Kohinoor Diamond: जब ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय और रानी कैमिला 9/11 हमले के 25 साल पूरे होने पर न्यूयॉर्क के लोअर मैनहट्टन में श्रद्धांजलि देने पहुंचे, तो वहां मौजूद न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने एक ऐसा बयान दिया जिसने सैकड़ों साल पुराने इतिहास को फिर से हिला दिया।
34 वर्षीय मेयर ने संवाददाताओं से कहा, "अगर मैं राजा से अलग से बात करूं, तो शायद मैं उन्हें कोहिनूर हीरा वापस करने के लिए प्रोत्साहित करूंगा।"
NYC मेयर ने राजा चार्ल्स से कहा कोहिनूर लौटाइए, 175 साल पुराना विवाद गरमाया
यह टिप्पणी उस समय आई जब राजा चार्ल्स ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मेमोरियल पर पुष्पांजलि अर्पित की और ममदानी के साथ हैंडशेक किया। सिटी हॉल ने बाद में बताया कि दोनों के बीच कुछ मिनटों की मुलाकात हुई, जिसमें सिर्फ शिष्टाचार का आदान-प्रदान हुआ। हालांकि, कोहिनूर का मुद्दा उठा या नहीं, इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

लेकिन ममदानी के बयान ने वह कर दिखाया जो भारत, पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान दशकों से कर रहे हैं - दुनिया के सबसे विवादास्पद हीरों में से एक की वापसी की मांग को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखा। आज हम आपको बताएंगे कोहिनूर की पूरी कहानी, उसकी उत्पत्ति से लेकर लंदन के टॉवर तक का सफर और भारत के लिए वह कानूनी पेच जो इसकी वापसी में रोड़ा बना हुआ है।
जब नादिर शाह ने रखा था 'कोहिनूर' नाम
कोहिनूर, फारसी भाषा के दो शब्दों 'कोह' (पहाड़) और 'नूर' (रोशनी) से मिलकर बना है, यानी 'रोशनी का पहाड़'। किंवदंती है कि जब फारस के शासक नादिर शाह ने 1739 में दिल्ली पर आक्रमण किया और मुगल सम्राट मुहम्मद शाह से यह हीरा छीना, तो उसकी चमक देखकर वह चकित रह गए और बोले - कोहिनूर! लेकिन इस हीरे का इतिहास इससे भी कहीं ज्यादा पुराना है।
कोहिनूर का जन्म: गोलकुंडा की खानों से

वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के अनुसार, कोहिनूर की खोज आज के आंध्र प्रदेश में स्थित गोलकुंडा क्षेत्र की कोल्लूर खान में हुई थी। यह वही क्षेत्र है जो अपने हीरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर था। प्रारंभिक इतिहास के अनुसार, 14वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया और काकतीय राजवंश से यह हीरा हासिल किया।
बाबर से शाहजहां तक: मुगलों का गौरव
हीरा बाद में मुगलों के हाथ लगा। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई के बाद जब बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया, तो यह हीरा मुगल खजाने का हिस्सा बन गया। बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में एक बड़े हीरे का जिक्र किया है, जिसे इतिहासकार कोहिनूर मानते हैं। सबसे शानदार दौर तब आया जब शाहजहां ने इस हीरे को अपने प्रसिद्ध मयूर सिंहासन में जड़वाया। तख्त पर मोर की आकृति बनी थी और कोहिनूर उसी के बीच में जड़ा हुआ था। पर यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चला।
फारस और अफगानिस्तान के हाथों का खिलौना

1739 में नादिर शाह के हमले ने मुगल साम्राज्य की कमर तोड़ दी। उसने दिल्ली लूटी और मयूर सिंहासन समेत कोहिनूर को ईरान ले गया। नादिर शाह की मौत (1747) के बाद उसका साम्राज्य बिखर गया। हीरा उसके सेनापति अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंचा, जिसने अफगानिस्तान में दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की। फिर आया वह मोड़ जो इस हीरे को सिख साम्राज्य से जोड़ता है। अफगान शासक शाह शुजा दुर्रानी, जो कोहिनूर का मालिक था, गद्दी से उतार दिया गया। वह अपने परिवार और कोहिनूर के साथ भागकर लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) आया।
महाराजा रणजीत सिंह: जब हीरा सिख खजाने में आया
1809 में अफगान शासक शाह शुजा ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह से शरण मांगी। रणजीत सिंह ने पहले तो उनकी मेजबानी की, लेकिन जब उन्हें पता चला कि शाह शुजा के पास कोहिनूर है, तो उन्होंने उसे आत्मसमर्पण करने को कहा। कुछ इतिहासकार इसे 'उपहार' कहते हैं तो कुछ 'ज़बरदस्ती छीनना'। बहरहाल, रणजीत सिंह ने इस हीरे को अपनी पगड़ी के सामने लगवाया और दीवाली-दशहरे जैसे मौकों पर इसे बांह में बांधकर सवारी निकालते थे। वह इतना आशंकित हो गए थे कि इसे गोबिंदगढ़ किले में सुरक्षित रखते थे और जब वो हीरा कहीं ले जाया जाता तो 40 ऊंटों का काफिला चलता था जिनमें से असली हीरा कौन से ऊंट पर है, यह सिर्फ खजानची को पता होता था।
लाहौर की संधि: 10 साल के राजा का सरेंडर

1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा। 1849 में दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्जा कर लिया। उस समय महाराजा दिलीप सिंह महज 10 साल के थे। अंग्रेजों ने उनसे 'ट्रीटी ऑफ लाहौर' (लाहौर की संधि) पर हस्ताक्षर करवाए। इस संधि की धारा में साफ लिखा था: "कोहिनूर नामक रत्न, जो शाह शुजा-उल-मुल्क से महाराजा रणजीत सिंह ने लिया था, लाहौर के महाराजा द्वारा इंग्लैंड की महारानी को सौंप दिया जाएगा।"
लॉर्ड डलहौजी, जो उस समय गवर्नर-जनरल थे, ने इसे "विजय का ऐतिहासिक स्मारक" कहा। 1850 में कोहिनूर को औपचारिक रूप से रानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। दिलचस्प बात यह है कि डलहौजी ने इसे ब्रिटिश 'क्राउन' (ताज) को दिया, न कि ईस्ट इंडिया कंपनी को, जिससे कंपनी के निदेशक मंडल में हड़कंप मच गया।
जब 'बदनसीब' हीरे को काटा गया
लंदन पहुंचने पर 1851 में ग्रेट एग्जीबिशन (महाप्रदर्शनी) में कोहिनूर रखा गया, लेकिन लोग इसकी भद्दी कटाई से निराश हुए। प्रिंस अल्बर्ट (रानी विक्टोरिया के पति) ने इसे फिर से तराशने का आदेश दिया। यह काम कोस्टर डायमंड्स ने किया। तब इसका वजन 186 कैरेट से घटकर मात्र 105.6 कैरेट रह गया। माना जाता है कि इस कटाई के दौरान हीरे की चमक बढ़ी, लेकिन साइज घट गया।
टॉवर ऑफ लंदन में कैद
आज कोहिनूर लंदन के टॉवर ऑफ लंदन में 'ज्वेल हाउस' में रानी एलिजाबेथ द क्वीन मदर के मुकुट में जड़ा हुआ है। इसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाता है।

एक किंवदंती के अनुसार, कोहिनूर पर 'श्राप' है कि यह केवल महिलाओं या भगवान को ही भाग्यशाली बनाता है। अगर कोई पुरुष इसे पहने, तो उसका अंत बुरा होता है। यही वजह है कि ब्रिटेन में अब तक इसे केवल महिला सदस्यों (रानी विक्टोरिया, रानी एलेक्जेंड्रा, रानी मैरी और क्वीन मदर) ने ही पहना है। जब 2023 में किंग चार्ल्स तृतीय का राज्याभिषेक हुआ, तो कैमिला (क्वीन कंसोर्ट) के मुकुट में कोहिनूर नहीं लगाया गया, ताकि इस विवाद से बचा जा सके।
भारत सरकार का रुख
भारत, पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान - चारों देश कोहिनूर पर अपना दावा पेश कर चुके हैं। लेकिन सबसे जोरदार मांग भारत की रही है। 2016 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से पूछा था कि वह इसे वापस लाने के लिए क्या कर रही है?
तब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कोर्ट में एक चौंकाने वाला बयान दिया था। एएसआई ने कहा, "कोहिनूर ब्रिटेन को बतौर तोहफा दिया गया था। इसे न तो चुराया गया था और न ही जबरन ले जाया गया था।" भारत सरकार ने यह भी कहा कि वह कोहिनूर को वापस लाने के लिए ब्रिटेन पर कोई कानूनी दबाव' नहीं बना सकती, क्योंकि इतिहास के तथ्य उसके पक्ष में नहीं हैं। हालांकि, कई राजनीतिक दल और नागरिक समूह अब भी इसे औपनिवेशिक लूट' मानते हैं और दावा करते हैं कि 10 साल के बच्चे ने दबाव में संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जो मान्य नहीं है।
बकिंघम पैलेस और ब्रिटिश सरकार का रुख साफ है - कोहिनूर वापस नहीं होगा। ब्रिटेन का कहना है कि यह हीरा 1849 की लाहौर संधि के तहत 'वैध रूप से' ब्रिटिश क्राउन के पास आया है और यह ताज के गहनों का अभिन्न हिस्सा है।
क्या ममदानी का बयान बदलेगा कुछ?
हालाँकि ममदानी ने राजा चार्ल्स के सामने यह मांग नहीं दोहराई लेकिन उनके बयान ने मीडिया में बहस छेड़ दी है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, ममदानी ने औपचारिक बैठक में इस बात का जिक्र नहीं किया। लेकिन सोशल मीडिया पर यह मुद्दा वायरल है। वहीं दूसरी तरफ, ब्रिटेन के समर्थकों का कहना है कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता। सो, 175 साल बाद भी यह सवाल जस का तस है - आखिर यह 'रोशनी का पहाड़' किसके घर रोशनी बिखेरेगा?

