
Iran US Ceasefire News: दुनिया इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक तरफ युद्धविराम की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ बारूद के ढेर पर बैठी नफरत की आग। पिछले 40 दिनों से ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जो खूनी खेल चल रहा था, उस पर बुधवार की सुबह अचानक ब्रेक लग गया।
दोनों पक्ष 15 दिनों तक एक-दूसरे पर हमला न करने के लिए राजी हो गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह शांति टिकेगी? क्या डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच हुआ यह समझौता वाकई हकीकत है या फिर यह किसी बड़े सैन्य हमले से पहले की तैयारी है? ईरान ने साफ कर दिया है कि उसे अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है, और यही वजह है कि अब इस पूरे खेल में चीन और रूस की एंट्री हो गई है।
अमेरिका पर भरोसा नहीं
चीन में ईरान के राजदूत अब्दुलरेजा रहमानी फजली ने एक ऐसी चेतावनी दी है जिसने व्हाइट हाउस की नींद उड़ा दी है। फजली ने साफ कहा है कि अमेरिका का रिकॉर्ड वादाखिलाफी का रहा है, वह पहले भी तीन बार समझौते तोड़कर ईरान पर हमला कर चुका है। ईरान अब अमेरिका पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं है। इसीलिए ईरान अब चाहता है कि चीन और रूस जैसे 'सच्चे दोस्त' इस शांति समझौते की गारंटी लें। ईरान का मानना है कि अगर चीन और रूस इस समझौते के रक्षक बनते हैं, तभी यह 15 दिनों का सीजफायर टिक पाएगा। दिलचस्प बात यह है कि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी स्वीकार किया है कि ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में चीन ने बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन ईरान की चेतावनी साफ है-अगर इस बार भरोसा टूटा, तो जवाब इतना कड़ा होगा कि अमेरिका को पछताना पड़ेगा।
होर्मुज की खाड़ी पर दुनिया की सांसें अटकीं
जंग के इस शोर के बीच सबसे बड़ी चिंता 'होर्मुज स्ट्रेट' को लेकर है, जहाँ से दुनिया का बड़ा तेल व्यापार होता है। ईरानी राजदूत ने खुलासा किया कि इस वक्त लगभग 3,000 जहाज वहां फंसकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। ईरान ने संकेत दिए हैं कि वह तनाव कम करने के लिए जहाजों को रास्ता तो देगा, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खुलेगा या नहीं, यह शुक्रवार को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगा। इतना ही नहीं, ईरान अब सदियों से इस रास्ते की सुरक्षा करने के बदले 'ट्रांजिट फीस' यानी टैक्स वसूलने पर भी विचार कर रहा है। ईरान का तर्क है कि वह अकेले इस इलाके की सुरक्षा का जिम्मा उठाता है, लेकिन उसे कभी इसका श्रेय नहीं मिला। अब ईरान अपनी शर्तों पर व्यापार और सुरक्षा का नया दौर शुरू करना चाहता है।
ट्रंप की हार या कूटनीतिक चाल?
ईरान का दावा है कि अमेरिका इस युद्ध में बुरी तरह हार चुका है, लेकिन अपनी साख बचाने के लिए वह अपनी हार को जीत की तरह पेश कर रहा है। फजली ने चीन और रूस का शुक्रिया अदा किया क्योंकि उन्होंने अरब देशों के उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया जो ईरान की मर्जी के बिना होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की बात कर रहा था। अब सारा दारोमदार शुक्रवार को इस्लामाबाद में होने वाली बैठक पर है। क्या पाकिस्तान की धरती पर होने वाली यह बातचीत तीसरे विश्व युद्ध के खतरे को टाल पाएगी? या फिर 15 दिन बाद मिडिल ईस्ट में फिर से मिसाइलों का दौर शुरू होगा? फिलहाल दुनिया की नजरें चीन, रूस और ईरान की इस नई 'दोस्ती' पर हैं, जो अमेरिका की दादागिरी को चुनौती देने के लिए तैयार खड़ी है। लावन और सिरी द्वीप के धमाकों के बाद यह कूटनीतिक जंग और भी पेचीदा हो गई है।
