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Miroslav Klose Biography: मीरोस्लाव क्लोज़े की कहानी, जिसने विश्वकप में सबसे ज्यादा गोल किए

Miroslav Klose Biography: मीरोस्लाव क्लोज़े की कहानी, जिसने विश्वकप में सबसे ज्यादा गोल किए

Newstrack 1 week ago

Miroslav Klose Biography: विश्व फुटबॉल के इतिहास में जब महान गोलस्कोररों की चर्चा होती है तो सामान्यतः लोगों के मन में पेले, गर्ड मुलर, रोनाल्डो नाज़ारियो, माराडोना, मेसी या क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे बड़े नाम आते हैं।

लेकिन फुटबॉल का इतिहास एक दिलचस्प सत्य भी बताता है-कई बार सबसे बड़े रिकॉर्ड उन खिलाड़ियों के पास होते हैं जो सबसे अधिक प्रचारित नहीं होते। वे चमकदार सुर्खियों के केंद्र में नहीं रहते, वे विवादों में नहीं घिरते, वे स्वयं को सबसे बड़ा सिद्ध करने की कोशिश नहीं करते, लेकिन जब आंकड़े खोले जाते हैं तो पता चलता है कि उन्होंने इतिहास में ऐसी जगह बना ली है जहां पहुंचना लगभग असंभव है।

मीरोस्लाव जोज़ेफ़ क्लोज़े ऐसे ही महान खिलाड़ियों में शामिल हैं।

विश्वकप इतिहास में सबसे अधिक गोल करने का रिकॉर्ड आज भी उनके नाम है। उन्होंने चार विश्वकप खेले और कुल 16 गोल किए। यह संख्या केवल एक रिकॉर्ड नहीं है; यह दो दशकों तक फैली निरंतरता, अनुशासन और बड़े मंच पर प्रदर्शन करने की क्षमता का प्रमाण है। आश्चर्य की बात यह है कि अपनी असाधारण उपलब्धियों के बावजूद क्लोज़े कभी फुटबॉल के सबसे बड़े सेलिब्रिटी नहीं बने। शायद यही कारण है कि उन्हें समझना और भी रोचक हो जाता है।

पोलैंड से जर्मनी तक का संघर्षमय बचपन

मीरोस्लाव जोज़ेफ़ क्लोज़े का जन्म 9 जून 1978 को पोलैंड के ओपोले नगर में हुआ। उनका परिवार खेलों से जुड़ा हुआ था। पिता जोज़ेफ़ क्लोज़े पेशेवर फुटबॉलर थे और मां बारबरा क्लोज़े हैंडबॉल की राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुकी थीं। इस प्रकार खेल उनके परिवार की जीवनशैली का हिस्सा था। लेकिन उनका बचपन किसी सुपरस्टार खिलाड़ी की तरह नहीं बीता। मीरोस्लाव क्लोज़े जब सिर्फ ८ साल के थे, तब उनका परिवार पोलैंड से फ्रांस होते हुए तत्कालीन पश्चिम जर्मनी में आकर बस गया था। जर्मनी आने के समय क्लोज़े को जर्मन भाषा के सिर्फ दो शब्द आते थे, जिसके कारण स्कूल में शुरुआत में उन्हें अपने से दो क्लास छोटे बच्चों के साथ बैठकर पढ़ाई करनी पड़ी थी।

जब वे छोटे थे, तब उनका परिवार जर्मनी चला गया। नए देश, नई भाषा और नई सामाजिक परिस्थितियों के बीच उन्हें स्वयं को ढालना पड़ा। यही अनुभव उनके व्यक्तित्व में विनम्रता और धैर्य लेकर आया। बाद के वर्षों में भी उन्होंने कभी स्वयं को चमकदार नायक की तरह प्रस्तुत नहीं किया। वे हमेशा टीम को प्राथमिकता देने वाले खिलाड़ी बने रहे।

उनकी शिक्षा जर्मनी में हुई। पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉल भी चलता रहा। लेकिन एक तथ्य बहुत कम लोगों को पता है कि क्लोज़े का विकास अन्य महान खिलाड़ियों की तुलना में अपेक्षाकृत देर से हुआ। वे किशोरावस्था में कोई बड़े फुटबॉल चमत्कार नहीं माने जाते थे। वे उन खिलाड़ियों में नहीं थे जिनके बारे में पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में कहा जाने लगे कि यह भविष्य का सुपरस्टार है। वास्तव में उन्होंने पेशेवर स्तर तक पहुंचने के लिए लंबा संघर्ष किया।

उन्होंने शुरुआती वर्षों में बढ़ईगीरी का प्रशिक्षण भी लिया। फुटबॉल के साथ-साथ व्यावसायिक जीवन की तैयारी करना उस समय आवश्यक था क्योंकि किसी को विश्वास नहीं था कि वे एक दिन विश्व फुटबॉल के महानतम गोलस्कोररों में शामिल होंगे। यही पृष्ठभूमि उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक रही। सफलता मिलने के बाद भी वे जमीन से जुड़े रहे। क्लोज़े ने १९ वर्ष की उम्र तक एक पेशेवर बढ़ई के रूप में काम सीखा था और वे घरों की छतें बनाने व लकड़ी के ढांचे तैयार करने का काम करते थे। वे शौकिया तौर पर जर्मनी की सातवीं डिवीज़न की एक स्थानीय टीम के लिए फुटबॉल खेलते थे, जहाँ से उनका सफर शुरू हुआ।

जब कैसरस्लाउटर्न ने दुनिया को नया स्ट्राइकर दिया

उनका पेशेवर उदय कैसरस्लाउटर्न क्लब के साथ शुरू हुआ। यहीं उन्होंने पहली बार बड़े स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। उनकी हेडिंग क्षमता, सही समय पर सही स्थान पर पहुंचने की कला और गोल के सामने उनकी सहजता ने विशेषज्ञों को प्रभावित किया। वे अत्यधिक तेज खिलाड़ी नहीं थे। वे ड्रिब्लिंग के जादूगर भी नहीं थे। लेकिन उनके पास एक दुर्लभ गुण था-उन्हें पता होता था कि गेंद कहां गिरेगी।

फुटबॉल में इस क्षमता को अक्सर "पोज़िशनल इंटेलिजेंस" कहा जाता है। बहुत से खिलाड़ी गेंद के पीछे दौड़ते हैं, लेकिन महान स्ट्राइकर गेंद के पहुंचने से पहले सही स्थान पर पहुंच जाते हैं। क्लोज़े इसी कला के उस्ताद थे।

2002 विश्वकप : दुनिया ने नए गोल मशीन को पहचाना

2002 का विश्वकप उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उस समय बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि वे टूर्नामेंट के सबसे चर्चित खिलाड़ियों में शामिल होंगे। लेकिन उन्होंने पांच गोल किए और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। विशेष रूप से उनकी हेडिंग क्षमता ने सभी को प्रभावित किया। उस विश्वकप में उनके अधिकांश गोल सिर से आए और यह स्पष्ट हो गया कि जर्मनी को नया स्ट्राइकर मिल चुका है। २००२ के उस विश्वकप में क्लोज़े ने सऊदी अरब के खिलाफ शानदार हैट्रिक सहित कुल ५ गोल दागे थे। अविश्वसनीय सच यह है कि उस विश्वकप के उनके सभी के सभी ५ गोल सिर्फ 'हेडर' (सिर से किए गए गोल) से आए थे, जो विश्वकप के इतिहास में एक अनूठा रिकॉर्ड है। इसी टूर्नामेंट से गोल करने के बाद हवा में उनकी कलाबाज़ी यानी 'फ्रंट-फ्लिप' सेलिब्रेशन उनकी वैश्विक पहचान बन गया।

इसके बाद उनका करियर लगातार आगे बढ़ता गया। उन्होंने एसवी वेरदेर ब्रेमन के लिए खेला और वहां अपने खेल को और निखारा। ब्रेमेन में उन्होंने केवल गोल करना ही नहीं सीखा, बल्कि टीम के लिए खेलने की कला भी विकसित की। वे ऐसे स्ट्राइकर बने जो स्वयं गोल कर सकते थे और साथियों के लिए अवसर भी बना सकते थे।

क्लब फुटबॉल में निरंतर सफलता

बाद में वे बेयर्न म्यूनिख पहुंचे। बायर्न में प्रतिस्पर्धा अत्यंत कठिन थी। यहां विश्व स्तरीय खिलाड़ियों की भरमार थी। लेकिन क्लोज़े ने अपनी मेहनत और पेशेवर व्यवहार से सभी का सम्मान अर्जित किया। वे उन खिलाड़ियों में से हैं जिनके बारे में कोच कभी शिकायत नहीं करते। चाहे उन्हें शुरुआती एकादश में स्थान मिले या न मिले, उनका व्यवहार समान रहता था। बायर्न म्यूनिख के लिए खेलते हुए क्लोज़े ने ४ सफल सीजन बिताए, जहाँ उन्होंने २ बार बुंडेसलीगा और २ बार डीएफबी-पोकाल कप का खिताब जीता। इसके बाद २०११ में वे इटली के प्रसिद्ध क्लब लाज़ियो (SS Lazio) से जुड़े, जहाँ उन्होंने एक ही मैच में अकेले ५ गोल दागने का क्लब इतिहास का सबसे बड़ा कीर्तिमान रचा।

राष्ट्रीय टीम के साथ उनका सफर और भी शानदार रहा। 2006 विश्वकप जर्मनी में आयोजित हुआ और क्लोज़े ने गोल्डन बूट जीता। वे लगातार दूसरी बार विश्वकप के प्रमुख गोलस्कोररों में शामिल हुए। 2010 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्वकप में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। तब तक वे विश्वकप इतिहास के महान गोलस्कोररों की सूची में ऊपर पहुंच चुके थे।

लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अभी बाकी थी।

2014 : जब इतिहास बदल गया

2014 का विश्वकप। ब्राज़ील की धरती। जर्मनी खिताब का दावेदार। और क्लोज़े अपने चौथे विश्वकप में।इस टूर्नामेंट में उन्होंने वह रिकॉर्ड तोड़ा जिसे लंबे समय तक अटूट माना जाता था। उन्होंने रोनाल्डो नाज़ारियो के 15 विश्वकप गोलों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया और 16 गोलों के साथ विश्वकप इतिहास के सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए।

यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं थी। यह उन वर्षों की कहानी थी जिनमें उन्होंने लगातार बड़े मंच पर प्रदर्शन किया था। चार विश्वकप। सोलह गोल। और अंततः विश्वकप ट्रॉफी। ८ जुलाई २०१४ को बेलो होरिज़ोंटे में ब्राज़ील के खिलाफ हुए ऐतिहासिक सेमीफाइनल (जर्मनी की ७-१ से जीत) के २३वें मिनट में क्लोज़े ने अपना ऐतिहासिक १६वाँ विश्वकप गोल दागा था। उन्होंने ब्राज़ील के महान रोनाल्डो नाज़ारियो के १५ गोलों के रिकॉर्ड को उन्हीं की घरेलू धरती पर उन्हीं के सामने तोड़कर इतिहास रचा था।

जब जर्मनी ने फाइनल में अर्जेंटीना को हराकर खिताब जीता, तब क्लोज़े का करियर पूर्णता को प्राप्त हुआ। बहुत से महान खिलाड़ी विश्वकप जीतने का सपना अधूरा छोड़ देते हैं। लेकिन क्लोज़े ने रिकॉर्ड भी बनाया और ट्रॉफी भी जीती। मीरोस्लाव क्लोज़े ने जर्मनी की राष्ट्रीय टीम के लिए कुल १३७ अंतरराष्ट्रीय मैचों में रिकॉर्ड ७१ गोल दागे हैं। वे जर्मनी के इतिहास के 'सर्वकालिक शीर्ष गोलस्कोरर' हैं। उन्होंने महान गर्ड मुलर (६८ गोल) के दशकों पुराने रिकॉर्ड को तोड़ा था।

खेल भावना का अद्वितीय उदाहरण

उनकी खेल शैली का विश्लेषण किया जाए तो वह आधुनिक फुटबॉल के लिए अत्यंत शिक्षाप्रद है। वे दिखावटी खिलाड़ी नहीं थे। वे अनावश्यक कौशल प्रदर्शन नहीं करते थे। वे अपने कार्य को समझते थे और उसे अत्यंत दक्षता से निभाते थे। उनकी हेडिंग अद्भुत थी। दोनों पैरों से फिनिशिंग प्रभावी थी। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि वे टीम की सामूहिक संरचना को समझते थे।

उनके चरित्र का एक प्रसिद्ध उदाहरण अक्सर दिया जाता है। एक मैच में रेफरी ने गलती से उनकी टीम के पक्ष में गोल दे दिया था। क्लोज़े स्वयं रेफरी के पास गए और बताया कि गेंद हाथ से लगी थी। गोल रद्द कर दिया गया। आधुनिक प्रतिस्पर्धी खेलों में ऐसी ईमानदारी अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। यही कारण है कि उन्हें केवल महान खिलाड़ी नहीं, बल्कि महान खेल व्यक्तित्व भी माना जाता है। वर्ष २०१२ में लाज़ियो के लिए खेलते हुए नापोली के खिलाफ मैच में क्लोज़े ने खुद रेफरी से कहकर अपना गोल रद्द करवाया था, क्योंकि गेंद उनके हाथ से लगी थी। इससे पहले २००५ में वेर्डर ब्रेमेन के लिए खेलते हुए उन्होंने रेफरी को पेनाल्टी देने से रोका था, क्योंकि विरोधी गोलकीपर का टैकल बिल्कुल साफ था। उनके इन अद्वितीय कदमों के लिए उन्हें दो बार जर्मन फुटबॉल एसोसिएशन का 'फेयर प्ले अवार्ड' दिया गया था।

आर्थिक दृष्टि से वे सफल रहे, लेकिन कभी अत्यधिक व्यावसायिक सुपरस्टार नहीं बने। उनका संबंध Adidas सहित कई कंपनियों से रहा, लेकिन उन्होंने हमेशा अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण सार्वजनिक छवि बनाए रखी। वे उन खिलाड़ियों में नहीं थे जो हर समय मीडिया की सुर्खियों में बने रहें।

उनका पारिवारिक जीवन भी स्थिर रहा। पत्नी सिल्विया और उनके बच्चों ने हमेशा उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सफलता के चरम पर भी उन्होंने परिवार और निजी जीवन को महत्व दिया। यही कारण था कि वे मानसिक रूप से संतुलित बने रहे।

खान-पान और फिटनेस के मामले में क्लोज़े अनुशासन के प्रतीक थे। उनका लंबा करियर केवल प्रतिभा के कारण संभव नहीं था। उन्होंने अपने शरीर की देखभाल की, प्रशिक्षण को गंभीरता से लिया और खेल विज्ञान के बदलते मानकों के साथ स्वयं को ढाला। यही कारण था कि वे तीसरे दशक के उत्तरार्ध तक भी उच्च स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके।

संन्यास के बाद भी फुटबॉल की सेवा

संन्यास के बाद उन्होंने कोचिंग और खिलाड़ी विकास के क्षेत्र में रुचि दिखाई। उनका अनुभव और शांत स्वभाव उन्हें युवा खिलाड़ियों के लिए आदर्श मार्गदर्शक बनाता है। आज भी जर्मनी में उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।

मीरोस्लाव क्लोज़े की कहानी हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देती है। महानता केवल चमकदार प्रतिभा का परिणाम नहीं होती। कई बार महानता निरंतरता, अनुशासन और विनम्रता से भी निर्मित होती है। वे शायद माराडोना की तरह नाटकीय नहीं थे, रोनाल्डिन्हो की तरह जादुई नहीं थे और क्रिस्टियानो रोनाल्डो की तरह वैश्विक ब्रांड भी नहीं बने। लेकिन जब विश्वकप इतिहास के आंकड़े खोले जाते हैं, तो सबसे ऊपर उनका नाम दिखाई देता है।

यदि पीटर श्माइकल नेतृत्व के प्रतीक थे, यदि बुफोन दीर्घायु के और यदि बैज्जियो संवेदनशीलता के, तो मीरोस्लाव क्लोज़े विश्वसनीय उत्कृष्टता के प्रतीक हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि फुटबॉल में सबसे ऊंचे स्थान तक पहुंचने के लिए हमेशा सबसे अधिक शोर मचाना आवश्यक नहीं होता। कभी-कभी शांत रहकर भी इतिहास लिखा जा सकता है।

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