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Hapur News: कैंटर बेचने के बाद एफआईआर के नाम पर मांगे एक लाख रुपये, वापस मांगने पर पिस्टल से धमकाया

Hapur News: कैंटर बेचने के बाद एफआईआर के नाम पर मांगे एक लाख रुपये, वापस मांगने पर पिस्टल से धमकाया

Newstrack 4 days ago

Roman Gladiator History: कल्पना कीजिए प्राचीन रोम की। एक विशाल अखाड़ा, हजारों दर्शकों का शोर, तलवारों की चमक और बीच मैदान में दो योद्धा आमने-सामने खड़े हैं। आधुनिक फिल्मों ने हमें अक्सर यही तस्वीर दिखाई है कि दोनों गुलाम हैं और लड़ाई तब तक चलेगी, जब तक उनमें से एक मर न जाए।

लेकिन असली इतिहास इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प और जटिल है। रोमन ग्लैडिएटरों में बहुत से लोग वास्तव में गुलाम, युद्धबंदी या अपराधी थे, लेकिन हर ग्लैडिएटर गुलाम नहीं था। कुछ स्वतंत्र नागरिक भी पैसे, प्रसिद्धि और रोमांच के लिए स्वेच्छा से इस पेशे में आते थे। और सबसे बड़ा मिथक यह है कि हर मुकाबला मौत तक चलता था। ऐसा नहीं था। मौत हमेशा एक वास्तविक खतरा जरूर थी, लेकिन एक प्रशिक्षित ग्लैडिएटर को हर बार मरवा देना आयोजकों के लिए भी घाटे का सौदा था।

रोमन ग्लैडिएटर आखिर कौन थे? वे कैसे रहते थे? क्या सचमुच दर्शक अंगूठा नीचे करके उनकी मौत का फैसला करते थे? और क्या स्पार्टाकस जैसा हर ग्लैडिएटर आजादी के लिए लड़ता था? रोमन अखाड़े की असली कहानी फिल्मों से कहीं ज्यादा क्रूर, लेकिन कहीं ज्यादा जटिल है।

ग्लैडिएटर शब्द कहाँ से आया?

ग्लैडिएटर शब्द लैटिन भाषा के 'gladius' से बना है, जिसका अर्थ रोमन तलवार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर ग्लैडिएटर सिर्फ तलवार लेकर लड़ता था। रोम में ग्लैडिएटर अलग-अलग प्रकार के प्रशिक्षित योद्धा होते थे। किसी के पास बड़ी ढाल और तलवार होती थी, किसी के पास भाला, किसी के पास जाल और त्रिशूल। हर योद्धा की एक अलग लड़ाई शैली होती थी और मुकाबले अक्सर इस तरह तैयार किए जाते थे कि दो अलग प्रकार के लड़ाकों के बीच रोमांचक टक्कर हो। इन सार्वजनिक खेलों को 'munera' कहा जाता था। ग्लैडिएटर मुकाबलों की शुरुआत शायद मृतकों के सम्मान में होने वाले रक्तपूर्ण अनुष्ठानों से हुई थी। रोमन इतिहासकार लिवी ने 264 ईसा पूर्व में रोम में हुए एक आयोजन का उल्लेख किया है, जिसमें एक मृत व्यक्ति के सम्मान में तीन जोड़ी लड़ाकों को भिड़ाया गया था। धीरे-धीरे यह परंपरा बदल गई। जो कभी अंतिम संस्कार से जुड़ा सीमित आयोजन था, वह बाद में रोम के सबसे बड़े सार्वजनिक मनोरंजनों में शामिल हो गया।

राजनीति ने ग्लैडिएटरों को सुपरस्टार बना दिया

रोम के धनी और शक्तिशाली लोगों ने जल्दी समझ लिया कि जनता को बड़े खेल दिखाना राजनीतिक रूप से फायदेमंद है। विशाल आयोजन कराने वाला नेता लोकप्रिय हो सकता था। चुनावी समर्थन मिल सकता था। जनता को यह दिखाया जा सकता था कि वह कितना उदार और शक्तिशाली है। गणराज्य के अंतिम दौर में ऐसे खेल तेजी से बड़े होते गए। बाद में रोमन सम्राटों ने इन्हें सत्ता के प्रदर्शन का हिस्सा बना लिया। अखाड़े में केवल मनोरंजन नहीं हो रहा था। वहां रोम अपनी ताकत दिखा रहा था। सम्राट हजारों लोगों के सामने यह संदेश दे सकता था कि विशाल साम्राज्य, दूर देशों के जानवर, प्रशिक्षित योद्धा और जीवन-मृत्यु की व्यवस्था सब रोमन सत्ता के नियंत्रण में हैं।

कोलोसियम सिर्फ खेल का मैदान नहीं था

रोम का सबसे प्रसिद्ध अखाड़ा फ्लेवियन एम्फीथिएटर था, जिसे आज दुनिया 'कोलोसियम'' के नाम से जानती है। इसका निर्माण सम्राट वेस्पासियन के समय शुरू हुआ और 80 ईस्वी में उसके पुत्र टाइटस के शासनकाल में इसका उद्घाटन हुआ। यहां केवल ग्लैडिएटर मुकाबले नहीं होते थे। जंगली जानवरों का शिकार, सार्वजनिक दंड और दूसरे प्रकार के प्रदर्शन भी होते थे। दसियों हजार लोग इसे देख सकते थे। लेकिन कोलोसियम सिर्फ मनोरंजन की जगह नहीं था। उसमें रोमन समाज की पूरी व्यवस्था दिखाई देती थी। कौन कहां बैठेगा, कौन खेल आयोजित करेगा, किसके पास शक्ति है और कौन अखाड़े में अपनी जान जोखिम में डालेगा, सब कुछ सामाजिक श्रेणी से जुड़ा था।

क्या सभी ग्लैडिएटर गुलाम थे?

बहुत से ग्लैडिएटर गुलाम थे। युद्धों में पकड़े गए लोग, खरीदे गए दास और कुछ अपराधी इस व्यवस्था का हिस्सा बनते थे। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। हर व्यक्ति जिसे रोमन अखाड़े में मरने के लिए भेजा जाता था, ग्लैडिएटर नहीं था। कुछ अपराधियों को जंगली जानवरों के सामने फेंक दिया जाता था। इसे 'damnatio ad bestias' कहा जाता था। ऐसे लोग अक्सर प्रशिक्षित पेशेवर योद्धा नहीं होते थे। कुछ लोगों को सार्वजनिक दंड के तहत मौत दी जाती थी। ग्लैडिएटर एक अलग श्रेणी था, वह आम तौर पर प्रशिक्षित लड़ाका होता था। और कुछ ग्लैडिएटर स्वतंत्र नागरिक भी थे। इन्हें 'auctorati' कहा जाता था।

कोई स्वतंत्र व्यक्ति ग्लैडिएटर क्यों बनना चाहता था?

आज यह अजीब लग सकता है कि कोई स्वतंत्र व्यक्ति स्वेच्छा से ऐसे पेशे में जाए जहां गंभीर चोट या मौत का खतरा हो। लेकिन कारण बहुत परिचित थे - पैसा, प्रसिद्धि, कर्ज से निकलने की उम्मीद और लोकप्रियता। सफल ग्लैडिएटर रोम के बड़े सितारे बन सकते थे। उनके नाम दीवारों पर लिखे जाते थे। उनकी तस्वीरें रोजमर्रा की वस्तुओं पर दिखाई जा सकती थीं। कुछ ग्लैडिएटरों के प्रशंसक इतने उत्साही थे कि आधुनिक खेल सितारों की लोकप्रियता से तुलना की जा सकती है। लेकिन इसके बदले स्वतंत्र व्यक्ति को भारी कीमत चुकानी पड़ती थी। उसे एक कठोर शपथ लेनी होती थी और कुछ समय के लिए अपने शरीर तथा जीवन पर सामान्य नागरिक जैसी स्वतंत्रता छोड़नी पड़ सकती थी। यही रोमन ग्लैडिएटर का सबसे बड़ा विरोधाभास था। वह समाज की नजर में नीचे हो सकता था, लेकिन जनता की नजर में हीरो।

तिरस्कृत भी, लोकप्रिय भी

रोमन समाज में ग्लैडिएटर होना बहुत सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। ग्लैडिएटरों को 'infamia' जैसी सामाजिक-कानूनी हीनता से जोड़ा जा सकता था। एक सम्मानित रोमन नागरिक के लिए सार्वजनिक मंच पर अपने शरीर को हिंसक प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करना आदर्श नहीं था। लेकिन जनता की नजर में मामला अलग था। अखाड़े में साहस, ताकत और मौत का सामना करने की क्षमता लोगों को आकर्षित करती थी। यानी एक ग्लैडिएटर सामाजिक रूप से निम्न समझा जा सकता था और उसी समय जनता का सुपरस्टार भी हो सकता था। पोम्पेई जैसी जगहों पर मिले भित्तिलेखों से भी पता चलता है कि कुछ ग्लैडिएटर बेहद लोकप्रिय थे और महिलाओं के बीच उनकी खास प्रशंसा थी।

सीधे तलवार पकड़ाकर अखाड़े में नहीं भेजा जाता था

फिल्मों में अक्सर लगता है कि किसी गुलाम को पकड़कर तलवार दे दी गई और कहा गया - अब लड़ो। असल व्यवस्था अलग थी। ग्लैडिएटरों को 'ludus' नाम के प्रशिक्षण विद्यालयों में रखा और प्रशिक्षित किया जाता था। इन विद्यालयों का संचालक 'lanista' कहलाता था। ग्लैडिएटरों को खरीदा जाता था, खिलाया जाता था, प्रशिक्षित किया जाता था और आयोजनों के लिए उपलब्ध कराया जाता था। रोम में कोलोसियम के पास प्रसिद्ध 'Ludus Magnus' था, जहां ग्लैडिएटरों का प्रशिक्षण होता था। वे लकड़ी के हथियारों से अभ्यास करते थे। हमला कैसे करना है, बचाव कैसे करना है, कितनी दूरी रखनी है और अपनी विशेष युद्ध शैली का इस्तेमाल कैसे करना है, इन सबकी ट्रेनिंग दी जाती थी। यानी ग्लैडिएटर केवल हिंसा के लिए फेंका गया व्यक्ति नहीं था। वह एक विशेष प्रकार का पेशेवर लड़ाका था।

हर ग्लैडिएटर एक जैसा नहीं लड़ता था

रोमन दर्शकों को अलग-अलग लड़ाई शैलियां पसंद थीं। Murmillo आम तौर पर भारी कवच, बड़ी ढाल और तलवार वाला लड़ाका होता था। Thraex या थ्रेसियन शैली के ग्लैडिएटर के पास अलग तरह की छोटी ढाल और मुड़ी हुई तलवार हो सकती थी। Hoplomachus भाले और छोटी ढाल के साथ लड़ सकता था। लेकिन सबसे दिलचस्प जोड़ियों में एक थी Secutor और Retiarius की। Retiarius के पास जाल, त्रिशूल और खंजर होता था। वह अपेक्षाकृत हल्का लड़ाका था। उसका विरोधी Secutor भारी कवच और तलवार के साथ लड़ता था। Retiarius दूरी बनाए रखकर जाल से विरोधी को फंसाने की कोशिश करता था। Secutor को उसके पास पहुंचना होता था। यानी मुकाबला केवल ताकत का नहीं था। उसमें रणनीति, गति और हथियारों की विशेषता भी शामिल थी।

क्या हर मुकाबला मौत तक चलता था?

यही ग्लैडिएटरों के बारे में सबसे बड़ा मिथक है। मौत निश्चित रूप से संभव थी। कुछ मुकाबलों में ग्लैडिएटर मारे जाते थे। रोमन समाज में यह सार्वजनिक मनोरंजन की व्यवस्था का स्वीकार्य हिस्सा था। लेकिन हर मुकाबले का नियम यह नहीं था कि एक व्यक्ति को जरूर मरना है। यदि कोई ग्लैडिएटर गंभीर रूप से घायल हो जाता या आगे लड़ने में असमर्थ होता, तो मुकाबला समाप्त हो सकता था। पराजित लड़ाका दया की मांग कर सकता था। उसे 'missio', यानी जीवनदान, मिल सकता था। यदि उसने बहादुरी से लड़ाई लड़ी हो, तो पराजित होने के बावजूद उसे जीवित छोड़ा जा सकता था। कुछ मुकाबलों में दोनों योद्धाओं के शानदार प्रदर्शन पर दोनों को बचाया भी जा सकता था। इसका एक बहुत व्यावहारिक कारण भी था।

हर मुकाबले में ग्लैडिएटर को मारना महंगा सौदा था क्योंकि एक अच्छा ग्लैडिएटर सस्ता नहीं था। उसे खरीदने में पैसा लगता था। उसका भोजन, प्रशिक्षण और चिकित्सा महंगी होती थी। वह एक प्रशिक्षित और मूल्यवान लड़ाका था। यदि किसी आयोजक ने हर खेल में आधे ग्लैडिएटर मरवा दिए, तो अगले आयोजन के लिए नए लड़ाके तैयार करने में भारी खर्च होता। इसलिए अच्छे लड़ाके को बचाने में आर्थिक हित भी था। इसका मतलब यह नहीं कि रोमन खेल दयालु थे। वे बिल्कुल नहीं थे। लेकिन वे फिल्मों में दिखाई जाने वाली ऐसी व्यवस्था भी नहीं थे जिसमें हर मुकाबले के बाद निश्चित रूप से एक लाश उठाई जाती हो।

क्या सचमुच अंगूठा नीचे करने का मतलब मौत था?

आधुनिक दुनिया में हम लगभग निश्चित मानते हैं - अंगूठा ऊपर = जीवन, अंगूठा नीचे = मौत

लेकिन प्राचीन रोम के बारे में यह व्यवस्था इतनी साफ साबित नहीं है। प्राचीन स्रोत 'pollice verso' यानी अंगूठे के किसी विशेष संकेत का उल्लेख करते हैं, लेकिन अंगूठा किस दिशा में था और उसका सही अर्थ क्या था, इस पर इतिहासकार पूरी तरह सहमत नहीं हैं। संभव है कि बाहर निकला हुआ अंगूठा तलवार या हथियार निकालने का प्रतीक रहा हो और अंगूठा छिपाना तलवार म्यान में रखने का संकेत। आज की लोकप्रिय thumbs up और thumbs down वाली तस्वीर काफी हद तक बाद की कला और फिल्मों से मजबूत हुई। उन्नीसवीं शताब्दी की प्रसिद्ध पेंटिंग 'Pollice Verso' ने भी आधुनिक कल्पना को बहुत प्रभावित किया। इसलिए यह कहना कि रोमन दर्शक बिल्कुल आज की तरह अंगूठा नीचे करके मौत का आदेश देते थे, इतिहास को जरूरत से ज्यादा सरल बनाना होगा।

दर्शक फिर क्या करते थे?

दर्शकों की आवाज बहुत महत्वपूर्ण थी। भीड़ किसी ग्लैडिएटर के पक्ष में जोर से प्रतिक्रिया दे सकती थी। लोकप्रिय योद्धा के लिए दया की मांग हो सकती थी। लेकिन अंतिम फैसला आम तौर पर आयोजन का प्रभारी व्यक्ति करता था, जिसे 'editor' कहा जाता था। कई बार यह कोई शक्तिशाली अधिकारी या स्वयं सम्राट भी हो सकता था। आयोजक को भीड़ की इच्छा, अपनी प्रतिष्ठा और खेल की व्यवस्था, तीनों का संतुलन देखना पड़ता था।

ग्लैडिएटर क्या खाते थे?

फिल्मों में ग्लैडिएटर अक्सर विशाल मात्रा में मांस खाने वाले मांसल योद्धाओं की तरह दिखाई देते हैं। लेकिन पुरातात्विक और प्राचीन प्रमाण एक अलग तस्वीर देते हैं। उनके भोजन में जौ, गेहूं और फलियों जैसे वनस्पति आधारित खाद्य महत्वपूर्ण थे। प्राचीन लेखक प्लिनी ने ग्लैडिएटरों के लिए 'hordearii', यानी मोटे तौर पर 'जौ खाने वाले लोग', जैसा शब्द इस्तेमाल किया था। तुर्किये के प्राचीन एफेसस में मिले ग्लैडिएटरों के अवशेषों के अध्ययन से भी मुख्यतः वनस्पति आधारित भोजन के संकेत मिले हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि शरीर पर थोड़ी अतिरिक्त वसा होने से कटने वाले कुछ घावों में अंदरूनी अंगों को सुरक्षा मिल सकती थी। यानी उनका लक्ष्य शायद आधुनिक बॉडीबिल्डर जैसा दिखना नहीं था, बल्कि लड़ने के लिए शरीर को तैयार रखना था।

घायल होने के बाद क्या उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता था?

अच्छे ग्लैडिएटर मूल्यवान थे और उनका इलाज किया जाता था। रोमन इतिहास के महान चिकित्सक गैलेन ने अपने शुरुआती जीवन में पर्गामम के ग्लैडिएटरों के साथ चिकित्सक के रूप में काम किया था। उन्हें गंभीर चोटों, घावों और हड्डियों की समस्याओं का इलाज करने का अनुभव मिला। पुरातात्विक खोजों से भी पता चलता है कि कुछ ग्लैडिएटर गंभीर चोटों के बाद काफी समय तक जीवित रहे। उनकी हड्डियों में भरने के निशान मिले हैं। इसका मतलब है कि वे घायल होते थे, इलाज पाते थे, स्वस्थ होते थे और फिर अखाड़े में लौट सकते थे।

क्या महिला ग्लैडिएटर भी थीं?

वे पुरुषों की तुलना में बहुत कम थीं, लेकिन महिला ग्लैडिएटर केवल फिल्मों की कल्पना नहीं हैं। हैलिकार्नासस से मिली दूसरी शताब्दी की एक प्रसिद्ध संगमरमर पट्टिका में दो महिला लड़ाकों को दिखाया गया है। उनके नाम Amazon और Achillia दर्ज हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों के मुकाबले के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक जीवित छोड़े जाने का संकेत मिलता है। यह एक बार फिर उस मिथक को कमजोर करता है कि हर मुकाबले में एक व्यक्ति की मौत जरूरी थी।

बाद में सम्राट सेप्टिमियस सेवेरस ने लगभग 200 ईस्वी के आसपास महिलाओं के ऐसे मुकाबलों पर रोक लगा दी।

अखाड़े में हर मौत ग्लैडिएटर मुकाबला नहीं थी

रोमन अखाड़ों में कई तरह के कार्यक्रम होते थे। सुबह जंगली जानवरों का शिकार और मुकाबले हो सकते थे, जिन्हें 'venationes' कहा जाता था। दोपहर में अपराधियों को सार्वजनिक दंड दिया जा सकता था। और बाद में प्रशिक्षित ग्लैडिएटरों के मुकाबले होते थे। फिल्में अक्सर इन सभी चीजों को मिलाकर एक ही तरह का 'ग्लैडिएटर शो' बना देती हैं। लेकिन इतिहास में इनकी अलग-अलग भूमिका थी। किसी अपराधी को शेर के सामने डालना और दो प्रशिक्षित ग्लैडिएटरों का मुकाबला एक ही चीज नहीं थी।

रोमन साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों से शेर, तेंदुए, भालू, जंगली सूअर और दूसरे जानवर अखाड़ों तक लाए जाते थे। इन प्रदर्शनों के जरिए रोम अपनी साम्राज्यवादी शक्ति भी दिखाता था। संदेश साफ था - रोम की पहुंच इतनी विशाल है कि दूर अफ्रीका और दूसरी जगहों के दुर्लभ जानवर भी राजधानी के मनोरंजन के लिए लाए जा सकते हैं। लेकिन इस मनोरंजन की कीमत जानवरों ने भी भारी रूप से चुकाई।

स्पार्टाकस कौन था?

सबसे प्रसिद्ध ग्लैडिएटर का नाम निश्चित रूप से 'स्पार्टाकस' है। लेकिन उसकी कहानी भी फिल्मों से अलग है। वह संभवतः थ्रेस क्षेत्र का था और कैपुआ के एक ग्लैडिएटर विद्यालय से जुड़ा था। 73 ईसा पूर्व में वह लगभग 70 साथियों के साथ वहां से भाग निकला। यह छोटी घटना जल्द ही रोम के लिए बड़े संकट में बदल गई। हजारों दास और दूसरे लोग उसके विद्रोह से जुड़ गए। स्पार्टाकस और उसके साथियों ने कई रोमन सेनाओं को हराया। आखिरकार 71 ईसा पूर्व में मार्कस लिसिनियस क्रैसस की सेना ने विद्रोह को कुचल दिया। स्पार्टाकस युद्ध में मारा गया माना जाता है, लेकिन उसका शव निश्चित रूप से पहचाना नहीं गया। पकड़े गए हजारों विद्रोहियों को रोम और कैपुआ के बीच प्रसिद्ध 'Via Appia' के किनारे सूली पर चढ़ाए जाने का वर्णन मिलता है। स्पार्टाकस की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने दिखाया कि रोमन दास व्यवस्था के भीतर कितना बड़ा असंतोष छिपा हुआ था।

क्या सफल ग्लैडिएटर को आजादी मिल सकती थी?

लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले कुछ ग्लैडिएटरों को 'rudis', यानी लकड़ी की तलवार, दी जा सकती थी। यह अक्सर उनकी मुक्ति का प्रतीक होती थी। मुक्त होने वाले ग्लैडिएटर को 'rudiarius' कहा जा सकता था। दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोग आजादी मिलने के बाद भी प्रसिद्धि और पैसे के लिए दोबारा अखाड़े में लौटते थे। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि पूरी ग्लैडिएटर व्यवस्था स्वतंत्र पेशेवर खेल थी। बहुत बड़ी संख्या में लोग उसमें अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि गुलामी और मजबूरी के कारण पहुंचे थे।

ग्लैडिएटर खेल खत्म कैसे हुए?

रोमन साम्राज्य के बदलते धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक माहौल के साथ इन खेलों का महत्व कम होने लगा। ईसाई लेखकों ने लंबे समय से अखाड़े की हिंसा की आलोचना की थी। बाद में रोमन साम्राज्य के ईसाईकरण के साथ इस तरह के मनोरंजन की सामाजिक स्वीकार्यता पर दबाव बढ़ा। आर्थिक कारण भी महत्वपूर्ण थे। विशाल आयोजन, प्रशिक्षित लड़ाके और दूर-दूर से जानवर लाना बेहद महंगा था। पांचवीं शताब्दी तक पश्चिमी रोमन साम्राज्य खुद राजनीतिक और आर्थिक संकट में था। इसलिए ग्लैडिएटर मुकाबले धीरे-धीरे समाप्त हो गए। इनके खत्म होने की कोई एक निश्चित तारीख बताना आसान नहीं है, क्योंकि अलग-अलग प्रकार के अखाड़े के खेल अलग-अलग समय तक चलते रहे।

रोमन ग्लैडिएटर की कहानी को एक वाक्य में समझना हो तो शायद यही कहना सही होगा - वे अक्सर गुलाम थे, लेकिन हमेशा नहीं; वे सचमुच मर सकते थे, लेकिन हर मुकाबला मौत तक नहीं चलता था; और अखाड़े में उतरने वाला व्यक्ति केवल बलि का शिकार नहीं, बल्कि कई बार वर्षों के प्रशिक्षण से तैयार किया गया अत्यंत मूल्यवान पेशेवर योद्धा होता था।

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