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लाल सलाम को जनता का अंतिम प्रणाम! केरल में विजयन फेल, बंगाल में सूपड़ा साफ, अब वामपंथ का भविष्य क्या

लाल सलाम को जनता का अंतिम प्रणाम! केरल में विजयन फेल, बंगाल में सूपड़ा साफ, अब वामपंथ का भविष्य क्या

Newstrack 1 week ago

क समय था जब बंगाल से लेकर केरल तक सिर्फ 'लाल सलाम' की गूँज सुनाई देती थी, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि वामपंथ के पैर पूरी तरह उखड़ चुके हैं। केरल, जो इनका आखिरी मजबूत गढ़ माना जाता था, वहाँ भी अब बदलाव की जबरदस्त आंधी चल चुकी है।

पिनराई विजयन की विदाई के साथ ही भारतीय राजनीति में एक बड़े वामपंथी युग का अंत दिख रहा है।

केरल के चुनावी नतीजों ने सबको चौंका दिया है। रुझान साफ बता रहे हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी यूडीएफ भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर रहा है। पिनराई विजयन की सरकार, जो पिछले दस सालों से मजबूती से टिकी थी, अब सत्ता से बाहर हो गई है। यूडीएफ ने 89 सीटों पर बढ़त बनाकर एलडीएफ को महज 39 सीटों पर समेट दिया है। दस साल की सत्ता विरोधी लहर इतनी भारी पड़ी कि वामपंथियों का आखिरी सहारा भी उनके हाथ से फिसल गया। यह हार सिर्फ एक राज्य की नहीं है, बल्कि उस विचारधारा की हार है जिसने दशकों तक अपनी पकड़ बनाई थी।

पांच दशक में पहली बार बिना कम्युनिस्ट सीएम के भारत

इस चुनाव परिणाम का सबसे ऐतिहासिक पहलू यह है कि अब भारत के किसी भी राज्य में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं बचेगा। पिछले पांच दशकों में ऐसा पहली बार हो रहा है। बंगाल और त्रिपुरा पहले ही हाथ से निकल चुके थे, और अब केरल की विदाई ने वामपंथी दलों को सत्ता के नक्शे से लगभग पूरी तरह गायब कर दिया है। यह भारतीय लोकतंत्र में एक बड़े बदलाव का संकेत है। जिस विचारधारा ने देश की राजनीति को दशकों तक गहराई से प्रभावित किया, आज वह पूरी तरह हाशिए पर पहुँच चुकी है। चुनावी गणित और जनता की पसंद अब बुनियादी तौर पर बदल चुकी है।

बंगाल और त्रिपुरा की गौरवशाली यादें अब सिर्फ इतिहास

एक दौर था जब पश्चिम बंगाल में 34 साल तक वामपंथियों का एकछत्र राज था। आज वहां उनकी हालत यह है कि वे दो सीटें जीतने के लिए भी तरस रहे हैं। ममता बनर्जी की आंधी ने पहले उन्हें सत्ता से बेदखल किया और अब वहां की लड़ाई सिर्फ टीएमसी और बीजेपी के बीच सिमट गई है। त्रिपुरा में भी भाजपा ने उनकी जड़ों को उखाड़ फेंका है। वामपंथी दल अब न तो गांवों के गरीब मजदूरों को जोड़ पा रहे हैं और न ही शहरों के मध्यम वर्ग को। उनकी नीतियां और नारे अब बहुत पुराने पड़ चुके हैं और जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया है।

आखिर जनता ने वामपंथ से क्यों मोड़ा अपना मुँह?

सवाल यह है कि आखिर वामपंथ क्यों सिमटता गया? 2004 में लोकसभा में 59 सीटें जीतने वाले ये दल आज 6 सीटों पर आकर रुक गए हैं। आज का युवा वर्ग क्रांतिकारी सपनों के बजाय बेहतर आर्थिक अवसर, तकनीक और वैश्विक विकास चाहता है। वैश्वीकरण और निजीकरण के दौर में साम्यवादी राजनीति लोगों को बहुत पुरानी लगने लगी है। वामपंथी दलों के पास अब कोई राष्ट्रीय स्तर का बड़ा चेहरा भी नहीं बचा है जो युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सके। चीन और रूस ने भी अपना पुराना रास्ता बदल लिया है, तो जनता पीछे क्यों?

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