Neet UG Paper Leak 2026: नीट यूजी का पेपर आउट हो गया। लाखों रुपये में एक एक पर्चा बेचा गया।कितनों ने खरीदा, कोई गिनती नहीं। हल्ला हुआ तो परीक्षा रद कर दी गई। अब फिर होगी। दिन भी चुन कर रखा है, 21 जून।
इंटरनेशनल योग डे। बढ़िया है। छात्र और उनके पेरेंट्स के लिए ये भी सब्र का योग दिवस होगा। छात्र करें भी तो क्या। उनको तो बस इम्तेहान दर इम्तेहान दिये जाना है। पेपर आउट होने पर जब शिक्षा महकमे के प्रधान जी का बस नहीं तो और किसी से क्या ही उम्मीद करें। प्रधान का क्या है, हर लीकेज पर बयानबाजी ही तो करना है। शुचिता की गारंटी तो अब भी वो नहीं दे रहे, या फिर दे नहीं सकते?
गारंटी के नाम पर क्या? अगली बारी से कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा होगी। तो क्या वो परफेक्ट होगी? पिछले सालों के एसएससी,क्लैट वगैरह भूल गये जब कंप्यूटर ही गच्चा दे गए थे, सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगी थी।

कंप्यूटर एक जरिया हो सकता है। लेकिन समाधान की गारंटी नहीं बन सकता क्योंकि सवाल नीयत और व्यवस्था का है।
अब नीट भी कम्प्यूटर से। इस बार तो आपने पेपर सेट करने वालों को ही पकड़ लिया। तो क्या कंप्यूटर पर पेपर अपने आप सेट हो जाएंगे? निगरानी कौन करेगा? डेटा किसके पास रहेगा? जवाबदेही किसकी होगी? हर सेंटर पर इतने कंप्यूटर और निर्बाध बिजली इंटरनेट के क्या इंतज़ाम होंगे? इन सवालों पर कोई साफ़गोई नहीं। कोई ब्यौरा नहीं। इन सबमें कोई पारदर्शिता नहीं। लेकिन पेपर आउट करने वालों के लिए हर दीवार पारदर्शी हो जाती है। क्यों भाई?
जवाब नदारद हैं।सो सच्चाई यह है कि जिम्मेदारों को खुद कुछ सूझ नहीं रहा। अभी भी एक्सपेरिमेंट मोड में सब है।
ज़ेन-ज़ी की हालत देखिए। दिन रात तैयारी करो। कहीं कोटा में तो कहीं सीकर या मुखर्जीनगर में या किसी सेलिब्रिटी 'सर' की कोचिंग में। मशीन की तरह लगे रहो कोचिंग, टेस्ट सीरीज़, मॉक एग्ज़ाम, कटऑफ, रैंक, रिजल्ट के चक्र में। ज़िंदगी का पूरा कैलेंडर परीक्षा बना दो। सोने का वक़्त कहाँ है? और अगर सो गए तो पीछे रह जाएंगे।
नींद अब निजी समस्या नहीं रही, राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि देश की 60 फीसदी आबादी छह घंटे से भी कम सो रही है, जबकि डॉक्टर आठ घंटे की सलाह देते हैं। लेकिन सोएँ कैसे? यहाँ एडमिशन के लाले हैं। एडमिशन हो जाये तो फिर पास होने के लाले। वो भी पार कर लिया तो नौकरी की परीक्षा वाली लाइनों में लगो। नौकरी मिल जाए तो उसे बचाए रखने की जद्दोजहद। सबसे फारिग हो जाएं तब सोने की सोचें भी।

जो ज़ेनज़ी से अगले पायदान पर पहुंच चुके हैं वो भी कहाँ सो पा रहे हैं। सोएं तो पेट कैसे पले। जबसे 24 घण्टे डिलीवरी का नेशनल प्रोफेशन छा गया है तबसे उसने 8 घण्टे भी छीन लिए। पैसा देखें कि नींद?
हाकिम हुक्मरानों प्रधानों को छोड़ दीजिए। उनकी नींद मुकम्मल है। वो न पूरी नींद लें तो देश कैसे चलेगा? वो अलग हैं।
हमारी नींद उड़ी हुई है। अपने को देखते हैं या दूसरों को , कोई तरोताजा नजर नहीं आता। आधी ताजगी उलझनों ने खा ली तो बाकी आधी इन उलझनों को भूलने के उपाय, यानी मोबाइल ने। समय नहीं है सोने का। समय है तो नींद नहीं आती। हम हमेशा भागते हुए, हमेशा थके हुए, हमेशा अधूरे ही हैं। एक अजीब सी बेचैनी भर गई है। हम जी कम रहे हैं, टिके हुए ज्यादा हैं।
ऐसे में कॉकरोच और पैरासाइट जैसे शब्दों से सुशोभित हो रहे हैं। अपने युवाओं को सम्मान, स्थिरता और भरोसा नहीं दे पा रहे तो ऐसे नाम चस्पां कर देने लगते हैं। कोई बताए भी तो कि इन्हें ऐसा बनाया किसने? क्या वो पैदाइशी कॉकरोच-पैरासाईट हैं? तो क्या करें इनका? सुना है कि कॉकरोच तो एटम बम से भी खत्म नहीं होते।खत्म होना तो दूर, ये तो मल्टीप्लाई होते जाएंगे। फिर क्या होगा?
तो क्या पेपर लीक वाले किरदार भी कॉकरोच हैं? या परीक्षा कराने वाली प्रधानी संस्था खुद पैरासाईट है?
कौन क्या है। समझना मुश्किल है। नींद की बात पर लौटते हैं। एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में जापान में लोग सबसे कम सोते हैं। हमसे भी कम। लेकिन वो कई गुना ज्यादा तंदुस्त हैं। हमसे ज्यादा जीते हैं। हमसे कहीं ज्यादा काम करते हैं।

फर्क सिर्फ़ घंटों का नहीं, भरोसे का है। वहाँ आम इंसान को हर मोड़ पर यह डर नहीं होता कि उसकी मेहनत किसी पेपर लीक, सिफारिश या धांधली के आगे हार जाएगी। इंसान सिर्फ़ आराम से नहीं, भरोसे से भी स्वस्थ रहता है।
हमने युवाओं को एक अजीब शब्द दे दिया है - एस्पिरेंट। यानी वो जो हमेशा आकांक्षा में रहे। बढ़िया है। लेकिन ये पता नहीं कि कभी पहुँच पायेगा भी कि नहीं। ये एस्पिरेशन अंतहीन बन चला है। परीक्षाएं हैं कि कभी खत्म नहीं होतीं।
यही वजह है कि आज की थकान सिर्फ़ जिस्मानी नहीं है। यह मानसिक और नैतिक थकान भी है। लोग नींद इसलिए नहीं खो रहे कि वो बहुत काम कर रहे हैं। बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें अपने काम के वाजिब नतीजे पर भरोसा नहीं रहा। और जिस समाज में मेहनत से पहले जुगाड़ पर भरोसा बढ़ने लगे, वहाँ सिर्फ़ परीक्षाएँ नहीं लीक होतीं, वहाँ भविष्य लीक होने लगता है। मिट्टी के बांध में छेद की तरह। एक बन्द करो कि दूसरा बन जाता है। क्या दुआ करें कि बांध टूट न जाये?
( लेखक पत्रकार हैं।)

