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Kangra Kile Ka Itihas: हिमालय की गोद में बसा प्राचीन सामर्थ्य और आस्था का दुर्ग

Kangra Kile Ka Itihas: हिमालय की गोद में बसा प्राचीन सामर्थ्य और आस्था का दुर्ग

Newstrack 3 weeks ago

Himachal Pradesh Kangra Fort History: 'कांगड़ा किला' को समझना भारत के सबसे प्राचीन दुर्ग-परंपरा को समझना है। यह केवल एक किला नहीं है। यह समय की परतों में बना हुआ एक जीवित इतिहास है।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित यह दुर्ग दो नदियों-बाणगंगा और मंजी-के संगम के पास एक प्राकृतिक उभार पर बना है। यह स्थान सुंदर है, पर उससे अधिक रणनीतिक है। तीन ओर गहरी ढलानें हैं। नीचे बहता जल है। ऊपर उठती दीवारें हैं। इसका अर्थ है-यह किला दीवारों से कम, भूगोल से अधिक सुरक्षित है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कांगड़ा किले को एक 'प्राचीन हिल फोर्ट कॉम्प्लेक्स' के रूप में देखता है। इसकी संरचना किसी एक योजना में नहीं बनी। यह समय के साथ विकसित हुई। इसमें अलग-अलग काल की दीवारें हैं। अलग-अलग काल के द्वार हैं। अलग-अलग काल के मंदिर हैं। इसका मतलब यह है कि यह किला एक 'मल्टी-लेयर्ड हेरिटेज साइट' है, जहाँ हर परत एक युग की कहानी कहती है।

कांगड़ा किले की उत्पत्ति को लेकर कई परंपराएँ हैं। इसे त्रिगर्त राज्य से जोड़ा जाता है। परंपरा के अनुसार राजा सुशर्मा चंद्र को इसका प्रारंभिक निर्माता माना जाता है। यह वही शासक हैं जिनका संबंध महाभारत परंपरा से जोड़ा जाता है। हालांकि इसका प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण सीमित है, लेकिन यह निर्विवाद है कि यह किला भारत के सबसे पुराने सतत उपयोग में रहे दुर्गों में एक रहा है।

इस किले का वास्तविक ऐतिहासिक विकास कटोच वंश के अधीन हुआ। कटोच राजाओं ने इसे अपने सत्ता-केंद्र के रूप में उपयोग किया। उन्होंने इसकी दीवारों को मजबूत किया। द्वारों को विकसित किया। मंदिरों का निर्माण कराया। इस प्रकार कांगड़ा किला केवल एक सैन्य संरचना नहीं रहा। यह एक सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र भी बन गया।

यदि पूछा जाए कि इस किले में कौन-कौन शासक रहे, तो सूची लंबी है। प्रारंभ में कटोच वंश। फिर विभिन्न आक्रमणकारी शक्तियाँ। 11वीं सदी में महमूद ग़ज़नी ने इस किले पर आक्रमण किया। उसने यहाँ के मंदिरों और खजाने को लूटा। यह घटना इस किले के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह किला केवल सैन्य दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इसके बाद भी यह किला कई शक्तियों के अधीन रहा। मुग़ल सम्राट अकबर ने इसे जीतने का प्रयास किया, पर सफल नहीं हुआ। अंततः जहाँगीर के समय यह किला मुग़ल नियंत्रण में आया। बाद में यह सिख शासकों के अधीन गया। फिर अंग्रेजों ने इसे अपने नियंत्रण में लिया। इसका अर्थ यह है कि कांगड़ा किला उत्तर भारत की बदलती सत्ता का एक केंद्रीय बिंदु रहा।

अब इसके स्थापत्य को गहराई से समझते हैं

कांगड़ा किले तक पहुँचने का मार्ग सीधा नहीं है। यह लंबा है। घुमावदार है। और क्रमशः ऊपर चढ़ता है। इस मार्ग में कई द्वार आते हैं। हर द्वार एक रक्षा-रेखा है। जैसे-जैसे दुश्मन आगे बढ़ता है, उसे हर स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है।

प्रमुख द्वारों में रणजीत सिंह द्वार, जहाँगीरी द्वार, और अन्य आंतरिक प्रवेश शामिल हैं। हर द्वार सीधे सामने नहीं खुलता। वह मोड़ लेकर आता है। इसका उद्देश्य यह है कि दुश्मन सीधे अंदर प्रवेश न कर सके। उसकी गति टूटे। उसकी संरचना बिखरे।

दीवारें मोटी हैं। पत्थर बड़े हैं। निर्माण में स्थानीय पत्थर का उपयोग किया गया है। दीवारें चट्टानों के किनारों के साथ चलती हैं। इससे रक्षा मजबूत होती है और निर्माण स्थिर रहता है।

किले के भीतर कई स्तर हैं। ऊपर राजकीय और धार्मिक संरचनाएँ हैं। नीचे प्रवेश और रक्षा तंत्र है। यह 'वर्टिकल प्लानिंग' है-ऊपर सत्ता, नीचे संघर्ष।

कांगड़ा किले की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता उसके मंदिर हैं। यहाँ अंबिका देवी और लक्ष्मी नारायण जैसे मंदिर स्थित थे। इसका अर्थ यह है कि यह किला केवल सैनिकों का स्थान नहीं था। यह आस्था का केंद्र भी था। यही कारण है कि आक्रमणकारी यहाँ केवल भूमि जीतने नहीं आते थे। वे यहाँ की संपत्ति और धार्मिक महत्व को भी निशाना बनाते थे।

जल-प्रबंधन यहाँ प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों का मिश्रण है। नदियाँ नीचे बहती हैं। किले के भीतर जल संग्रह के लिए कुंड बनाए गए। वर्षा जल का उपयोग किया गया। यह व्यवस्था किले को कुछ समय तक आत्मनिर्भर बनाती थी। पर यह चित्तौड़ या कुम्भलगढ़ जैसे विशाल जल-तंत्र वाला किला नहीं था। इसकी शक्ति अधिकतर प्राकृतिक जल-स्रोतों के निकट होने में थी।

कांगड़ा किले की एक और महत्वपूर्ण परत उसका भूकंप इतिहास है। 1905 के भूकंप ने इस किले को भारी क्षति पहुँचाई। कई संरचनाएँ नष्ट हो गईं। दीवारें टूट गईं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि चाहे किला कितना भी मजबूत क्यों न हो, प्रकृति के सामने उसकी सीमा होती है। आज जो अवशेष दिखाई देते हैं, वे उसी विनाश और उसके बाद के संरक्षण का परिणाम हैं।

एक रोचक तथ्य यह है कि कांगड़ा किला लंबे समय तक 'अजेय' माना जाता था। इसका कारण उसकी दीवारें नहीं, बल्कि उसका स्थान था। दुश्मन को पहले नदियों को पार करना होता। फिर चढ़ाई करनी होती। फिर संकरे मार्गों से गुजरना होता। तब कहीं जाकर वह किले तक पहुँचता। यह बहुस्तरीय प्राकृतिक रक्षा इसे अत्यंत कठिन लक्ष्य बनाती थी।

आज यह किला संरक्षित स्मारक है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसकी देखरेख करता है। यहाँ संरक्षण कार्य होते हैं। टूटे हिस्सों को स्थिर किया जाता है। संरचना को बचाने का प्रयास किया जाता है।

पर कांगड़ा किले का वास्तविक महत्व उसकी संरचना में नहीं, उसकी निरंतरता में है।

यह किला-

* कई बार टूटा

* कई बार लूटा

* कई बार बदला

पर समाप्त नहीं हुआ।

यदि 'कांगड़ा किला' को एक वाक्य में समझना हो, तो कहा जा सकता है-

यह वह स्थान है जहाँ समय ने सबसे लंबा निवास किया है।

यहाँ हर पत्थर पुराना है।

हर दीवार एक युग है।

और हर अवशेष यह बताता है कि शक्ति केवल तलवार से नहीं, बल्कि निरंतरता से भी टिकती है।

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