Mayawati expels 3 BSP leaders: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। जहां एक तरफ भाजपा और समाजवादी पार्टी अपनी रणनीति को धार देने में जुटी हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के भीतर मची एक बड़ी उथल-पुथल ने सबको चौंका दिया है।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक अचानक लिए गए फैसले में पार्टी के तीन बेहद कद्दावर और पुराने नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फरवरी 2027 में होने वाले चुनावों से ठीक पहले लिया गया यह फैसला पार्टी के लिए 'मास्टरस्ट्रोक' साबित होगा या 'आत्मघाती', इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो बसपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, वहां इस कार्रवाई के गहरे असर होने की संभावना है।
तीन दिग्गजों की विदाई: कांशीराम के करीबियों पर भी गिरी गाज
मायावती ने जिन तीन चेहरों को पार्टी से निष्कासित किया है, उनमें धर्मवीर अशोक, जयप्रकाश और सरफराज रैन के नाम शामिल हैं। इनमें सबसे चौंकाने वाला नाम धर्मवीर अशोक का है। धर्मवीर अशोक न केवल पश्चिमी यूपी के बड़े नेता थे, बल्कि वे बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम के सबसे करीबी साथियों में से एक गिने जाते थे। मायावती ने उन्हें समय-समय पर कई राज्यों की अहम जिम्मेदारियां सौंपी थीं। वहीं, जयप्रकाश की बात करें तो वे हाल ही में बसपा में लौटे थे और पश्चिमी यूपी के युवाओं को जोड़ने के अभियान में लगे थे। तीसरे नेता सरफराज रैन टिकट वितरण और सांगठनिक मजबूती के कार्यों में काफी सक्रिय थे। इन तीनों ही नेताओं की अपनी-अपनी जमीन पर जबरदस्त पकड़ मानी जाती थी।
कार्यकर्ताओं में सुलगता असंतोष: क्या बूथ स्तर पर होगी बगावत?
मायावती के इस कड़े फैसले ने पार्टी के जमीनी और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को गहरे सदमे और गुस्से में डाल दिया है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब चुनाव नजदीक हों, तब अनुभवी नेताओं को बाहर निकालना पार्टी की सेहत के लिए ठीक नहीं है। चर्चा यह भी है कि ये नेता जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़े हुए थे और उनके जाने से सांगठनिक ढांचा कमजोर हो सकता है। पार्टी सूत्रों की मानें तो कुछ अंदरूनी शिकायतों और गुटबाजी के चलते यह कार्रवाई हुई है। जयप्रकाश पर पश्चिमी यूपी के संगठन में अनावश्यक दखलअंदाजी के आरोप थे, लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए यह तर्क गले उतारना मुश्किल हो रहा है।
टिकट वितरण और रणनीति पर संकट के बादल
बसपा ने इस बार अन्य पार्टियों से बढ़त लेते हुए कई जिलों में प्रभारियों की नियुक्ति कर दी थी और टिकट बांटने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई थी। ऐसे में इन तीन सक्रिय नेताओं का अचानक हटना पार्टी की पूरी चुनावी बिसात को बिगाड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि पश्चिमी यूपी की राजनीति 'जातीय समीकरणों' और 'मजबूत चेहरों' पर टिकी होती है। धर्मवीर अशोक जैसे नेता दलित समाज के भीतर एक बड़ा प्रभाव रखते थे। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या उनके जाने से बसपा का मूल वोट बैंक छिटक कर सपा या भाजपा की ओर रुख करेगा?
2027 की डगर कितनी कठिन?
मायावती अक्सर अनुशासन के नाम पर बड़े फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं, लेकिन 2027 की डगर पिछली बार से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ भाजपा का मजबूत संगठन है और दूसरी तरफ अखिलेश यादव का बढ़ता ग्राफ। ऐसे में पार्टी के भीतर की यह 'सर्जिकल स्ट्राइक' बसपा को कितना फायदा पहुंचाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा। फिलहाल, पश्चिमी यूपी के कार्यकर्ताओं के बीच जो खामोशी है, वह चुनाव में किसी बड़े तूफान का संकेत भी हो सकती है। क्या मायावती इन कद्दावर नेताओं की जगह नए और प्रभावशाली चेहरों को खड़ा कर पाएंगी? यह देखना दिलचस्प होगा।

