बिजली निजीकरण के 'खेल' पर घमासान, निजी कंपनियों के सीएजी ऑडिट की उठी मांग (Photo- Newstrack)
Ghamasan on 'game' of power privatization, high demand for CAG audit of private companiesSonbhadra News: उत्तर प्रदेश में बिजली क्षेत्र के निजीकरण को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने आगरा और ग्रेटर नोएडा में बिजली वितरण का कार्य कर रही निजी कंपनियों के कामकाज और वित्तीय लेन-देन की भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से व्यापक जांच कराने की मांग उठाई है। समिति का आरोप है कि सार्वजनिक हित से जुड़े इस क्षेत्र में पारदर्शिता का अभाव है और निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली व्यवस्थाओं की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
संघर्ष समिति ने शनिवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली की निजी बिजली वितरण कंपनियों (बीएसईएस) के सीएजी ऑडिट का रास्ता साफ करते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक सेवा से जुड़ी निजी कंपनियां वित्तीय जांच से बच नहीं सकतीं। समिति का कहना है कि उत्तर प्रदेश में भी इसी सिद्धांत को लागू करते हुए आगरा और ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनियों का सीएजी ऑडिट कराया जाना चाहिए।
आगरा मॉडल पर उठे गंभीर सवाल
समिति ने आरोप लगाया कि आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी व्यवस्था के तहत उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन वर्षों से अपनी औसत खरीद लागत से कम दर पर निजी कंपनी टोरेंट पावर को बिजली उपलब्ध करा रहा है। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार वर्ष 2025-26 में लगभग 2400 मिलियन यूनिट बिजली ₹4.55 प्रति यूनिट की दर से दी गई, जबकि पावर कॉरपोरेशन की औसत खरीद लागत करीब ₹5.85 प्रति यूनिट रही। इस प्रकार प्रति यूनिट लगभग ₹1.30 का अंतर रहा, जिससे एक वर्ष में करीब ₹312 करोड़ का वित्तीय नुकसान होने का दावा किया गया है।
समिति का कहना है कि पिछले 16 वर्षों से जारी इस व्यवस्था के कारण सार्वजनिक क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति हुई है, जबकि निजी कंपनी को लगातार लाभ मिलता रहा। समिति ने सवाल उठाया कि यदि घाटा सरकारी संस्थान और उपभोक्ता उठा रहे हैं तो निजीकरण का लाभ आखिर किसे मिल रहा है।
समझौते की समीक्षा और जांच की मांग
संघर्ष समिति ने आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी समझौते की तत्काल समीक्षा कराने की मांग करते हुए कहा कि यदि जांच में सार्वजनिक हित के प्रतिकूल शर्तें या वित्तीय अनियमितताएं सामने आती हैं तो इस करार को समाप्त किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सीएजी ऑडिट से पूरे मामले की निष्पक्ष और तथ्यात्मक जांच संभव होगी।
ग्रेटर नोएडा की कंपनी पर भी सवाल
समिति ने ग्रेटर नोएडा में बिजली वितरण कर रही निजी कंपनी पर भी संविदात्मक दायित्वों के पालन को लेकर सवाल उठाए हैं। समिति का दावा है कि कंपनी ने समझौते के तहत विद्युत उत्पादन संयंत्र स्थापित करने का दायित्व लिया था, लेकिन आज तक उसे पूरा नहीं किया गया। ऐसे में कंपनी के वित्तीय लेन-देन, सरकारी रियायतों और संविदात्मक दायित्वों की भी सीएजी से जांच कराई जानी चाहिए।
सरकार से हस्तक्षेप की मांग
संघर्ष समिति का कहना है कि सीएजी ऑडिट की रिपोर्ट के आधार पर सरकार के पास निजी कंपनियों के साथ हुए समझौतों की समीक्षा करने और आवश्यक होने पर उन्हें निरस्त करने का आधार उपलब्ध होगा। समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि सार्वजनिक धन और करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए आगरा और ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनियों का सीएजी ऑडिट समय की आवश्यकता है।

