Dailyhunt
क्या भगवान राम और भगवान परशुराम अलग-अलग 'त्रेता युग' में अवतरित हुए थे? - तथ्य और परंपरा

क्या भगवान राम और भगवान परशुराम अलग-अलग 'त्रेता युग' में अवतरित हुए थे? - तथ्य और परंपरा

Newstrack 3 weeks ago

Parashurama Avatar: यह धारणा कि 'भगवान राम (Lord Rama)' और 'भगवान परशुराम (Parashurama)' अलग-अलग "त्रेता युग" (Treta Yuga) के अलग-अलग क्रमों में अवतरित हुए थे-जैसे 19वें और 24वें त्रेता-शास्त्रीय रूप से प्रमाणित नहीं मानी जाती।

यह अधिकतर लोकव्याख्या या निजी आस्था पर आधारित गणना है, न कि मान्य पुराणिक (Puranic) सिद्धांत।

हिंदू कालगणना के अनुसार समय 'युग चक्र' (Yuga Cycle) में चलता है-सत्य युग (Satya Yuga), त्रेता युग (Treta Yuga), द्वापर युग (Dvapara Yuga) और कलियुग (Kali Yuga)। ये चारों मिलकर एक 'महायुग' (Mahayuga) बनाते हैं। वर्तमान परंपरा के अनुसार हम 'वैवस्वत मन्वंतर' (Vaivasvata Manvantara) के 28वें महायुग के 'कलियुग' में हैं।

शास्त्रों-विशेषकर विष्णु पुराण और भागवत पुराण-के अनुसार 'भगवान परशुराम' और 'भगवान राम' दोनों का अवतार 'त्रेता युग' में ही माना जाता है, और वे एक ही व्यापक युग-काल में आते हैं, न कि लाखों वर्षों के अंतर से अलग-अलग "त्रेता" में। यही कारण है कि महाकाव्य रामायण में दोनों का आमना-सामना भी वर्णित है, जहाँ परशुराम और राम का संवाद होता है। यदि दोनों अलग-अलग करोड़ों वर्ष दूर के युगों में होते, तो यह प्रसंग संभव ही नहीं होता।

जहाँ तक "19वें त्रेता", "24वें त्रेता" या "26वें कलियुग" जैसी संख्याओं की बात है-शास्त्रीय गणना में इस प्रकार की क्रमिक संख्या का प्रयोग इस तरह नहीं किया जाता। 'महायुग' की गणना अवश्य होती है, लेकिन प्रत्येक महायुग में वही चार युग क्रम से चलते हैं। वर्तमान में हम 28वें महायुग के 'कलियुग' में माने जाते हैं, न कि 26वें अलग-अलग कलियुग में।

"38,88,000 वर्ष पूर्व" जैसी तिथियाँ भी प्रामाणिक शास्त्रीय स्रोतों में इस रूप में नहीं मिलतीं। हिंदू कालगणना में युगों की अवधि निश्चित मानी गई है-जैसे त्रेता युग लगभग 12,96,000 वर्ष का-लेकिन किसी विशेष अवतार की सटीक ग्रेगोरियन तिथि (जैसे 19 अप्रैल 2026 के संदर्भ में) इस प्रकार निर्धारित करना पारंपरिक शास्त्रों में नहीं मिलता।

यह अवश्य सत्य है कि 'भगवान परशुराम' भारतीय परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय अवतार माने जाते हैं। उन्हें 'चिरंजीवी' (अमर) भी कहा गया है, और उनकी शिक्षाएँ-विशेषकर धर्म, तप, और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष-आज भी प्रासंगिक मानी जाती हैं।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि ऐसे विषयों में आस्था और शास्त्र दोनों का संतुलन जरूरी है। श्रद्धा अपनी जगह है, लेकिन जब हम कालगणना और इतिहास की बात करते हैं, तो मान्य ग्रंथों और प्रमाणों के आधार पर ही निष्कर्ष निकालना अधिक उचित होता है।

"हरि कथा अनंता"-अर्थात ईश्वर की कथाएँ अनंत हैं, उनकी व्याख्याएँ भी विविध हो सकती हैं। लेकिन तथ्य और परंपरा के आधार को स्पष्ट रखना ही सही 'ज्ञानार्जन' है।

जय परशुराम। जय रेणुका नंदन।

(साभार - विष्णु पुराण, भागवत पुराण, रामायण एवं पारंपरिक वैदिक कालगणना)

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Newstrack Journalism Hindi