Sonbhadra News: भीषण गर्मी के बीच प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि पावर कॉरपोरेशन के शीर्ष स्तर पर फैसलों की कमजोरी और कुप्रबंधन के चलते हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले दिनों में उपभोक्ताओं की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह प्रबंधन की होगी।
समिति के आह्वान पर निजीकरण और कथित उत्पीड़नात्मक नीतियों के खिलाफ चल रहे आंदोलन ने अब रफ्तार पकड़ ली है। इसी क्रम में मैनपुरी, फर्रुखाबाद और कन्नौज में विरोध सभाएं आयोजित की गईं। इन सभाओं में केंद्रीय पदाधिकारी जितेंद्र सिंह गुर्जर, महेंद्र राय, मनोज सिंह और मोहम्मद वसीम ने भाग लेते हुए कर्मचारियों की समस्याओं को जोरदार तरीके से उठाया।संघर्ष समिति का कहना है कि बड़ी संख्या में संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त की जा रही हैं, वहीं नियमित कर्मचारियों का असंगठित ढंग से तबादला किया जा रहा है। स्वीकृत पदों में कटौती और कार्य विभाजन में मनमाने बदलावों ने व्यवस्था को और जटिल बना दिया है। इसके चलते उपभोक्ताओं को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी इधर-उधर भटकना पड़ रहा है और सेवाएं समय पर नहीं मिल पा रही हैं।
समिति ने यह भी आरोप लगाया कि अनुभवी कर्मचारियों को किनारे कर आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिए कम अनुभव वाले कर्मियों से काम लिया जा रहा है। गर्मी में बढ़ती बिजली खपत के बीच ट्रांसफॉर्मर, सब-स्टेशन और स्विचगियर पर दबाव बढ़ गया है, जिसे संभालना नए कर्मियों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। नतीजतन बार-बार फाल्ट, कटौती और तकनीकी दिक्कतें सामने आ रही हैं।प्रीपेड स्मार्ट मीटर व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। कई उपभोक्ताओं के बिलों में गड़बड़ी सामने आ रही है-कहीं नेगेटिव बिल तो कहीं भुगतान के बाद भी कनेक्शन बहाल नहीं हो रहा। इससे आम उपभोक्ताओं में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
संघर्ष समिति ने कहा कि कर्मचारियों को मजबूरी में सड़कों पर उतरना पड़ रहा है, जो व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 19 मार्च 2023 को ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा के निर्देशों के बावजूद कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं रुकी, बल्कि उसमें और तेजी आई है।समिति ने स्पष्ट किया कि आंदोलन के बावजूद बिजली कर्मचारी उपभोक्ताओं और किसानों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करते रहेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि प्रबंधन की नीतियों का खामियाजा आम जनता, किसान और कर्मचारी-तीनों वर्ग भुगत रहे हैं।अंत में संघर्ष समिति ने चेतावनी दी कि जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता और कथित उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों पर रोक नहीं लगती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

