Jhalmuri Politics: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से पहले जहां राजनीतिक हलचल अपने चरम पर है, वहीं इस बार चुनावी चर्चा केवल सीटों और सत्ता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि जीत के जश्न में बांटी जाने वाली मिठाइयों और पकवानों तक पहुंच गई है।
4 मई को आने वाले नतीजों से पहले यह सवाल भी सुर्खियों में है कि आखिर बंगाल में किस पार्टी की जीत पर कौन-सा स्वाद हवा में घुलेगा।
BJP के चुनावी जश्न के "मेन्यू" में बड़ा बदलाव
भारतीय जनता पार्टी ने इस बार चुनावी जश्न के "मेन्यू" में बड़ा बदलाव करने के संकेत दिए हैं। आमतौर पर भाजपा अपनी जीत का जश्न लड्डू बांटकर मनाती रही है, लेकिन बंगाल में पार्टी स्थानीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए 'झालमुड़ी' को भी शामिल कर सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों के दौरान इस बात का इशारा भी किया था। नादिया की एक रैली में उन्होंने कहा था कि 4 मई को जीत का जश्न मिठाइयों के साथ-साथ झालमुड़ी बांटकर मनाया जाएगा।
झालमुड़ी, जो पश्चिम बंगाल का बेहद लोकप्रिय स्ट्रीट फूड है, उसे बीजेपी अपनी रणनीति के तहत स्थानीय जुड़ाव का प्रतीक बना रही है। पार्टी का मानना है कि यह सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि आम लोगों से जुड़ने और राज्य की सांस्कृतिक पहचान को अपनाने का एक तरीका है। इसके जरिए भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह बंगाल की जमीन और यहां की परंपराओं से जुड़ी हुई है।
पारंपरिक 'संदेश' को दिया जा रहा राजनीतिक रंग
दूसरी ओर, कोलकाता की प्रसिद्ध मिठाई दुकानों ने भी चुनावी माहौल को खास बना दिया है। इन दुकानों पर पारंपरिक 'संदेश' को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। मिठाइयों पर बीजेपी का कमल, टीएमसी का जोड़ा फूल और अन्य दलों के चुनाव चिन्ह बनाए जा रहे हैं। बड़ी संख्या में कार्यकर्ता अपने-अपने दल के प्रतीकों वाले संदेश की एडवांस बुकिंग कर रहे हैं। यह पहली बार है जब बंगाल की पारंपरिक मिठाइयों का इस्तेमाल इतने बड़े स्तर पर राजनीतिक प्रचार और जश्न के लिए किया जा रहा है।
रसगुल्ला सिर्फ मिठाई नहीं, सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक
पश्चिम बंगाल में रसगुल्ला सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। ममता बनर्जी सरकार ने इसके लिए भौगोलिक संकेत (GI Tag) भी हासिल किया है। टीएमसी समर्थकों का मानना है कि जीत का जश्न रसगुल्ले और 'मिष्टी दोई' के बिना अधूरा है। उनके लिए यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि बंगाल की परंपरा और गौरव का प्रतीक है। इसके उलट बीजेपी 'झालमुड़ी' और 'कमल संदेश' के जरिए एक नया चुनावी ट्रेंड स्थापित करने की कोशिश में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुकाबला केवल चुनावी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीकों का भी है। एक ओर पारंपरिक मिठास है, तो दूसरी ओर नया और चटपटा विकल्प। हरियाणा चुनाव के दौरान 'जलेबी' को लेकर हुई चर्चाओं के बाद बीजेपी अब बंगाल में 'झालमुड़ी' को चुनावी प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जैसे जलेबी ने सुर्खियां बटोरी थीं, वैसे ही बंगाल में झालमुड़ी जीत का नया प्रतीक बन सकती है।
हालांकि टीएमसी ने इसे बंगाल की मिठाई परंपरा का अपमान बताया है और कहा है कि इससे राज्य की समृद्ध खाद्य संस्कृति को कमतर दिखाने की कोशिश हो रही है। कोलकाता की मिठाई दुकानों में नतीजों से पहले ही भारी ऑर्डर बुक हो चुके हैं। अगर बीजेपी जीतती है, तो सड़कों पर झालमुड़ी और भगवा संदेश नजर आ सकते हैं। वहीं टीएमसी की वापसी होने पर रसगुल्ले और मिष्टी दोई की मिठास छा जाएगी। इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव ने राजनीति के साथ-साथ स्वाद और संस्कृति को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

