोट भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज ने पहुंचाई थी, उस पर ममता की कोई भी योजना मरहम नहीं लगा सकी।

भतीजे का 'अभिषेक' पड़ा भारी: भ्रष्टाचार बना पतन का कारण

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी की इस ऐतिहासिक हार के पीछे अभिषेक बनर्जी एक बड़ी वजह रहे हैं। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे अभिषेक खुद को राज्य का भावी मुख्यमंत्री मानने लगे थे। बंगाल की जनता को यह स्पष्ट दिखने लगा था कि यदि आज 'भतीजे' की हैसियत से अभिषेक का इतना जलवा और दखल है, तो मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य का क्या हाल होगा। जनता ने 'भाईपो' (भतीजा) के भ्रष्टाचार और उनके अहंकार को सिरे से नकार दिया। लोगों को लगा कि ममता बनर्जी के बाद बंगाल की कमान एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में जाना घातक होगा, जो केवल सत्ता के सुख के लिए राजनीति में है।

तुष्टिकरण और नौकरी का संकट: नाराजगी की लंबी फेहरिस्त

ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी नाराजगी पैदा कर दी थी। इसके अलावा, राज्य में 'कैश फॉर जॉब' यानी पैसे लेकर नौकरी देने के घोटाले ने मध्यम वर्ग और युवाओं को सड़क पर ला खड़ा किया। हजारों युवाओं की मेहनत पर जब भ्रष्टाचार का साया पड़ा और कोर्ट के आदेश के बाद नौकरियां गईं, तो जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। सरकारी कर्मचारी भी 7वें वेतन आयोग और महंगाई भत्ते (DA) को लेकर लंबे समय से आंदोलनरत थे। इन तमाम कारकों ने मिलकर एक ऐसी सुनामी पैदा की, जिसमें टीएमसी का तिनका-तिनका बिखर गया।

SIR बना विपक्ष की 'पनौती': ममता की हर कोशिश हुई नाकाम

गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) इस चुनाव में टीएमसी के लिए सबसे बड़ी मुसीबत साबित हुआ। चुनाव आयोग ने जब मतदाता सूची से घुसपैठियों और फर्जी नामों को हटाने का प्रयास किया, तो ममता बनर्जी इसके खिलाफ ढाल बनकर खड़ी हो गईं। वे सड़क पर उतरीं, खुद वकील बनकर अदालत में पैरवी की, लेकिन उन्हें हर जगह हार का सामना करना पड़ा। जनता मूकदर्शक बनकर देख रही थी कि कैसे सरकार घुसपैठियों के बचाव में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। मतदान के दिन जनता ने इसी मुद्दे पर अपनी नाराजगी का इजहार किया और उन 'वोट बैंक' की राजनीति को खारिज कर दिया जो अवैध प्रवासियों के दम पर सत्ता चाहती थी।

बिखरती पार्टी और धुंधला भविष्य: क्या खत्म हो जाएगा टीएमसी का अस्तित्व?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सत्ता जाने के बाद टीएमसी का भविष्य क्या होगा? टीएमसी, वामदलों की तरह कैडर आधारित पार्टी नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से सत्ता और व्यक्तिगत करिश्मे पर टिकी हुई है। इतिहास गवाह है कि ऐसी पार्टियां सत्ता से दूर होते ही ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती हैं। बीजेपी की जीत के साथ ही राज्य में हवा का रुख बदल चुका है। टीएमसी के जो समर्थक कल तक ममता के एक इशारे पर हिंसा करने को तैयार रहते थे, आज वे विजय जुलूसों में शामिल हो रहे हैं और क्लबों के बोर्ड बदले जा रहे हैं।

एक नए युग का सूत्रपात

बीजेपी ने बंगाल में ममता का 'खेला' पूरी तरह शेष कर दिया है। इस जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं में उत्तेजना के बजाय एक गहरा धैर्य दिख रहा है, जो यह संकेत देता है कि पार्टी की जड़ें अब जनता के बीच बहुत गहरी हो चुकी हैं। ममता बनर्जी ने उन रास्तों को चुना जिन्हें जनता नापसंद करती थी, और आज नतीजा सबके सामने है। बंगाल अब एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा है, जहां घुसपैठियों के बजाय नागरिकों के हितों की बात होगी और 'भतीजावाद' के बजाय योग्यता को सम्मान मिलेगा। टीएमसी के लिए यह हार एक ऐसा गहरा जख्म है, जिससे उबरना उसके लिए नामुमकिन लग रहा है।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Newstrack Journalism Hindi