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ममता के '23 सिपहसालारों' की डूब गई नैया! शिक्षा मंत्री से दमकल मंत्री तक... BJP की आंधी में उड़ गए TMC के दिग्गज

ममता के '23 सिपहसालारों' की डूब गई नैया! शिक्षा मंत्री से दमकल मंत्री तक... BJP की आंधी में उड़ गए TMC के दिग्गज

Newstrack 1 week ago

West Bengal election result 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे केवल एक सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह उस सांगठनिक ढांचे के बिखरने की गवाही दे रहे हैं जिसे ममता बनर्जी ने पिछले डेढ़ दशक में खून-पसीने से सींचा था।

दोपहर 3 बजे तक के आंकड़ों ने बंगाल की सियासत में वो भूकंप ला दिया है जिसकी कल्पना शायद खुद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने भी नहीं की होगी। चुनावी इतिहास में इसे अब तक का सबसे बड़ा उलटफेर कहा जा रहा है, क्योंकि ममता बनर्जी की कैबिनेट के 23 निवर्तमान मंत्री अपनी-अपनी सीटों पर पीछे चल रहे हैं। यह रुझान साफ करते हैं कि बंगाल की जनता का गुस्सा केवल सरकार के खिलाफ नहीं था, बल्कि सीधे उन चेहरों के खिलाफ था जो सत्ता के गलियारों में सबसे ताकतवर माने जाते थे।

ममता के सिपहसालारों की हार का गणित: शहरी गढ़ों में लगी सेंध

सबसे ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे उन इलाकों से आए हैं जिन्हें टीएमसी का अभेद्य किला माना जाता था। कोलकाता के शहरी क्षेत्रों और उपनगरों में भाजपा की लहर ने टीएमसी के दिग्गजों को तिनके की तरह उड़ा दिया है। दमदम और बिधाननगर जैसे हाई-प्रोफाइल इलाकों में जनता ने मंत्रियों को पूरी तरह नकार दिया है। शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु, जो राज्य की शिक्षा नीति का चेहरा थे, दमदम केंद्र से पीछे चल रहे हैं। वहीं, दमकल मंत्री सुजीत बसु भी बिधाननगर में अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शहरी मतदाताओं की यह नाराजगी सीधे तौर पर मंत्रियों के कामकाज और विभाग की कार्यशैली पर एक कड़ा प्रहार है।

उत्तर से दक्षिण तक मंत्रियों की कतार: कौन-कौन हुआ धराशायी?

हार की यह लहर किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल और दक्षिण बंगाल के उपजाऊ मैदानों तक फैली दिखी। उत्तर बंगाल विकास मंत्री उदयन गुह का दिनहाटा से पिछड़ना टीएमसी के लिए एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका है। इसी तरह, सिंचाई मंत्री मानस भूंइया सबंग में अपनी पकड़ खो चुके हैं, और पंचायत मंत्री प्रदीप मजूमदार दुर्गापुर पूर्व में पिछड़ रहे हैं।

पिछड़ने वाले मंत्रियों की सूची इतनी लंबी है कि इसने पार्टी के भीतर हड़कंप मचा दिया है। उपभोक्ता संरक्षण मंत्री शशिकान्त महाता (सालबनी), परिवहन मंत्री स्नेहाशीष चक्रवर्ती (जांगीपाड़ा), और वन मंत्री बीरबाहा हांसदा (बिनपुर) जैसे नाम इस सूची में शामिल हैं। वित्त और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहीं चंद्रीमा भट्टाचार्य भी दमदम उत्तर सीट से पीछे चल रही हैं। तकनीकी शिक्षा मंत्री इंद्रनील सेन चंदननगर में पिछड़ गए हैं, जबकि सिंचाई राज्य मंत्री सबिना यास्मिन मोथाबाड़ी में संघर्ष कर रही हैं। इन दिग्गजों की हार का सीधा मतलब है कि जनता अब केवल बड़े नामों पर नहीं, बल्कि काम के हिसाब से वोट दे रही है।

कयामत के बीच कुछ चिराग रोशन: फिरहाद और शोभनदेव की साख बरकरार

टीएमसी के लिए इस 'चुनावी आपदा' के बीच कुछ ही राहत की खबरें आईं। कोलकाता पोर्ट से फिरहाद हकीम और बालीगंज से शोभनदेव चटर्जी ने अपनी व्यक्तिगत छवि और जमीनी पकड़ के दम पर हार की लहर को रोक लिया। फिरहाद हकीम भारी मतों से अपनी जीत पक्की करते दिख रहे हैं, वहीं शोभनदेव चटर्जी भी बालीगंज से एक बड़े अंतर के साथ आगे चल रहे हैं। इन कुछ नामों को छोड़कर बाकी कैबिनेट की हालत बहुत पतली नजर आ रही है।

आखिर क्यों डूबी टीएमसी के दिग्गजों की नैया?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन दिग्गजों की हार के पीछे तीन मुख्य कारण रहे। पहला, मंत्रियों के खिलाफ उनके ही निर्वाचन क्षेत्रों में पनपा 'एंटी-इन्कंबेंसी' यानी सत्ता विरोधी लहर। जनता अपने स्थानीय मुद्दों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर मंत्रियों से बेहद खफा थी। दूसरा बड़ा कारण रहा विभागों का खराब प्रदर्शन। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्रियों का पिछड़ना यह बताता है कि जनता ने भर्ती घोटालों और अस्पताल की बदहाली पर अपना फैसला सुना दिया है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा टीएमसी के सांगठनिक ढांचे में आई दरार। मंत्रियों की हार का मतलब है कि इस बार बूथ स्तर पर टीएमसी का चुनाव प्रबंधन पूरी तरह विफल रहा और कार्यकर्ताओं का भरोसा डगमगा गया।

एक नजर में मंत्रियों की स्थिति

दोपहर 3 बजे तक के चुनाव आयोग के आधिकारिक रुझानों के मुताबिक, कुल 23 निवर्तमान मंत्री अपनी सीटों पर हार की कगार पर थे। शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु और स्वास्थ्य एवं वित्त राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य के पिछड़ने ने सबको हैरान किया। हालांकि फिरहाद हकीम और शोभनदेव चटर्जी जैसे कुछ चेहरे अपनी साख बचाने में कामयाब रहे, लेकिन उत्तर बंगाल के सबसे बड़े नेता और मंत्री उदयन गुह का दिनहाटा से पीछे होना यह संकेत है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। क्या अंतिम नतीजों तक ये मंत्री कोई करिश्मा कर पाएंगे? इसकी संभावना अब बहुत कम दिख रही है।

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