निजी स्कूलों की मनमानी: अभिभावक परेशान, कॉपी-किताब और ड्रेस का पड़ रहा आर्थिक बोझ (Photo- Newstrack)
The arbitrariness of private schools: parental upset, copy-books and the falling financial burden of dressesShravasti News: नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत के साथ पेरेंट्स पर बच्चों की किताब, कॉपी और ड्रेस का आर्थिक बोझ बढ़ने लगा है।सबसे ज्यादा दिक्कत अंग्रेजी स्कूलों की किताबों को लेकर है, जोकि हर साल बदल जाती है और स्कूलों द्वारा तय की गई दुकानों पर ही मिलती है।
भगवान श्रीराम के जेष्ठ पुत्र लव कुश की राजधानी रही श्रावस्ती के अधिकतर निजी स्कूलों की किताब कॉपी निर्धारित दुकानों पर ही मिलती है। दिक्कत पैरेंट्स को तब ज्यादा होती है जब हर साल किताब और कॉपी बदल जाते हैं। इससे उन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है और बच्चों को भी सिलेबस को लेकर दिक्कतें होती है।
उल्लेखनीय है कि नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ ही प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से अभिभावक परेशान हो रहे हैं। महंगी किताबों और फीस ने अभिभावकों का आर्थिक दबाव बढ़ा दिया है। नर्सरी से कक्षा 8 तक की किताबों की कीमतें बहुत अधिक हैं, जिससे मध्यम वर्गीय परिवारों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है ।
जानकार बताते हैं कि किताबों की कीमतें हर साल 10-15 प्रतिशत बढ़ रही हैं, और कुछ स्कूलों में तो एनसीईआरटी की किताबों की कीमत 260 रुपये है, जबकि प्राइवेट स्कूलों में यही किताब 3442 रुपये तक बेची जा रही है। अभिभावक रामदयाल ,माता प्रसाद,मंजूर सिद्दीकी आदि का कहना है कि स्कूल प्रबंधन विशेष दुकानों से ही किताबें खरीदने का दबाव बनाते हैं, जिससे उन्हें अधिक पैसे देने पड़ते हैं। कई स्कूलों में तो किताबों के साथ कॉपियां और कवर भी अनिवार्य रूप से खरीदने पड़ते हैं।
अभिभावकों का कहना है कि महंगी किताबों और फीस बढ़ोतरी से मध्यम वर्ग आर्थिक दबाव में आ चुके हैं। बताया है कि नर्सरी से कक्षा 8 तक की किताबों पर हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं। इससे मध्यम व निम्न आय वर्ग के लिए बच्चों की पढ़ाई मुश्किल हो रही है। बताया जा रहा है कि प्राइवेट स्कूल अपने द्वारा तय किए अपने 'बुक डिपो', से ही किताब कांपी व स्कूल ड्रेस खरीदने का दबाव बनाते हैं यह लोग बाहर से खरीद पर रोक लगाए हैं।
इसके अलावा खुले बाजार में किताबें न मिलने से अभिभावक इन लोगों के बुक डिपो से खरीदने को मजबूर हैं। इसके पीछे स्कूल मैनेजमेंट द्वारा किताबों में कमीशनखोरी का खेल बताया जा रहा है, इसके साथ ही हर साल सभी कक्षाओं का किताबें बदल दी जाती है। साथ ही यूनिफॉर्म, बैग, जूते सहित अन्य खर्चों से अभिभावकों को आर्थिक रूप से भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अभिभावकों की मांग है कि शिक्षा व्यवस्था के व्यापारिकरण रोक लगनी चाहिए और किताबों की कीमत तय करने और मनमानी रोकी जाए।अभिभावकों प्रशासन से हस्तक्षेप कर रोक लगाने की मांग की है।
मालूम हो कि दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने हालांकि निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने के लिए निर्देश जारी किए हैं, जिसमें कहा गया है कि स्कूल अभिभावकों को खास दुकानों से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते । साथ ही कहा है कि अभिभावकों की मांग के अनुसार सरकार निजी स्कूलों की फीस और किताबों की कीमतों को नियंत्रित करे, ताकि सभी वर्ग के बच्चों को समान शिक्षा का अवसर मिल सके ।

