Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों अफवाहों का बाजार ऐसा गर्म है कि चाय ठंडी होने से पहले सरकार बनने और बिगड़ने की नई पटकथा तैयार हो जाती है। इस बार चर्चा का केंद्र बने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल और भाजपा के राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े।
दोनों नेताओं की कथित मुलाकात ने सियासी गलियारों में ऐसी हलचल मचाई कि मानो सत्ता के गलियारों में नया दरवाजा खुलने वाला हो। लेकिन राकांपा (एसपी) की कार्यकारी अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने इन तमाम अटकलों पर मुस्कुराते हुए पूर्ण विराम लगाने की कोशिश की है।
सुप्रिया सुले ने मीडिया से बातचीत में साफ कहा कि उन्हें जयंत पाटिल और विनोद तावड़े के बीच किसी विशेष बैठक की कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें उन्हें भी मीडिया के जरिए ही पता चली हैं। दिलचस्प अंदाज में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि उनकी खुद विनोद तावड़े से लगातार मुलाकात होती रहती है, क्योंकि दोनों संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सदस्य हैं।
सुले ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि पिछले एक महीने में उनकी और तावड़े की करीब 21 बार मुलाकात हो चुकी है। अब अगर हर मुलाकात का मतलब राजनीतिक गठबंधन निकाल लिया जाए, तो संसद की कैंटीन शायद देश का सबसे बड़ा गठबंधन केंद्र घोषित करनी पड़े। उन्होंने कहा कि इन चर्चाओं को सुनकर उन्हें सिर्फ हंसी आती है।
12 साल से सुन रही हूं, पवार एनडीए में जा रहे हैं
जब उनसे पूछा गया कि क्या शरद पवार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने या उसमें शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि वह पिछले 12 वर्षों से यही चर्चाएं सुनती आ रही हैं। उनके मुताबिक हर कुछ महीनों में ऐसी खबरें उड़ती हैं, लेकिन आखिर में राजनीति वहीं खड़ी नजर आती है जहां से चली थी।
सुले का संदेश साफ था कि अफवाहें अपनी जगह हैं और पार्टी की आधिकारिक नीति अपनी जगह। उन्होंने किसी भी संभावित राजनीतिक समझौते की खबर को खारिज करते हुए कहा कि फिलहाल ऐसी किसी बैठक या बातचीत की उन्हें जानकारी नहीं है।
रोहित पवार बोले - विपक्ष का काम सत्ता नहीं, सवाल पूछना है
राकांपा (एसपी) के विधायक रोहित पवार ने भी इन चर्चाओं को सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी का फोकस अभी भी किसानों, छात्रों, मजदूरों और आम जनता के मुद्दों पर है। उनका कहना था कि किसी भी दल के साथ सरकार बनाने या समर्थन देने जैसी कोई बातचीत नहीं हुई है।
हालांकि राजनीति में यह भी कहा जाता है कि जब तक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खंडन न हो, तब तक अफवाह अधूरी रहती है। ऐसे में लगातार हो रहे इनकारों ने चर्चा को खत्म करने के बजाय और दिलचस्प बना दिया है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल, कहा- फैसला करना होगा विचारधारा या सत्ता?
उधर कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अलग ही तस्वीर पेश की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय वडेट्टीवार ने दावा किया कि बातचीत जरूर चल रही है। उन्होंने कहा कि अब फैसला शरद पवार को करना है कि वे विचारधारा के साथ खड़े रहेंगे या सत्ता के साथ।
वडेट्टीवार ने कहा कि सवाल सिर्फ सरकार में शामिल होने का नहीं है बल्कि यह तय करने का है कि राजनीति का रास्ता छत्रपति शिवाजी महाराज, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, छत्रपति शाहू महाराज, महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के प्रगतिशील विचारों से होकर जाएगा या फिर सत्ता, संपत्ति और राजनीतिक ताकत के समीकरणों से।
कांग्रेस के इस बयान को राजनीतिक दबाव की रणनीति भी माना जा रहा है, क्योंकि महाविकास अघाड़ी के भीतर पिछले कुछ समय से विश्वास और भविष्य दोनों पर सवाल उठते रहे हैं।
आखिर मुलाकात में क्या हुआ था?
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, पिछले शुक्रवार जयंत पाटिल और भाजपा सांसद विनोद तावड़े के बीच एक अहम बैठक हुई थी। बताया जा रहा है कि इस बैठक में इस संभावना पर चर्चा हुई कि यदि शरद पवार गुट एनडीए का हिस्सा बनता है या बाहर से समर्थन देता है तो उसे राजनीतिक रूप से क्या लाभ मिल सकते हैं।
सूत्रों का यह भी दावा है कि बातचीत महाराष्ट्र सरकार तक सीमित नहीं थी बल्कि केंद्र स्तर पर भी संभावित साझेदारी को लेकर चर्चा हुई। कहा जा रहा है कि इस पूरी कवायद में पहल केंद्रीय नेतृत्व की ओर से हो रही है, न कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के स्तर से।
कैबिनेट की कुर्सियों पर भी चर्चा!
सियासी गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि शरद पवार की पार्टी एनडीए में शामिल होती है तो उसे केंद्र सरकार में एक कैबिनेट मंत्री और महाराष्ट्र सरकार में तीन कैबिनेट मंत्री पद मिल सकते हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा राज्य के वित्त मंत्रालय को लेकर है। यह विभाग फिलहाल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विभाग अभी तक किसी और को नहीं सौंपे जाने के पीछे भी भविष्य की संभावित राजनीतिक रणनीति हो सकती है।
चर्चा यह भी है कि यदि गठबंधन बनता है तो जयंत पाटिल को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी मिल सकती है। हालांकि इस बीच उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा अजीत पवार भी इस विभाग पर अपना दावा जता चुकी हैं। ऐसे में वित्त मंत्रालय की कुर्सी फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे चर्चित आरक्षित सीट बनती दिखाई दे रही है जिस पर दावेदार ज्यादा हैं और आधिकारिक घोषणा शून्य।
अफवाह, इनकार और इंतजार... यही है महाराष्ट्र की राजनीति
महाराष्ट्र की राजनीति लंबे समय से ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां किसी नेता की मुलाकात, एक कप चाय, एक मुस्कान या बंद कमरे की बैठक अगले दिन सरकार बदलने की खबर बन जाती है। दिलचस्प यह है कि यहां अफवाहें विपक्ष से तेज दौड़ती हैं और खंडन अक्सर उनके पीछे-पीछे आता है।
फिलहाल राकांपा (एसपी) खुलकर किसी भी राजनीतिक सौदे से इनकार कर रही है, जबकि कांग्रेस को बातचीत की भनक सुनाई दे रही है। भाजपा ने भी इस पूरे मामले पर अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसे में राजनीति के जानकार यही कह रहे हैं कि महाराष्ट्र में 'ना पूरी तरह इनकार अंतिम होता है और ना ही हर मुलाकात गठबंधन की गारंटी।' फिलहाल सियासी शतरंज की बिसात बिछी हुई है, चालें चल रही हैं और मोहरों से ज्यादा चर्चा दर्शकों की हो रही है।

