IAS Officers Resignation: भारतीय प्रशासनिक सेवा में पहुंचना देश की सबसे कठिन प्रतियोगी यात्राओं में एक माना जाता है। लाखों नौजवान हर वर्ष इसका सपना देखते हैं। उनमें से कुछ हजार मुख्य परीक्षा तक पहुंचते हैं और आखिर में बहुत थोड़े लोगों को आईएएस मिलता है।
फिर सवाल उठता है कि जिस नौकरी को पाने के लिए कोई अपनी जवानी के कई वर्ष लगा देता है, प्रतिष्ठित संस्थानों की पढ़ाई और लाखों-करोड़ों रुपये के संभावित निजी क्षेत्र के वेतन को छोड़ देता है, वही व्यक्ति एक दिन उस नौकरी को अपनी इच्छा से क्यों छोड़ देता है? क्या वजह बेहतर कमाई होती है, राजनीति में जाने की इच्छा, निजी जीवन, स्वास्थ्य, प्रशासनिक व्यवस्था से निराशा, राजनीतिक हस्तक्षेप, सरकार से टकराव, मनचाही तैनाती न मिलना या फिर यह अहसास कि आईएएस की कुर्सी के बाहर रहकर वह अपनी जिंदगी और समाज के लिए कुछ अधिक सार्थक कर सकता है?
उत्तर प्रदेश में पिछले करीब बीस वर्षों की नौकरशाही को खंगालें तो ऐसे मामलों की एक दिलचस्प शृंखला सामने आती है। इनमें मुख्य सचिव की कुर्सी पर बैठा ऐसा अधिकारी भी है जिसने नियमित सेवानिवृत्ति से केवल तीन महीने पहले अचानक पद छोड़ दिया और ऐसी युवा अधिकारी भी है जिसने आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बेंगलुरु, लंदन की नौकरी और फिर आईएएस तक पहुंचने के बाद महज 13 वर्ष में सेवा को अलविदा कह दिया। इनके बीच वे अधिकारी भी हैं जिन्होंने प्रशासन छोड़कर दुनिया की बड़ी कंपनियों का रास्ता पकड़ा। कुछ सार्वजनिक जीवन की ओर गए। कुछ ने स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थितियों को कारण बताया और कुछ मामलों में आधिकारिक कारण से अलग प्रशासनिक गलियारों में दूसरी कहानी सुनाई देती रही।
इस पूरी पड़ताल में इसलिए केवल यह गिनना पर्याप्त नहीं है कि कितने आईएएस अधिकारियों ने इस्तीफ़ा दिया। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है कि वे कौन थे। उनका प्रशासनिक रिकॉर्ड कैसा था। सेवा छोड़ते समय उनकी उम्र और वरिष्ठता क्या थी। आखिरी तैनाती क्या थी। उन्होंने स्वयं क्या कारण बताया। उस समय सरकार या मीडिया ने क्या कहा। क्या इस्तीफ़े के पीछे किसी विवाद की भूमिका थी। सेवा छोड़ने के तुरंत बाद वे कहां गए और आज वे क्या कर रहे हैं। इसी कसौटी पर 2006 से 30 अगस्त 2026 तक उत्तर प्रदेश कैडर के मामलों को देखने पर एक ऐसी कहानी निकलती है जो सिर्फ कुछ अफसरों की निजी जिंदगी नहीं। बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही के बदलते रिश्ते की कहानी भी है।
और इस कहानी को आज से शुरू करना सबसे उपयुक्त है, क्योंकि 30 अगस्त, 2026 की सुबह उत्तर प्रदेश की चर्चित आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने स्वयं घोषणा कर दी कि उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र दे दिया है।
दिव्या मित्तल - लंदन की नौकरी छोड़कर आईएएस बनीं, 13 साल बाद आईएएस भी छोड़ दिया
दिव्या मित्तल का इस्तीफ़ा सामान्य प्रशासनिक खबर इसलिए नहीं है क्योंकि उनकी पूरी जीवन-यात्रा ही नौकरी और जीवन के उद्देश्य के बीच चुनाव की कहानी रही है। वे उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। दिल्ली में पढ़ीं, आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की, उसके बाद आईआईएम बेंगलुरु से प्रबंधन की पढ़ाई की और फिर लंदन में वित्तीय क्षेत्र में नौकरी करने चली गईं। लंदन में विदेशी वित्तीय अनुबंधों के कारोबार से जुड़ी थीं। भारत लौटीं और सिविल सेवा की राह चुनी। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अशोक बंबावाले पुरस्कार भी मिला था।

उनकी सिविल सेवा यात्रा भी सीधी नहीं थी। पहले प्रयास में उन्हें भारतीय पुलिस सेवा मिली, बाद के प्रयास में 68वीं अखिल भारतीय रैंक के साथ आईएएस मिला। उत्तर प्रदेश में उन्होंने मवाना और सिधौली में उपजिलाधिकारी, गोंडा में मुख्य विकास अधिकारी, उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण में संयुक्त प्रबंध निदेशक और बरेली विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष जैसे पद संभाले। इसके बाद संत कबीर नगर, मिर्जापुर और देवरिया की जिलाधिकारी रहीं। नीति आयोग में सहायक सचिव रहते हुए भी उनका चयन उन पांच प्रस्तुतियों में हुआ था जिन्हें प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुत किया गया।
वह काम जिसने दिव्या मित्तल को अलग पहचान दी
उनके प्रशासनिक जीवन की शायद सबसे चर्चित कहानी मिर्जापुर के लहुरिया दह गांव की है। पहाड़ी पर बसे इस गांव में आजादी के दशकों बाद भी नल का पानी नहीं पहुंच पाया था। गांव पानी के टैंकरों पर निर्भर था, महिलाओं को पानी के लिए कठिन रास्ते तय करने पड़ते थे और पहले के प्रयास तकनीकी तथा भौगोलिक कठिनाइयों में उलझ चुके थे। दिव्या मित्तल ने जिलाधिकारी के रूप में समस्या को दोबारा उठाया। तकनीकी विशेषज्ञों को जोड़ा और जलापूर्ति व्यवस्था पर काम कराया। अगस्त, 2023 में गांव में नल से पानी पहुंचा।
इस घटना का महत्व आज के इस्तीफ़े से इसलिए जुड़ता है क्योंकि ठीक इसी गांव की एक वृद्ध महिला का जिक्र दिव्या ने अपने विदाई संदेश की आखिरी पंक्तियों में किया है। जिस घटना को उन्होंने अपने प्रशासनिक जीवन की सबसे भावनात्मक उपलब्धियों में माना था, उसी स्मृति को लेकर उन्होंने आईएएस छोड़ा है।
देवरिया में उनका दूसरा उल्लेखनीय अभियान सरकारी और सार्वजनिक जमीन से कब्जे हटाने का रहा। उनके कार्यकाल में चलाए गए 'ऑपरेशन कब्जा मुक्ति' के अंतर्गत 900 से अधिक कब्जों से जुड़ी कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई। इसके पीछे उनका जोर केवल जमीन खाली कराने पर नहीं बल्कि सार्वजनिक रास्तों, तालाबों और कमजोर परिवारों के अधिकार से जुड़ी जमीन वापस दिलाने पर भी था।
उनके करियर में विवाद और असहज स्थितियां भी आईं। सितंबर 2023 में मिर्जापुर से उनका तबादला हुआ। लहुरिया दह में पानी पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद उनका स्थानांतरण पहले बस्ती किया गया और फिर उन्हें प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया। इंडियन एक्सप्रेस ने बाद में रिपोर्ट किया कि 'जल पूजन' में कथित तौर पर प्रोटोकॉल उल्लंघन की बात सामने आई थी। जुलाई 2024 में उन्हें देवरिया का जिलाधिकारी बनाया गया। इसलिए उनकी छवि केवल सोशल मीडिया पर लोकप्रिय अधिकारी की नहीं रही। बल्कि ऐसी अधिकारी की भी रही जिनकी कुछ तैनातियां और तबादले चर्चा में रहे।
और 30 अगस्त, 2026 को अचानक इस्तीफ़ा
देवरिया के बाद वे उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात थीं। 30 अगस्त, 2026 को उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र दे दिया है। उनका संदेश जीवन के अगले चरण की ओर संकेत करता है। वह लिखती हैं कि अपने लिए देखे सपने पूरे हो चुके थे और अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। अंत में वे कहती हैं कि पद छूट गया है। लेकिन देश की मिट्टी से मिला सपना नहीं छूटेगा। उनके संदेश से इतना अनुमान जरूर निकलता है कि वे सार्वजनिक या सामाजिक जीवन से दूर जाने के बजाय किसी दूसरे माध्यम से उसी तरह का काम जारी रखना चाहती हैं। लेकिन यह केवल उनके शब्दों से निकलने वाला संकेत है, घोषित अगला पेशा नहीं। अभी उन्होंने यह नहीं बताया है कि वे राजनीति, सामाजिक क्षेत्र, शिक्षा, लेखन, उद्यमिता या किसी अन्य क्षेत्र में जाएंगी।
एक और दिलचस्प तथ्य है। इसी वर्ष उनकी पुस्तक 'The Crafted Genius' भी चर्चा में आई, जिसमें उन्होंने आईआईटी, आईआईएम और सिविल सेवा परीक्षाओं तक अपनी यात्रा और तैयारी के तरीकों को लिखा है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आईएएस छोड़ने के बाद उनका अगला पड़ाव शिक्षा और मार्गदर्शन से जुड़ता है या किसी बिल्कुल अलग क्षेत्र से।
प्रशांत कुमार मिश्र - उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव रहे, जिन्होंने कहा, राजनीतिक इशारों पर चलने से बेहतर नौकरी छोड़ना है
अगर दिव्या मित्तल का मामला इस कहानी का सबसे नया अध्याय है तो प्रशांत कुमार मिश्र का मामला पिछले बीस वर्षों के सबसे असाधारण अध्यायों में है।
प्रशांत कुमार मिश्र उत्तर प्रदेश कैडर के अत्यंत वरिष्ठ आईएएस अधिकारी थे। उनका आईएएस में चयन 15 जुलाई,1972 को हुआ था। लंबे प्रशासनिक जीवन में वे जिलाधिकारी से लेकर शासन के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचे और जुलाई 2007 में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव बने। यानी जिस भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश के लिए उन्होंने 1972 में शुरुआत की थी, करीब साढ़े तीन दशक बाद उसी राज्य की नौकरशाही की सबसे ऊंची कुर्सी उनके पास थी। लेकिन 23 मई, 2008 को घटनाक्रम अचानक बदल गया।
मिश्र की सामान्य सेवानिवृत्ति 30 अगस्त 2008 को होनी थी। यानी उनके पास सेवा के करीब तीन महीने ही बचे थे। इसके बावजूद 23 मई को उन्होंने अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का निर्णय किया और उनका अनुरोध लगभग तुरंत स्वीकार कर लिया गया। उनकी जगह अतुल कुमार गुप्ता को मुख्य सचिव बनाया गया। उस समय मिश्र ने सार्वजनिक रूप से विस्तृत कारण नहीं बताया। लेकिन इतना स्वीकार किया कि फैसले के पीछे कोई ऐसी घटना थी जिसने उन्हें यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया था। वास्तविक कहानी कुछ वर्षों बाद ज्यादा साफ हुई।
सरकार से कहां टकराव हुआ था?
प्रशांत कुमार मिश्र ने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक 'In Quest of a Meaningful Life' में उस दौर के कई प्रसंग लिखे। 2017 में पुस्तक के आधार पर कहा जा सकता है कि उनका तत्कालीन मायावती सरकार के साथ कम-से-कम दो गंभीर प्रशासनिक मुद्दों पर मतभेद हुआ था।
एक मामला आईएएस अधिकारियों की गोपनीय प्रविष्टियां लिखने के अधिकार से जुड़ा था। मिश्र के अनुसार एक प्रस्ताव ऐसा था जिसमें तत्कालीन कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को, जो आईएएस अधिकारी नहीं थे, मुख्य सचिव को छोड़कर अन्य आईएएस अधिकारियों की गोपनीय रिपोर्ट लिखने का अधिकार दिया जाना था। मिश्र ने इसे नियमविरुद्ध मानते हुए प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उन्होंने साफ किया कि जब तक वे मुख्य सचिव हैं, इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे। अंततः प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा।
दूसरा और अधिक निर्णायक मामला करीब 70 एकड़ सरकारी जमीन को एक निजी संस्था को बहुत कम दर पर पट्टे पर देने के प्रस्ताव से जुड़ा बताया गया। मिश्र ने अपनी पुस्तक में दावा किया कि उन पर प्रस्ताव को मंजूर करने का दबाव था लेकिन वे तैयार नहीं हुए। इसी संदर्भ में उनका बाद का कथन बेहद महत्वपूर्ण है कि उन्होंने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर चलने के बजाय सेवा छोड़ना बेहतर समझा।
इसके पहले पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव से संबंधित विभागीय जांच के मामले में भी उनका सरकार से मतभेद हुआ था। 2008 की तत्कालीन रिपोर्ट के अनुसार नीरा यादव को मिली राहत के तरीके पर मिश्र ने आपत्ति की थी और उस समय भी वे पद छोड़ने के करीब पहुंच गए थे, हालांकि सहयोगियों के समझाने पर रुक गए थे।
इसलिए प्रशांत कुमार मिश्र के मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर रखना चाहिए। उन्होंने 2008 में जिस दिन सेवा छोड़ी, उस दिन सार्वजनिक रूप से पूरा कारण नहीं बताया था। बाद में अपनी पुस्तक में उन्होंने राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से जुड़े कारण विस्तार से लिखे। अतः इसे केवल मीडिया की अटकल कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि बाद का विवरण स्वयं मिश्र की ओर से आया।
नौकरी छोड़कर कहां गए?
यहां कहानी एक और मोड़ लेती है। उन्होंने आईएएस छोड़ा जरूर, लेकिन सार्वजनिक प्रशासन से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ।
2008 में ही वे संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य नियुक्त हुए। यानी राज्य की नौकरशाही के सर्वोच्च पद को छोड़ने के बाद वे उस संवैधानिक संस्था में पहुंचे जो देश की आईएएस, आईपीएस और दूसरी अखिल भारतीय तथा केंद्रीय सेवाओं के लिए चयन प्रक्रिया संचालित करती है।
आगे चलकर वे प्रशासनिक अनुभव और सार्वजनिक जीवन से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। भारत सरकार की गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के अभिलेख में 2018 में उन्हें उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य के रूप में दर्ज किया गया है। वहां उन्होंने अधिकारियों को प्रशासन में पैदा होने वाले संघर्ष और उनके शांतिपूर्ण समाधान पर प्रशिक्षण दिया।
उन्होंने लेखन भी किया। उनकी पुस्तक 'एक दृष्टिकोण' और बाद में 'In Quest of a Meaningful Life' प्रकाशित हुई। 2019 में एक सार्वजनिक व्याख्यान में भी वे अपने प्रशासनिक अनुभव और जीवन के अर्थ पर बोलते दिखाई देते हैं।
इस तरह प्रशांत कुमार मिश्र की कहानी को केवल 'मुख्य सचिव ने इस्तीफ़ा दिया' कह देना अधूरा होगा। वह पहले नौकरशाही के सर्वोच्च पद तक पहुंचे, राजनीतिक-प्रशासनिक मतभेदों के बीच नियमित सेवानिवृत्ति से करीब तीन महीने पहले सेवा छोड़ी, फिर संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य बने और बाद में प्रशासनिक प्रशिक्षण, लेखन और सार्वजनिक विमर्श से जुड़े रहे।
और शायद यही मामला हमारी पूरी बीस वर्षीय पड़ताल के लिए पहली बड़ी कसौटी भी देता है-आईएएस छोड़ने वाले हर अफसर को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। किसी के लिए नौकरी छोड़ना बेहतर पेशेवर अवसर था, किसी के लिए निजी निर्णय, लेकिन प्रशांत कुमार मिश्र के अपने विवरण के अनुसार उनके लिए यह प्रशासनिक सिद्धांत और राजनीतिक दबाव के बीच चुनाव था।
नीरा यादव - मुख्य सचिव रह चुकी अधिकारी, समय से पहले सेवा छोड़ी, फिर भ्रष्टाचार के मुकदमों ने पीछा नहीं छोड़ा
प्रशांत कुमार मिश्र के ठीक पहले 2008 में उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में एक और बड़ा मामला सामने आया था। लेकिन उसका चरित्र बिल्कुल अलग था। नीरा यादव, 1971 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी और प्रदेश की पहली महिला मुख्य सचिव, मार्च 2008 में सेवा से समय से पहले अलग हुईं। उनकी नियमित सेवानिवृत्ति 30 जून 2008 को होनी थी। लेकिन उन्होंने करीब तीन महीने पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। उस समय वे सतर्कता आयोग और प्रशासनिक अधिकरण से जुड़ी जिम्मेदारी संभाल रही थीं।
नीरा यादव का प्रशासनिक जीवन साधारण नहीं था। वे 2005 में मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश की मुख्य सचिव बनीं। लेकिन उनका नाम इससे पहले ही विवादों में आ चुका था। नोएडा में भूखंड आवंटन से जुड़े मामलों की जांच चल रही थी और 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश आईएएस एसोसिएशन के एक चर्चित गुप्त मतदान में उनका नाम उन अधिकारियों में आया था जिन्हें अधिकारी समुदाय के भीतर अत्यधिक भ्रष्ट माना गया था। इसे किसी अदालत का फैसला नहीं माना जा सकता। लेकिन उस समय की नौकरशाही में उनकी छवि कितनी विवादित थी, यह अवश्य बताता है। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद उन्हें मुख्य सचिव पद से हटाया गया था।

उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति क्यों ली, इसका कोई स्पष्ट आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया था। उस समय की रिपोर्टों में यह अटकल जरूर लगाई गई कि लगातार चल रहे मुकदमों, नौकरशाही के भीतर विरोध और भविष्य की कानूनी परेशानियों ने निर्णय पर असर डाला होगा। लेकिन इसे प्रमाणित कारण नहीं कहा जा सकता। तथ्य यह है कि सेवा छोड़ने से उनके खिलाफ चल रहे मामलों का अंत नहीं हुआ। दिसंबर 2010 में नोएडा भूमि आवंटन से जुड़े एक मामले में उन्हें चार वर्ष की सजा हुई। नवंबर 2012 के दूसरे मामले में भी उन्हें दोषी ठहराया गया और बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी। 2016 में उन्हें आत्मसमर्पण कर जेल जाना पड़ा।
सेवा छोड़ने के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता भी पकड़ा। 2009 में वे अपने पति, पूर्व आईपीएस अधिकारी महेंद्र सिंह यादव के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुई थीं। यानी नीरा यादव का रास्ता प्रशासन से निकलकर पहले राजनीति और फिर लंबे कानूनी संघर्ष की ओर गया।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां इस्तीफ़ा या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को किसी आदर्शवादी टकराव से जोड़ना गलत होगा। प्रशांत कुमार मिश्र और नीरा यादव लगभग एक ही समय सेवा से बाहर हुए। लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि और परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं।
मंजुलिका गौतम - केंद्र में ऊंचे पद तक पहुंचीं, फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण गईं
2008 में ही एक तीसरा महत्वपूर्ण नाम मंजुलिका गौतम का है। वे उत्तर प्रदेश कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी थीं और केंद्र सरकार में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग में अतिरिक्त सचिव तथा योजना आयोग में वरिष्ठ सलाहकार जैसे पदों पर काम कर चुकी थीं। जून 2008 के आसपास उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उस समय की रिपोर्टों में उनका नाम उन चार वरिष्ठ यूपी कैडर अधिकारियों में शामिल था जिन्होंने 2007-08 के दौरान समय से पहले सेवा छोड़ी थी।
लेकिन मंजुलिका गौतम का मामला प्रशासन से मोहभंग का उदाहरण नहीं था। उपलब्ध जीवनी-सामग्री के अनुसार उन्होंने सेवा इसलिए छोड़ी क्योंकि उन्हें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में प्रशासनिक सदस्य के रूप में जाना था। पहले वे पटना और इलाहाबाद पीठ से जुड़ीं और बाद में प्रधान पीठ, नई दिल्ली तक पहुंचीं। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के पुराने फैसलों में भी उनका नाम सदस्य के रूप में दर्ज है।
सेवा से बाहर आने के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी काम किया। बाद के वर्षों में वे नोएडा स्थित एक महिला-केंद्रित शिक्षण संस्थान से निदेशक के रूप में जुड़ी दिखाई देती हैं। उनके सार्वजनिक परिचय में महिलाओं की शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों पर काम को प्रमुखता दी गई है।
इसलिए मंजुलिका गौतम का मामला इस पूरी सूची में एक अलग श्रेणी बनाता है, आईएएस छोड़कर न निजी कंपनी, न राजनीति, बल्कि न्यायिक-प्रशासनिक संस्था और फिर शिक्षा की ओर जाना।
सुशील मोहन - 2007 में ही सेवा छोड़ने वाले वरिष्ठ अधिकारी
इस बीस वर्षीय कालखंड के शुरुआती पुष्ट मामलों में सुशील मोहन का नाम भी आता है। 2009 में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में दर्ज है कि उत्तर प्रदेश में सहकारिता सचिव रहे सुशील मोहन ने 13 अप्रैल 2007 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी।
सुशील मोहन का मामला पुराने अभिलेखों की कठिनाई भी दिखाता है। उनके बाद के पेशेवर जीवन और वीआरएस के व्यक्तिगत कारणों पर पर्याप्त विश्वसनीय सार्वजनिक सामग्री आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसलिए यहां कोई कहानी गढ़ना उचित नहीं होगा। इतना पुष्ट है कि वे सहकारिता विभाग में सचिव स्तर पर थे और उन्होंने अप्रैल 2007 में समय से पहले सेवा छोड़ी।
परमेश्वरन अय्यर - आईएएस छोड़ा, विश्व बैंक गए, फिर मोदी सरकार ने वापस बुलाया
परमेश्वरन अय्यर 1981 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं। उनका प्रशासनिक जीवन इसलिए असाधारण है कि उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा को अपेक्षाकृत जल्दी छोड़ दिया, अंतरराष्ट्रीय विकास क्षेत्र में लंबा करियर बनाया और फिर वर्षों बाद भारत सरकार ने उन्हें देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक की जिम्मेदारी संभालने के लिए वापस बुलाया। बाद में वे नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी बने और फिर विश्व बैंक में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अमेरिका गए।
आईएएस के शुरुआती वर्षों में उन्होंने उत्तर प्रदेश में काम किया। वे बिजनौर के जिलाधिकारी भी रहे। पेयजल और स्वच्छता के क्षेत्र से उनका जुड़ाव प्रशासनिक सेवा के दौरान ही मजबूत हो गया था। बाद में वे केंद्र सरकार में भी इसी क्षेत्र से जुड़ी जिम्मेदारियों में रहे।
उन्होंने 2009 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उस समय तक वे लगभग 28 वर्ष सेवा कर चुके थे। सेवा छोड़ने के बाद उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय विकास और विशेष रूप से जल तथा स्वच्छता बन गया। वे विश्व बैंक से जुड़े और वियतनाम, चीन, मिस्र, लेबनान सहित कई देशों में जल और स्वच्छता से संबंधित कार्यक्रमों पर काम किया।_परमेश्वरन अय्यर को 2016 में नरेंद्र मोदी सरकार ने वापस भारत बुलाया।
उन्हें पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय में सचिव बनाया गया और स्वच्छ भारत मिशन के क्रियान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी दी गई। गांवों में शौचालय निर्माण, खुले में शौच से मुक्ति और स्वच्छता व्यवहार बदलने के अभियान के वे प्रमुख प्रशासनिक चेहरों में रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सार्वजनिक रूप से उनके काम की प्रशंसा की थी।
इस वापसी में एक दिलचस्प बात थी। वे तब नियमित आईएएस अधिकारी के रूप में वापस नहीं आए थे। आईएएस से उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति समाप्त नहीं हुई थी। सरकार ने उन्हें अनुबंध के आधार पर सचिव स्तर की जिम्मेदारी दी थी। इसलिए तकनीकी रूप से यह "आईएएस में वापसी" नहीं बल्कि पूर्व आईएएस अधिकारी को विशेषज्ञ के रूप में सरकार में वापस लाना था।

