Kim Jong Un Bengal election 2026: पश्चिम बंगाल के चुनाव और उत्तर कोरिया के खूंखार तानाशाह किम जोंग उन... सुनने में यह मेल थोड़ा अजीब लग सकता है। आप सोच रहे होंगे कि बंगाल की 'मिष्टी दोई' और प्योंगयांग की 'मिसाइलों' का आखिर क्या लेना-देना?
लेकिन यकीन मानिए, चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों ने एक ऐसा कनेक्शन जोड़ दिया है जिसे सुनकर दुनिया हैरान है। आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में मतदाताओं ने वो 'गदर' मचाया है कि तानाशाही वाले रिकॉर्ड भी फीके पड़ गए हैं। जब उत्तर कोरिया में 95 फीसदी वोटिंग होती है, तो दुनिया कहती है कि वहां जनता मजबूर है, लेकिन जब बंगाल में 91.66% लोग स्वेच्छा से बटन दबाते हैं, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र ने इतिहास रच दिया है।
तानाशाहों के लिए 'ट्यूशन': बिना डंडे के रचा इतिहास
अक्सर उत्तर कोरिया जैसे देशों से खबरें आती हैं कि वहां शत-प्रतिशत मतदान हुआ है, लेकिन हर कोई जानता है कि वह बंदूक की नोक पर होता है। किम जोंग उन के राज में वोट न देना अपराध माना जाता है। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल ने लोकतंत्र के ढांचे के भीतर रहकर जिस तरह 91.66% का आंकड़ा छुआ है, वह किम जोंग जैसे शासकों के लिए 'लोकतंत्र की क्लास' लेने जैसा है। बिना किसी तानाशाही और दबाव के, अपनी मर्जी से करोड़ों लोगों का पोलिंग बूथ तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भी बंगाल के इस जज्बे को सलाम करते हुए कहा कि बंगाल ने वो मुकाम हासिल किया है जिसे पाने के लिए दुनिया के तानाशाह तरसते हैं।
1951 से अब तक का सफर: 43% से 91% की छलांग
अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो 1951 के पहले चुनाव में बंगाल महज 43.12% पर सिमटा था। उस समय लोकतंत्र नया था और संसाधन कम। 1980 के दशक में पहली बार बंगाल ने 70% का आंकड़ा पार किया और 2011 के बड़े परिवर्तन वाले चुनाव में यह 84.72% तक पहुंचा। लेकिन वर्तमान चुनाव के इन आंकड़ों ने पुरानी हर लकीर को छोटा कर दिया है। 1951 से आज तक का यह सफरनामा दिखाता है कि बंगाल की जनता अब अपने भविष्य को लेकर कितनी संजीदा हो चुकी है। यह आंकड़ा 1951 के बाद से अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है और इसने त्रिपुरा के 2013 के रिकॉर्ड (91.82%) को लगभग टक्कर दे दी है।
'नारी शक्ति' का डंका: महिलाओं ने पुरुषों को पछाड़ा
इस ऐतिहासिक मतदान की सबसे खूबसूरत तस्वीर महिलाओं की भागीदारी रही। आंकड़ों के अनुसार, पुरुषों ने जहां 91.07 प्रतिशत मतदान किया, वहीं महिलाओं ने 92.8 प्रतिशत वोट डालकर यह साबित कर दिया कि बंगाल की राजनीति की असली चाबी उनके पास है। गांव हो या शहर, महिलाओं की लंबी कतारें सुबह 7 बजे से ही नजर आने लगी थीं। यहां तक कि तीसरे लिंग (थर्ड जेंडर) के मतदाताओं ने भी 91.28 प्रतिशत वोटिंग कर समावेशी लोकतंत्र की मिसाल पेश की। यह जागरूकता बताती है कि बंगाल की महिलाएं अब केवल घर की चौखट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्ता के समीकरण बनाने और बिगाड़ने में सबसे आगे हैं।
चुनाव आयोग की 'लाइव' निगरानी और सुरक्षा का भरोसा
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयुक्त डॉ. एसएस संधू और डॉ. विवेक जोशी के साथ दिल्ली से लाइव वेबकास्टिंग के जरिए हर बूथ पर नजर रखी। सुरक्षा के कड़े इंतजामों और पारदर्शी प्रक्रिया ने मतदाताओं का भरोसा बढ़ाया। यह पहली बार है जब दूसरे चरण में मतदान का ग्राफ 90 के पार गया है। सीईओ कार्यालय के मुताबिक, अभी हजारों पोलिंग स्टेशनों का डेटा पूरी तरह अपडेट होना बाकी है, जिससे यह प्रतिशत और भी ऊपर जा सकता है। यह पारदर्शी प्रक्रिया ही है जो भारत को उत्तर कोरिया जैसे देशों से अलग खड़ा करती है, जहां वोटिंग के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है।
रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी: हार-जीत से बड़ा लोकतंत्र का उत्सव
राजनीतिक दल चाहे अपनी जीत के जो भी दावे करें, लेकिन असली जीत बंगाल के उस आम आदमी की हुई है जिसने चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े रहकर अपना फर्ज निभाया। 1977 के ऐतिहासिक बदलाव के समय भी वोटिंग प्रतिशत 56% के आसपास था, लेकिन इस बार की 'वोटिंग क्रांति' ने साफ कर दिया है कि जनता अब जागरूक हो चुकी है। 3.21 करोड़ लोगों का दूसरे चरण में हिस्सा लेना किसी अजूबे से कम नहीं है। बंगाल ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि जब मतदाता ठान लेता है, तो रिकॉर्ड सिर्फ टूटने के लिए ही बनते हैं। 4 मई के नतीजे चाहे जो हों, लेकिन बंगाल का यह 'वोटिंग रिकॉर्ड' आने वाले दशकों तक भारतीय लोकतंत्र की शान बना रहेगा।

