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Sita Navami Katha:  कैसे हुआ माता सीता का जन्म? जानिए पूरी कथा और सौभाग्यवृद्धि के उपाय

Sita Navami Katha: कैसे हुआ माता सीता का जन्म? जानिए पूरी कथा और सौभाग्यवृद्धि के उपाय

Newstrack 2 weeks ago

Sita Navami Katha:: वैशाख माह के नवमी के दिन मां सीता ( Maa Sita ) का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस दिन को सीता नवमी ( Sita Navami) कहते हैं। इस साल 25 अप्रैल को सीता नवमी या जानकी नवमी मनाया जाएगा।

माता सीता अपने त्याग एवं समर्पण के लिए पूजनीय हैं। सीता नवमी के दिन सुहागिन महिलाएं अपने घर की सुख शांति और अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सीता का जन्म राजा जनक के खेत में धरती से हुआ था, इसलिए उन्हें "भूमि पुत्री" भी कहा जाता है।सीता जी त्याग, धैर्य, पवित्रता और आदर्श नारीत्व की प्रतीक मानी जाती हैं। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और राम-सीता की कथा का पाठ करते हैं। सीता नवमी हमें सच्चाई, सहनशीलता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह पर्व परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है।

सीता नवमी का शुभ मुहूर्त...

सीता नवमी माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। साल 2026 में यह पर्व शनिवार, 25 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन माता सीता और भगवान राम की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।

दिन: शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सीता नवमी मध्याह्न मुहूर्त: 10:46 बजे से 13:23 बजे तक

पूजा मुहूर्त की अवधि: 02 घंटे 36 मिनट

मध्याह्न का सटीक क्षण: 12:04 बजे

मां जानकी जन्म की कथा

रामायण में वाल्मिकी ने लिखा है कि एक बार मिथिला में भयंकर सूखे से राजा जनक बेहद परेशान हो गए थे, तब इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्हें एक ऋषि ने यज्ञ करने और धरती पर हल चलाने को कहा। ऋषि के सुझाव पर राजा जनक ने यज्ञ करवाया और उसके बाद राजा जनक धरती जोतने लगे। तभी उन्हें धरती में से सोने की खूबसूरत संदूक में एक सुंदर कन्या मिली। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी । राजा जनक ने उस कन्या को सीता नाम दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया।आगे चलकर माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम के साथ हुआ और उन्हें श्री राम के साथ 14 वर्ष का वनवास भी बिताना पड़ा। लव-कुश नाम के माता सीता के प्राकट्य की तिथि को ही उनके जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।

माता सीता का जन्म वैशाख शुक्ल नवमी को माना जाता है। उन्हें जानकी भी कहा जाता है क्योंकि उनके पिता राजा जनक बताये जाते हैं। पौराणिक ग्रंथों में माता सीता के प्राक्ट्य की कथा है। त्रेतायुग में मिथिला जो बिहार मे स्थित है वहां में भयंकर अकाल पड़ा उस समय मिथिला के राजा जनक हुआ करते थे। वह बहुत ही पुण्यात्मा थे, धर्म कर्म के कार्यों में बढ़ चढ़ कर रूचि लेते। लेकिन इस अकाल ने उन्हें बहुत विचलित कर दिया, अपनी प्रजा को भूखों मरते देखकर उन्हें बहुत पीड़ा होती। उन्होंने ज्ञानी पंडितों को दरबार में बुलवाया और इस समस्या के उपाय बताने को कहा। सभी ने कहा कि यदि राजा जनक स्वयं हल चलाकर भूमि जोते तो अकाल दूर हो सकता है। अपनी प्रजा के दुख को देखकर राजा राजा जनक ने जिस दिन खेत में हल जोतने का फैसला किया। वह दिन था वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी था। राजा जनक का हल चलाते-चलाते एक जगह आकर हल अटक गया, उन्होंने पूरी कोशिश की, लेकिन हल की नोक ऐसी धंसी हुई थी कि निकल नहीं रही थी। तब उन्होंने देखा कि हल की फाली की नोक जिसे सीता भी कहते हैं वह बहुत ही सुंदर और बड़ा से कलश में फंसी हुई थी। कलश को जब बाहर निकाला तो देखा उसमें एक नवजात कन्या थी। जिसमें अद्भुद प्रकाश था। धरती मां के आशीर्वाद स्वरूप राजा जनक ने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। तभी उसी समय मिथिला में जोर की बारिश हुई और राज्य का अकाल दूर हो हुआ। जब कन्या का नामकरण किया जाने लगा तो चूंकि हल की नोक को सीता कहा जाता है और उसी की बदौलत यह कन्या उनके जीवन में आयी तो उन्होंने इस कन्या का नाम सीता रखा जिसका विवाह आगे चलकर प्रभु श्री राम से हुआ। एक और कहानी के अनुसार सीता वेदवती का पुनर्जन्म है। वेदवती एक खूबसूरत महिला थीं जिसने सभी सांसारिक चीजों को छोड़ दिया, भगवान विष्णु की भक्ति और ध्यान में लगी रहती थी। वो भगवान विष्णु को पति रुप में पाना चाहती थीं। लेकिन एक दिन रावण उन्हें देख लेता है और मर्यादा का उल्लघं करने की चेष्टा करता है जिसे देख वेदवती आग में कूद गईं और मरने से पहले उऩ्होंने रावण को श्राप दिया कि अगले जन्म में मैं तुम्हारी पुत्री बनकर जन्म लूंगी और तुम्हारी मौत का कारण बनूंगी। इसके बाद मंदोदरी और रावण के यहां एक पुत्री ने जन्म लिया। रावण ने क्रुद्ध होकर उसे गहरे समुद्र में फेंक दिया। उस कन्या को देखकर सागर की देवी वरूणी बहुत दुखी हुईं। वरूणी ने उस कन्या को पृथ्वी माता को दे दिया। धरती की देवी ने इस कन्या राजा जनक और उनकी पत्नी सुनैना को दिया। इस प्रकार सीता धरती की गोद से राजा जनक को प्राप्त हुई थीं। जिस प्रकार सीता माता धरती से प्रकट हुईं उसी प्रकार उनका अंत भी धरती में समाहित होकर ही हुआ था।

सीता नवमी उपाय

अपने वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाने के लिए सीता नवमी के दिन माता सीता और श्रीराम जी की एक साथ पूजा करें। इस दौरान माता जानकी के माथे पर सात बार सिंदूर अर्पित करें और फिर, अपने माथे पर भी उस सिंदूर को लगाएं। इस उपाय को सीता नवमी के दिन करने से वैवाहिक जीवन में आ रही समस्याओं से राहत मिल सकती है। साथ ही, जीवनसाथी के साथ रिश्ता मजबूत होता है और दोनों के बीच में चल रही अनबन भी दूर हो सकती है। माना जाता है कि इस एक उपाय को करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आने लगती है।

सीता नवमी के दिन विवाहित महिलाएं जानकी मां को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित कर सकती हैं। इसके बाद, विधि-विधान से माता सीता की पूजा करें। अब श्रृंगार की सामग्री किसी जरूरतमंद महिला को भी दान कर दें। इस उपाय को करने से घर की समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है और जीवन में सुख-समृद्धि आने लगती है। ऐसी मान्यता है कि माता सीता को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करने और किसी जरूरतमंद को इन चीजों का दान करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। ऐसे में आपको पैसों की तंगी से भी निजात मिल सकती है और धन लाभ के योग बनते हैं।

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