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कान्हा में भूख, बीमारी और बेबसी से उजड़ गया बाघ परिवार! 9 दिनों में बाघिन अमाही समेत 4 शावकों की मौत

कान्हा में भूख, बीमारी और बेबसी से उजड़ गया बाघ परिवार! 9 दिनों में बाघिन अमाही समेत 4 शावकों की मौत

Newstrack 1 week ago

Tigress Amahi & 4 Cubs Dead in Kanha: मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से आई यह खबर हर वन्यजीव प्रेमी का दिल तोड़ देने वाली है। जंगल की रानी कही जाने वाली बाघिन अमाही अपने चार मासूम शावकों के साथ जिंदगी की लड़ाई लड़ती रही, लेकिन भूख, कमजोरी और संक्रमण के सामने पूरा परिवार हार गया।

महज 9 दिनों में एक-एक कर सभी की मौत हो गई। शुरुआती जांच में सामने आया है कि पर्याप्त शिकार न मिलने से परिवार लगातार कमजोर हो रहा था, जिसके बाद बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। अब यह मामला सिर्फ मौत का नहीं, बल्कि जंगल प्रबंधन और वन्यजीव सुरक्षा पर बड़ा सवाल बन गया है।

कान्हा टाइगर रिजर्व से आई दर्दनाक खबर

मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से सामने आई यह घटना बेहद दर्दनाक और चिंताजनक है। यहां बाघिन अमाही (T-141) और उसके चार शावकों की लगातार मौत ने वन विभाग से लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों तक सभी को झकझोर दिया है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय से यह पूरा परिवार कमजोर हालत में देखा जा रहा था। जो शावक अभी पूरी तरह बड़े भी नहीं हुए थे, वे अपनी मां पर निर्भर थे। लेकिन जब मां ही कमजोर हो गई और शिकार करने की हालत में नहीं रही, तो पूरा परिवार संकट में आ गया। धीरे-धीरे भूख, कमजोरी और संक्रमण ने हालात इतने बिगाड़ दिए कि 9 दिनों में पूरा बाघ परिवार खत्म हो गया।

9 दिनों में उजड़ गया पूरा परिवार

यह दुखद सिलसिला 21 अप्रैल से शुरू हुआ। सबसे पहले एक शावक की मौत हुई। इसके बाद 24 अप्रैल को दूसरा शावक मृत मिला। 25 अप्रैल को तीसरे शावक ने भी दम तोड़ दिया। अधिकारियों को उम्मीद थी कि इलाज से बाघिन अमाही और आखिरी शावक को बचाया जा सकेगा, लेकिन 29 अप्रैल को दोनों ने भी दम तोड़ दिया। इस तरह महज 9 दिनों के भीतर एक बाघिन और उसके चारों शावकों की मौत हो गई। जंगल में एक साथ पूरे परिवार का खत्म हो जाना बेहद असामान्य माना जा रहा है।

क्या भूख बनी सबसे बड़ी वजह

शुरुआती जांच में जो बातें सामने आई हैं, वे बेहद गंभीर हैं। बताया जा रहा है कि बाघिन और उसके शावकों को पर्याप्त शिकार नहीं मिल पा रहा था। जंगल में यदि शिकार की उपलब्धता कम हो जाए, तो बड़े शिकारी जानवरों के लिए जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है। बाघिन अमाही अपने बच्चों को पालने और खुद को जिंदा रखने के लिए शिकार पर निर्भर थी। लेकिन लगातार शिकार न मिलने से वह कमजोर होती चली गई। इसका असर सीधे उसके शावकों पर पड़ा, क्योंकि वे पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर थे। पहले मृत शावक के पेट में भोजन नहीं मिला था। इससे यह आशंका और मजबूत हुई कि परिवार कई दिनों से भूख झेल रहा था।

कमजोरी ने छीन ली लड़ने की ताकत

विशेषज्ञों का मानना है कि भूख सिर्फ पेट खाली नहीं करती, बल्कि शरीर की ताकत भी खत्म कर देती है। जब किसी जानवर को लंबे समय तक पर्याप्त भोजन नहीं मिलता, तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से गिरती है। अमाही और उसके शावकों के साथ भी यही हुआ। लगातार कमजोरी के कारण उनका शरीर संक्रमण से लड़ने में सक्षम नहीं रहा। नतीजा यह हुआ कि बीमारी ने तेजी से पूरे परिवार को अपनी चपेट में ले लिया।

फेफड़ों का संक्रमण बना जानलेवा

वन विभाग की शुरुआती जांच में मौत की एक बड़ी वजह फेफड़ों का गंभीर संक्रमण बताई गई है। अधिकारियों के अनुसार बाघिन अमाही को सांस लेने में परेशानी हो रही थी। वह खाना भी नहीं खा पा रही थी। शावकों में भी ऐसे ही लक्षण दिखाई दिए। संक्रमण इतनी तेजी से फैला कि इलाज शुरू होने तक हालत बहुत बिगड़ चुकी थी। डॉक्टरों की टीम ने पूरा प्रयास किया, लेकिन परिवार को बचाया नहीं जा सका। अब असली कारणों का पता लगाने के लिए सैंपल फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए हैं।

पर्यटकों ने सबसे पहले देखी थी खराब हालत

बताया जा रहा है कि 17 अप्रैल को पर्यटकों ने पहली बार बाघिन और उसके शावकों को बेहद कमजोर और बीमार हालत में देखा था। यह साफ संकेत था कि परिवार किसी गंभीर परेशानी से गुजर रहा है। इसके बाद वन विभाग सक्रिय हुआ और उन्हें रेस्क्यू कर मुक्की क्वारंटाइन सेंटर लाया गया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। यही वजह है कि अब निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।

उम्र ने भी बढ़ाई मुश्किल

अधिकारियों के मुताबिक बाघिन अमाही की उम्र लगभग 10 से 11 साल थी। बाघों के लिहाज से यह उम्र अधिक मानी जाती है। इस उम्र में शरीर की ताकत पहले जैसी नहीं रहती। जब उम्र, भूख और संक्रमण तीनों एक साथ हमला करें, तो हालात और गंभीर हो जाते हैं। अमाही की कमजोर हालत का असर सीधे उसके शावकों पर पड़ा, क्योंकि छोटे शावक खुद शिकार नहीं कर सकते थे।

इलाज चला लेकिन जिंदगी हार गई

जब वन विभाग को स्थिति की गंभीरता समझ आई, तब बाघिन और उसके आखिरी शावक को बेहोश कर इलाज के लिए मुक्की क्वारंटाइन सेंटर लाया गया। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने निगरानी में इलाज शुरू किया। उन्हें दवाएं दी गईं और देखभाल की गई, लेकिन संक्रमण इतना बढ़ चुका था कि इलाज असर नहीं कर सका। आखिरकार बाघिन और उसका आखिरी शावक भी जिंदगी की जंग हार गए।

जांच में जुटा वन विभाग

इस दर्दनाक घटना के बाद वन विभाग अलर्ट मोड में है। जिस इलाके में बाघ परिवार मिला था, वहां सैनिटाइजेशन कराया जा रहा है। आसपास के जल स्रोतों से पानी के नमूने लिए गए हैं। जांच टीम यह पता लगाने में जुटी है कि संक्रमण आखिर कहां से फैला। क्या पानी दूषित था, क्या किसी अन्य जानवर से बीमारी फैली, या फिर कमजोरी के कारण संक्रमण ने हमला किया। इन सभी पहलुओं पर जांच जारी है।

वन्यजीव संरक्षण पर उठे बड़े सवाल

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि भूख इस पूरे कुनबे की मौत के पीछे एक बड़ी और क्रूर वजह बनकर सामने आई है। यदि शुरुआती जांच में शिकार की कमी और लंबे समय तक भोजन न मिलने की बात सही साबित होती है, तो यह केवल प्राकृतिक हादसा नहीं बल्कि प्रबंधन की गंभीर विफलता माना जाएगा। जंगल में रहने वाले शीर्ष शिकारी जानवरों के लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध कराना, उनके मूवमेंट पर नजर रखना और संकट की स्थिति में समय रहते हस्तक्षेप करना वन विभाग की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में अगर एक बाघिन अपने चार शावकों सहित भूख और कमजोरी से जूझती रही, तो सवाल सीधे वन विभाग की कार्यप्रणाली, निगरानी व्यवस्था और संरक्षण दावों पर उठना स्वाभाविक है।

कान्हा देश के सबसे प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व में गिना जाता है। यहां बाघों की सुरक्षा, निगरानी और संरक्षण के बड़े दावे किए जाते हैं। ऐसे में एक बाघिन और उसके चार शावकों की लगातार मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या जंगल में शिकार की पर्याप्त व्यवस्था थी, क्या निगरानी तंत्र समय पर सक्रिय हुआ, क्या बीमारी की पहचान देर से हुई और क्या रेस्क्यू ऑपरेशन देर से शुरू हुआ। इन सवालों के जवाब अब जांच रिपोर्ट से ही मिलेंगे।

कान्हा में अमाही और उसके चार शावकों की मौत ने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर दिया है। एक मां अपने बच्चों के साथ भूख, कमजोरी और बीमारी से लड़ती रही, लेकिन अंत में हार गई। यह घटना बताती है कि जंगल सिर्फ पेड़ों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले जीवों से जीवित रहता है। अगर उन्हें सुरक्षित नहीं रखा गया, तो संरक्षण के सारे दावे खोखले साबित होंगे।

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