इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला के नाम पर दुष्कर्म के आरोपों से जुड़े एक अहम मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिगों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाला पॉक्सो (POCSO) कानून किसी भी पर्सनल लॉ से ऊपर है और किसी भी धार्मिक या व्यक्तिगत कानून का इस्तेमाल ऐसे मामलों में बचाव के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी नाबालिग लड़की के साथ निकाह हलाला के नाम पर यौन संबंध बनाए जाते हैं, तो उस पर POCSO Act के प्रावधान पूरी तरह लागू होंगे, भले ही बाद में महिला अपने पूर्व पति से दोबारा विवाह करना चाहती हो।
क्या है मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के सैदनगली थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने नौ लोगों पर आरोप लगाया है कि वर्ष 2016 में, जब वह नाबालिग थी, निकाह हलाला की प्रक्रिया के दौरान उसके साथ दुष्कर्म किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि वर्ष 2025 में तथाकथित "डबल हलाला" के दौरान उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) किया गया। एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS), मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 तथा POCSO Act की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि वर्ष 2016 में शरिया कानून के तहत ट्रिपल तलाक को मान्यता प्राप्त थी और निकाह हलाला एक वैध धार्मिक प्रथा थी। यह भी कहा गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार नाबालिग की शादी शून्य (Void) नहीं बल्कि रद्द करने योग्य (Voidable) होती है और शिकायतकर्ता ने बालिग होने के बाद निर्धारित अवधि में विवाह को चुनौती नहीं दी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
खंडपीठ ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को किसी भी धार्मिक प्रथा या पर्सनल लॉ के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने 'Independent Thought बनाम Union of India' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ यौन संबंध, विवाह के आधार पर भी कानून से संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद-2 में भी इसी सिद्धांत को शामिल किया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि नाबालिगों के मामलों में POCSO कानून को प्राथमिकता दी जाएगी।
निकाह हलाला क्या है?
निकाह हलाला इस्लामी वैवाहिक व्यवस्था से जुड़ी एक प्रथा है, जिसके अनुसार यदि किसी महिला को उसके पति ने तलाक दे दिया हो और वह उसी पति से दोबारा विवाह करना चाहती हो, तो कुछ परिस्थितियों में पहले किसी अन्य पुरुष से वैध विवाह, वैवाहिक संबंध और उसके बाद वैधानिक रूप से उस विवाह के समाप्त होने की प्रक्रिया के बाद ही पूर्व पति से पुनर्विवाह संभव माना जाता है। इस प्रथा को लेकर देश में लंबे समय से कानूनी और सामाजिक बहस जारी है।

