Lucknow First Hindu King History: लखनऊ का पहला हिंदू राजा कौन था? इसका एक सीधा और निर्विवाद उत्तर इतिहास में नहीं मिलता। यही इस प्रश्न को रोचक बनाता है। लखनऊ का प्राचीन इतिहास लोककथाओं, धार्मिक स्मृतियों, जातीय परंपराओं और बाद के ऐतिहासिक अभिलेखों के बीच बिखरा हुआ है।
एक मत लखनऊ को भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण से जोड़ता है। कहा जाता है कि अयोध्या के राजा राम ने लंका-विजय के बाद गोमती नदी के किनारे यह क्षेत्र लक्ष्मण को दिया। इसलिए इस जगह को पहले लक्ष्मणपुरी या लछमनपुरी कहा गया। बाद में यही नाम बदलते-बदलते लखनपुर, लखनौती, लखनऊ और अंततः लखनऊ बन गया। लेकिन यह कथा अधिकतर पौराणिक और लोकविश्वास पर आधारित है। इतिहासकार अब्दुल हलीम शरर ने भी अवध के इतिहास पर लिखते हुए माना कि यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि लखनऊ कब बसा, किसने बसाया और इसका नाम कैसे पड़ा। उन्होंने लक्ष्मणपुरी वाली परंपरा का उल्लेख किया, पर उसे अंतिम प्रमाण की तरह नहीं रखा।
लखनऊ का पहला हिंदू राजा: सवाल क्यों है इतना जटिल?
अगर प्रश्न 'पहला हिंदू राजा'सके अर्थ में पूछा जाए, तो लोकपरंपरा में लक्ष्मण को लखनऊ से जुड़ा सबसे प्राचीन राजपुरुष माना जाता है। पर लक्ष्मण ऐतिहासिक राजा की तरह अभिलेखों में दर्ज शासक नहीं हैं। वे रामायण परंपरा के महापुरुष हैं। इसलिए उन्हें लखनऊ का 'पौराणिक संस्थापक'सकहा जा सकता है।

लेकिन आधुनिक इतिहास की कसौटी पर 'प्रमाणित पहला राजा' कहना कठिन है। लखनऊ के नाम को लेकर भी कई व्याख्याएँ हैं। एक व्याख्या लक्ष्मणपुरी की है। दूसरी व्याख्या 'लखों नाव'ससे जुड़ी है। इसमें कहा जाता है कि गोमती और पुराने जल-मार्गों वाले क्षेत्र में नावें बहुत थीं, इसलिए स्थान का नाम लखों नाव से लखनऊ बना। तीसरी व्याख्या लाखन या लखना पासी से जुड़ती है। यही कारण है कि लखनऊ की उत्पत्ति पर इतिहास, लोककथा और सामाजिक स्मृति एक साथ चलती हैं।
पासी समाज और अवध का लोक-राज्य: एक अनदेखा इतिहास
दूसरा बड़ा नाम राजा लाखन पासी का है। कई सामाजिक और स्थानीय परंपराएँ उन्हें लखनऊ का वास्तविक बसाने वाला या शुरुआती स्थानीय राजा मानती हैं। यह मत विशेष रूप से पासी समाज और दलित इतिहास-लेखन में मजबूत रूप से सामने आता है। इस दृष्टि के अनुसार लखनऊ का नाम लाखन पासी या उनकी पत्नी लखनावती से जुड़ा माना जाता है। कई दावों में कहा जाता है कि लाखन पासी ने 10वीं या 11वीं शताब्दी के आसपास इस क्षेत्र में शासन किया। भारतीय एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में भी यह उल्लेख है कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में लाखन पासी को 10वीं-11वीं शताब्दी का स्थानीय शासक माना जाता है और उन्हें लखनऊ शहर की स्थापना से जोड़ा जाता है। उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लखनऊ की उत्पत्ति को लेकर लक्ष्मण और लाखन पासी-दोनों परंपराएँ साथ-साथ मौजूद हैं।
लाखन पासी की कथा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लखनऊ को केवल नवाबों के शहर के रूप में नहीं देखती। यह उससे पहले के लोक-राज्य, स्थानीय समुदायों और ग्रामीण सत्ता-संरचना को सामने लाती है। अवध क्षेत्र में पासी शासकों, किलों और स्थानीय गढ़ों की स्मृतियाँ कई जगह मिलती हैं।

लखनऊ, बाराबंकी, मलिहाबाद, हरदोई, सीतापुर, उन्नाव और रायबरेली जैसे इलाकों में पासी समाज की ऐतिहासिक उपस्थिति को लेकर कई दावे किए जाते हैं। आधुनिक राजनीतिक विमर्श में भी लाखन पासी का नाम बार-बार इसलिए उठता है, क्योंकि यह लखनऊ की पहचान को केवल राजदरबार, नवाब और तहजीब तक सीमित नहीं रखता। यह उसे स्थानीय मूलनिवासी, किसान-योद्धा और बहुजन इतिहास से भी जोड़ता है।
लखनऊ का पुराना भूगोल: टीले, किले और प्राचीन बस्तियाँ
लखनऊ के पुराने भूगोल में 'टीला', 'गढ', 'किला', 'कुंड' और 'पुरानी बस्तियाँ' जैसे संकेत मिलते हैं। लाखन पासी से जुड़ी परंपराएँ अक्सर कहती हैं कि पुराने लखनऊ के ऊँचे टीले पर उनका किला था। कुछ स्थानीय दावों में वर्तमान केजीएमयू और पुराने मच्छी भवन क्षेत्र के आसपास प्राचीन सत्ता-केंद्रों की बात की जाती है।

हालांकि इन दावों की पुष्टि के लिए व्यवस्थित पुरातात्विक प्रमाण पर्याप्त रूप से सार्वजनिक रूप में उपलब्ध नहीं हैं। यही वजह है कि इतिहासकार इस विषय पर सावधानी बरतते हैं। वे लाखन पासी की परंपरा को अस्वीकार भी नहीं करते। पर उसे प्रमाणित राजवंशीय इतिहास की तरह पूरी निश्चितता से स्वीकार भी नहीं करते। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी कहती है कि लाखन पासी के बारे में बहुत कम ठोस जानकारी उपलब्ध है, लेकिन कुछ विवरण उन्हें 10वीं या 11वीं शताब्दी से जोड़ते हैं।
इसलिए निष्कर्ष यह है कि लखनऊ का सबसे प्राचीन पौराणिक हिंदू नाम लक्ष्मण से जुड़ता है, जबकि लखनऊ के शुरुआती स्थानीय ऐतिहासिक-लोक शासक के रूप में राजा लाखन पासी का नाम प्रमुखता से आता है। अगर धार्मिक-पुराणिक परंपरा के आधार पर पूछा जाए, तो उत्तर होगा-लक्ष्मण। अगर स्थानीय सामाजिक इतिहास और मध्यकालीन लोक-राज्य की परंपरा के आधार पर पूछा जाए, तो उत्तर होगा-राजा लाखन पासी। लेकिन यदि कठोर ऐतिहासिक प्रमाण की कसौटी रखी जाए, तो यह कहना अधिक ईमानदार होगा कि लखनऊ के पहले हिंदू राजा का नाम निर्णायक रूप से प्रमाणित नहीं है। उपलब्ध स्मृतियों में लक्ष्मण और लाखन पासी-दोनों सबसे प्रमुख नाम हैं।
लखनऊ का आकर्षण भी इसी में है। यह शहर किसी एक कथा से नहीं बना। यह रामायण की स्मृति से भी बना। पासी राजाओं की लोकगाथाओं से भी बना। मुगल प्रशासन से भी बना। नवाबी संस्कृति से भी बना। 1775 में नवाब आसफ-उद-दौला ने अवध की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाई, तब यह शहर बड़े सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा। लेकिन उसका बीज इससे बहुत पहले पड़ चुका था। इस बीज को कोई लक्ष्मणपुरी कहता है। कोई लाखन पासी की नगरी कहता है। कोई लखों नाव का शहर कहता है। यही लखनऊ की असली खूबसूरती है। इसका इतिहास एक रेखा नहीं है। यह कई परतों वाला इतिहास है। और इन्हीं परतों में लक्ष्मण और लाखन पासी-दोनों अपने-अपने अर्थ में लखनऊ की आरंभिक स्मृति के महत्वपूर्ण पात्र हैं।

