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एकलव्य - अंगूठा, अन्याय और पाठ-सत्य

एकलव्य - अंगूठा, अन्याय और पाठ-सत्य

Newstrack 2 days ago

Eklavya Story: महाभारत के आदिपर्व (विशेषतः संभवपर्व) में वर्णित एकलव्य का प्रसंग भारतीय बौद्धिक इतिहास का वह अध्याय है, जिसे सबसे अधिक उद्धृत किया गया है और साथ ही सबसे अधिक सरलीकृत और राजनीतिकृत भी किया गया है।

आधुनिक विमर्श में एकलव्य को लगभग सर्वसम्मति से 'अन्याय का शिकार', 'प्रतिभा का दमन' और 'सामाजिक उत्पीड़न का प्रतीक' घोषित कर दिया गया है। किंतु जब इस कथा को शास्त्रीय पाठ, उसकी भाषा और उसके सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में पढ़ा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि एकलव्य का प्रसंग न तो केवल जातीय उत्पीड़न की कथा है और न ही केवल गुरु-अत्याचार की। यह शिक्षा, सत्ता, प्रतिज्ञा और 'धर्म' के बीच टकराव की एक जटिल कथा है।

महाभारत के संस्कृत मूल पाठ में एकलव्य का परिचय अत्यंत संक्षिप्त किंतु निर्णायक है। उसे 'निषादपुत्र' कहा गया है और उसके पिता हिरण्यधनु को 'निषादराज' अथवा 'निषादाधिपति' के रूप में वर्णित किया गया है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि 'निषादराज' का अर्थ किसी क्षत्रिय राज्य के अधीन कार्यरत अधिकारी नहीं बल्कि निषाद समुदाय का स्वतंत्र प्रमुख है। महाभारत में प्रशासनिक पदों के लिए 'सेनानी', 'बलाध्यक्ष', 'अमात्य' जैसे विशिष्ट शब्द प्रयुक्त होते हैं। हिरण्यधनु के लिए ऐसा कोई शब्द नहीं मिलता। न संस्कृत मूल पाठ में, न नीलकंठ चतुर्धर की टीकाओं में और न ही पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा संपादित Critical Edition में। अतः यह दावा कि 'एकलव्य के पिता किसी राजा के सेनापति थे'-शास्त्रीय नहीं, बल्कि आधुनिक पुनर्पाठ की उपज है।

यह भ्रम इस कारण भी पैदा हुआ कि आधुनिक पाठक 'राजा' शब्द को एक केंद्रीकृत क्षत्रिय सत्ता से जोड़कर देखता है। जबकि महाभारतकालीन भारत में अनेक जनजातीय, सीमांत और वनवासी समुदाय भी अपने-अपने 'राजा' रखते थे। निषाद समुदाय भी ऐसा ही एक स्वतंत्र, युद्ध-परंपरा वाला समाज था। एकलव्य किसी दरबारी या हाशिये के सेवक का पुत्र नहीं। बल्कि एक स्वायत्त समुदाय के प्रमुख का पुत्र था। यह तथ्य उसके सामाजिक स्थान को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

एकलव्य द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या सीखने जाता है, किंतु द्रोण उसे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं करते। महाभारत का पाठ इस अस्वीकार को जाति-आधारित निषेध के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। द्रोण का कारण स्पष्ट है-वे कुरु राजकुमारों को शस्त्रविद्या सिखाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का व्रत ले चुके हैं। द्रोण केवल शिक्षक नहीं बल्कि राजकीय आचार्य हैं। उनकी निष्ठा शिक्षा से अधिक सत्ता-संरचना और उत्तराधिकार की राजनीति से जुड़ी है। यह आधुनिक नैतिक दृष्टि से आलोचनीय हो सकता है, किंतु शास्त्रीय पाठ में इसे 'राजधर्म' और 'गुरु-प्रतिज्ञा' के अंतर्गत रखा गया है।

इसके बाद महाभारत एकलव्य को अत्यंत गरिमामय रूप में प्रस्तुत करता है। वह वन में जाकर द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा बनाता है और कठोर साधना से धनुर्विद्या में असाधारण निपुणता प्राप्त करता है। यहाँ ग्रंथ एकलव्य को कभी हीन या अयोग्य नहीं कहता। उलटे उसकी प्रतिभा इतनी प्रखर दिखाई जाती है कि स्वयं अर्जुन को असुरक्षा का अनुभव होता है। यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शास्त्र एकलव्य की क्षमता को स्वीकार करता है-वह अस्वीकार नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा का विषय है।

अंगूठा माँगे जाने की घटना इसी संदर्भ में आती है। द्रोण, अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए, एकलव्य से गुरु-दक्षिणा के रूप में उसका दायाँ अंगूठा माँगते हैं। एकलव्य बिना किसी प्रतिरोध के उसे काटकर दे देता है। आधुनिक चेतना इसे अन्याय का चरम बिंदु मानती है-और यह दृष्टि गलत नहीं है। किंतु महाभारत का पाठ इस क्षण को किसी स्पष्ट अपराध-घोषणा की तरह प्रस्तुत नहीं करता। यहाँ एक नैतिक संकट है, जिसमें द्रोण, अर्जुन और एकलव्य-तीनों अपने-अपने धर्म के भीतर कार्य कर रहे हैं। यही महाभारत की विशेषता है-वह किसी को पूर्ण दोषी या पूर्ण निर्दोष घोषित नहीं करता।

आधुनिक विमर्श में एकलव्य को प्रायः 'दलित नायक' या 'आदिवासी प्रतिरोध का प्रतीक' कहा जाता है। किंतु यह भी एक प्रकार का काल-प्रक्षेप है। महाभारतकालीन 'निषाद' आज के जातीय वर्गीकरण से सीधे मेल नहीं खाते। वे न तो अस्पृश्य थे, न दास। वे स्वतंत्र, शस्त्रधारी और संगठित समुदाय थे। एकलव्य की समस्या उसकी जाति से अधिक सत्ता-संरचना और राजकीय प्राथमिकताओं से जुड़ी है। उसे हटाया इसलिए गया, क्योंकि वह अर्जुन के लिए खतरा बन सकता था।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि महाभारत एकलव्य को केवल पीड़ित बनाकर नहीं छोड़ देता। उत्तरकालीन परंपराओं में वह शक्तिशाली शासक बनता है और युद्धों में सक्रिय भूमिका निभाता है। अर्थात् उसकी कथा 'नष्ट कर दी गई प्रतिभा' की नहीं। बल्कि 'वंचना के बावजूद अस्तित्व' की है। लोक-स्मृति और आधुनिक राजनीति ने उसके जीवन को एक क्षण-'अंगूठा'-में सीमित कर दिया, जबकि शास्त्र उसे एक पूर्ण, सक्षम और गरिमामय पात्र के रूप में रखता है।

निष्कर्षतः, एकलव्य का प्रसंग निस्संदेह पीड़ा और अन्याय का प्रतीक है। किंतु उसे केवल जातीय उत्पीड़न की सरल कथा बना देना शास्त्रीय पाठ के साथ अन्याय होगा। यह कथा शिक्षा, सत्ता, गुरु-प्रतिज्ञा और नैतिक प्राथमिकताओं के जटिल संघर्ष को उजागर करती है। 'मिथक' एकलव्य को केवल पीड़ित बनाता है। 'शास्त्र' उसे महान, सक्षम और त्रासद बनाता है। सत्य इन दोनों के बीच है-और वही महाभारत की आत्मा है।

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( संदर्भ-महाभारत; आदिपर्व - संभवपर्व, संस्कृत मूल पाठ, The Mahābhārata - Critical Edition-Editor: V. S. Sukthankar et al.Publisher: Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI), Pune-विशेषतः Ādiparva, Sambhava Parva), नीलकंठ चतुर्धर-भारतभावदीप - महाभारत पर प्राचीन संस्कृत टीका, एकलव्य-प्रसंग संबंधी भाष्य, शंकरानंद, रामानुजाचार्य परंपरा के टीकात्मक संदर्भ- जहाँ एकलव्य-प्रसंग पर संकेतात्मक विवेचन मिलता है, महाभारत की अन्य प्राचीन टीकाएँ- जाति, राजधर्म और गुरु-शिष्य संबंधों के संदर्भ में, Alf Hiltebeitel-Rethinking the Mahābhārata, University of Chicago Press, Irawati Karve-Yuganta: The End of an Epoch, एकलव्य, द्रोण और अर्जुन के नैतिक द्वंद्व पर विश्लेषण, Romila Thapar-The Past Before Us, प्राचीन भारतीय समाज, जनजातीय सत्ता और मिथक-इतिहास संबंध, D. D. Kosambi Myth and Reality-महाभारत के मिथकीय पात्रों का सामाजिक पुनर्पाठ, R. S. Sharma- Śūdras in Ancient India-प्राचीन सामाजिक संरचना और आधुनिक जाति-प्रक्षेप की आलोचना, Romila Thapar-Early India: From the Origins to AD 1300; जनजातीय समाज, निषाद समुदाय और स्थानीय सत्ता संरचनाएँ, Upinder Singh-A History of Ancient and Early Medieval India, राजधर्म, शिक्षा और शक्ति-संतुलन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, आधुनिक सामाजिक-न्याय विमर्श में एकलव्य पर प्रकाशित शोध-लेख; जाति, शिक्षा और प्रतीकात्मक अन्याय के संदर्भ में - interpretative, न कि शास्त्रीय स्रोत)

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