
Vitamin D Deficiency in India: भारत को धूप का देश कहा जाता है। साल के ज्यादातर महीनों में यहां तेज धूप निकलती है। ये कुदरत की बड़ी नेमत है। लेकिन इसके बावजूद हर दूसरे-तीसरे व्यक्ति की ब्लड रिपोर्ट में विटामिन डी की कमी निकल आती है।
थकान, हड्डियों में दर्द, बाल झड़ना, मूड खराब रहना। डॉक्टर के पास पहुंचने वाले ज्यादातर लोगों को यही सुनने को मिलता है कि 'आपका विटामिन डी लेवल' बहुत कम है। सवाल यही है कि जब सूरज हर दिन सिर पर चमक रहा है तो फिर आखिर यह कमी इतनी आम कैसे हो गई?
विटामिन डी इतना जरूरी क्यों है?
विटामिन डी को अक्सर सिर्फ हड्डियों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन असल में शरीर में इसकी भूमिका इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। यह शरीर में कैल्शियम के सोखने में मदद करता है, इम्यून सिस्टम को मजबूत रखता है, मांसपेशियों के काम करने में सहायक होता है और मूड व एनर्जी लेवल को भी प्रभावित करता है। इसकी कमी सिर्फ बुजुर्गों की समस्या नहीं रही। आजकल युवा, गर्भवती महिलाएं और यहां तक कि बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
लोगो में विटामिन डी की कमी बेहद आम पाई जाती है और इसे अब एक तरह की वैश्विक महामारी माना जाने लगा है। आधुनिक लाइफस्टाइल में आए बदलाव और धूप से बचने की बढ़ती आदतों की वजह से हाल के वर्षों में यह समस्या तेजी से बढ़ी है। चिंता की बात यह है कि यह हर उम्र और हर इलाके के लोगों में देखी जा रही है चाहे धूप की कोई कमी न भी हो।
धूप के बावजूद कमी क्यों होती है? इसकी असली वजहें
- लोगों की सबसे बड़ी गलती है गलत समय पर धूप लेना। बहुत से लोग सुबह जल्दी, ठंडी और हल्की धूप में टहलना पसंद करते हैं। लोग सोचते हैं कि इससे विटामिन डी मिल रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि विटामिन डी बनाने के लिए जिम्मेदार यूवीबी (UVB) किरणें सुबह-सुबह और शाम को कमजोर होती हैं। ज्यादातर विशेषज्ञ सुबह करीब 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच धूप में रहने की सलाह देते हैं, क्योंकि इसी दौरान UVB किरणें सबसे ज्यादा तेज और असरदार होती हैं। यानी सुबह की हल्की, सुहानी धूप भले ही अच्छी लगे लेकिन विटामिन डी बनाने के लिहाज से वह उतनी कारगर नहीं होती।
- दूसरी बड़ी वजह है शीशे के पीछे बैठकर धूप लेना। घर या ऑफिस की खिड़की से आने वाली धूप में बैठना आम आदत है, लेकिन इससे विटामिन डी नहीं बनता। कांच विटामिन डी के उत्पादन के लिए जरूरी UVB किरणों को रोक देता है। इसलिए खिड़की के पीछे बैठकर धूप सेंकना बेअसर साबित होता है भले ही आपको गर्माहट महसूस हो रही हो।
- सनस्क्रीन और पूरी तरह ढका हुआ शरीर भी बड़ी बाधा है। आजकल स्किन केयर को लेकर जागरूकता बढ़ी है, और सनस्क्रीन का इस्तेमाल आम हो गया है। यह त्वचा को नुकसान से तो बचाता है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि सनस्क्रीन UVB किरणों को भी ब्लॉक करता है, जिससे त्वचा में विटामिन डी बनना काफी कम हो जाता है। इसके अलावा भारत में परंपरा और मौसम, दोनों वजहों से लोग अक्सर पूरे शरीर को कपड़ों से ढककर रखते हैं, जिससे त्वचा का बहुत कम हिस्सा ही सीधे धूप के संपर्क में आ पाता है।
- धूप न मिलने की एक वजह घर और ऑफिस के अंदर बीतता ज्यादातर समय है। दरअसल,आधुनिक जीवनशैली में सबसे बड़ा बदलाव यही आया है कि अब ज्यादातर लोग दिन का बड़ा हिस्सा घर या ऑफिस के अंदर बिताते हैं। स्कूल-कॉलेज, डेस्क जॉब, वर्क फ्रॉम होम और लंबा स्क्रीन टाइम, इन सबकी वजह से धूप में निकलने का मौका ही बहुत कम मिल पाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक आधुनिक जीवनशैली में लोग अधिकतर समय घर के अंदर बिताते हैं, जिससे धूप के संपर्क में स्वाभाविक रूप से कमी आती है, और चूंकि सूर्य की रोशनी विटामिन डी का सबसे प्राकृतिक स्रोत है, इसकी कमी सीधे शरीर में इसके निर्माण को बाधित कर देती है।
- शहरों में बढ़ता प्रदूषण भी इस समस्या को बढ़ा रहा है। वायु प्रदूषण, खासकर स्मॉग और हवा में मौजूद बारीक हानिकारक कण, सूरज की UVB किरणों को सोख लेते हैं और उन्हें जमीन तक ठीक से पहुंचने ही नहीं देते। यही वजह है कि प्रदूषण से जूझ रहे बड़े शहरों में रहने वाले लोगों में विटामिन डी की कमी अक्सर ज्यादा गंभीर पाई जाती है, भले ही वहां धूप की कमी न हो।
- यह बात कम लोग जानते हैं, लेकिन त्वचा का रंग भी विटामिन डी बनने की रफ्तार तय करता है। गहरे रंग की त्वचा में मेलानिन ज्यादा होता है, जो प्राकृतिक रूप से सूरज की किरणों से सुरक्षा तो देता है, लेकिन यह विटामिन डी बनने की प्रक्रिया को भी धीमा कर देता है। गोरी त्वचा वाले लोगों को विटामिन डी बनाने के लिए अपेक्षाकृत कम समय चाहिए होता है, जबकि गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों को समान मात्रा में विटामिन डी बनाने के लिए काफी ज्यादा देर तक धूप में रहना पड़ता है। भारत में बड़ी आबादी की त्वचा का रंग अपेक्षाकृत गहरा होने की वजह से भी यह समस्या और बढ़ जाती है।
- शरीर में मौजूद अतिरिक्त फैट भी एक छिपा हुआ कारण है। विटामिन डी एक फैट-सॉल्युबल यानी वसा में घुलने वाला विटामिन है, और शरीर में ज्यादा चर्बी होने पर यह विटामिन उस चर्बी में ही फंसकर रह जाता है, जिससे यह खून में ठीक से घुल-मिल नहीं पाता और शरीर के बाकी हिस्सों तक असरदार तरीके से नहीं पहुंच पाता। यही वजह है कि मोटापे से जूझ रहे लोगों में विटामिन डी की कमी अक्सर ज्यादा गंभीर पाई जाती है।
- उम्र भी एक बड़ा फैक्टर है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, त्वचा की धूप से विटामिन डी बनाने की प्राकृतिक क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। इसीलिए बुजुर्गों को भी समान फायदे के लिए युवाओं के मुकाबले अधिक समय तक धूप में रहना पड़ता है।
- धूप के अलावा विटामिन डी कुछ खाने-पीने की चीजों से भी मिलता है, जैसे अंडे की जर्दी, फैटी मछली, मशरूम और फोर्टिफाइड दूध। भारतीय थाली में परंपरागत रूप से इन चीजों की मात्रा सीमित रहती है, खासकर शाकाहारी लोगों में, जिससे डाइट के जरिए मिलने वाला विटामिन डी भी काफी कम हो जाता है।
सिर्फ धूप नहीं, अवशोषण भी जरूरी
एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि आयुर्वेद इस समस्या को थोड़े अलग नजरिए से देखती है। आयुर्वेद के अनुसार सिर्फ धूप में बैठना काफी नहीं, बल्कि शरीर की पाचन क्षमता (जठराग्नि) भी उतनी ही अहम है। इस पारंपरिक सोच के मुताबिक अगर आंतों में टॉक्सिन जमा हो या डाइट में सही मात्रा में हेल्दी फैट न हो, तो शरीर धूप और सप्लीमेंट, दोनों से मिलने वाले विटामिन डी को ठीक से सोख नहीं पाता। हालांकि यह एक पारंपरिक अवधारणा है, आधुनिक विज्ञान से क्लीनिकली प्रमाणित तथ्य नहीं, लेकिन इसका एक हिस्सा यानी खान-पान और पाचन का असर आधुनिक पोषण विज्ञान से भी काफी हद तक मेल खाता है।
तो सही तरीका क्या है?
अगर आप चाहते हैं कि धूप का पूरा फायदा मिले, तो कुछ आसान बातें ध्यान रखनी चाहिए। कोशिश करें कि सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच थोड़ी देर धूप लें, जब UVB किरणें सबसे ज्यादा असरदार होती हैं।
हाथ, पैर या चेहरे का हिस्सा बिना सनस्क्रीन के कुछ मिनट धूप में रहने दें, इससे पहले चाहें तो डर्मेटोलॉजिस्ट से सलाह ले लें।
गोरी त्वचा वालों के लिए हफ्ते में कई बार करीब 10-15 मिनट का एक्सपोजर काफी हो सकता है, जबकि गहरे रंग की त्वचा वालों को थोड़ा ज्यादा समय, यानी करीब 30 मिनट से एक घंटे तक की जरूरत पड़ सकती है।
विटामिन डी के लिए बालकनी, छत या पार्क जैसी खुली जगह पर जाना जरूरी है, खिड़की के अंदर बैठना काम नहीं आएगा।
अंडा, मशरूम, फोर्टिफाइड दूध और फैटी फिश जैसी चीजों को डाइट में शामिल करें।
विटामिन डी की कमी के आम लक्षण
अगर शरीर में विटामिन डी लगातार कम बना रहे, तो कुछ संकेत सामने आ सकते हैं, जैसे कि लगातार थकान और सुस्ती महसूस होना, हड्डियों और जोड़ों में दर्द, बार-बार बीमार पड़ना, यानी इम्यूनिटी कमजोर होना, बाल ज्यादा झड़ना, मूड खराब रहना या उदासी महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी।
अगर ये लक्षण लगातार बने रहें, तो सिर्फ अंदाजा लगाने की बजाय ब्लड टेस्ट करवाकर सही स्थिति पता करना बेहतर होता है, क्योंकि सही मात्रा तय करने के लिए डॉक्टर की सलाह और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेना ज्यादा भरोसेमंद तरीका है।
समझने वाली बात
भारत में धूप की कोई कमी नहीं, लेकिन हमारी बदलती जीवनशैली जिम्मेदार है जिसमें गलत समय पर धूप लेना, ज्यादातर वक्त घर या ऑफिस के अंदर बिताना, सनस्क्रीन और कपड़ों से पूरी तरह ढका शरीर, बढ़ता प्रदूषण, और डाइट में जरूरी चीजों की कमी इन सबने मिलकर विटामिन डी की कमी को एक आम समस्या बना दिया है। यानी सिर्फ धूप वाले देश में रहना काफी नहीं, बल्कि उस धूप का सही समय पर, सही तरीके से फायदा उठाना ही असली जरूरत है।

