Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
तिब्बत में चीन का 'वॉटर बम'! नेपाल की बाढ़ ने बढ़ाई भारत की टेंशन, ड्रैगन का मेदोग बांध नॉर्थ-ईस्ट में लाएगा सैलाब

तिब्बत में चीन का 'वॉटर बम'! नेपाल की बाढ़ ने बढ़ाई भारत की टेंशन, ड्रैगन का मेदोग बांध नॉर्थ-ईस्ट में लाएगा सैलाब

Newstrack 1 week ago

China Medog Dam: नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन के तिब्बत में बन रहे मेदोग बांध को लेकर चिंता बढ़ गई है। यह बांध यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाया जा रहा है, जो भारत में अरुणाचल प्रदेश पहुंचने के बाद सियांग और आगे चलकर ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है।

करीब 60,000 मेगावाट क्षमता वाला यह प्रोजेक्ट अपनी विशाल क्षमता और भूकंप की आशंका वाले इलाके में स्थित होने के कारण विशेषज्ञों की चिंता का विषय बना हुआ है।

बुधवार को नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। घर, सड़कें और पावर प्रोजेक्ट पानी की तेज धारा में बह गए। इस आपदा में 300 से ज्यादा भारतीय यात्रियों के लापता होने की खबर है। इनमें बड़ी संख्या कैलाश मानसरोवर यात्रियों की बताई गई है।

मेदोग बांध को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?

नेपाल की तबाही ने चीन के मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर पहले से मौजूद चिंताओं को और बढ़ा दिया है। यह प्रोजेक्ट तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाया जा रहा है और इसे करीब 60,000 मेगावाट क्षमता का बताया गया है। चीन इस बांध को 2033 तक चालू करने की दिशा में काम कर रहा है। इसका निर्माण तिब्बत के मेदोग इलाके में हो रहा है, जो भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है।

इसी वजह से विशेषज्ञों ने इतने बड़े बांध को 'वॉटर बम' तक कहा है। आशंका यह है कि किसी बड़े भूकंपीय घटनाक्रम या दूसरी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इतनी बड़ी परियोजना का असर केवल स्थानीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता।

भारत के पूर्वोत्तर में बड़े खतरे की चेतावनी

पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने चेताया है कि भूकंप की नजरिए से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में चीन का 60,000 मेगावाट का मेदोग डैम पूरा होने पर भारत के पूर्वोत्तर में बड़े खतरे पैदा हो सकते हैं। यह परियोजना तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बन रही है, जो भारत में सियांग और आगे ब्रह्मपुत्र कहलाती है।

चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि चीनी भूवैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट में परियोजना के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन होने की बात सामने आई है, जिससे भूकंप, भूस्खलन और बांध की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं।

बांध के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन मिलने का दावा

जुलाई में चीन के सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वे से जुड़े भूवैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने भी मेदोग प्रोजेक्ट की संरचनात्मक सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, रिचर्स ने बांध की साइट के ठीक नीचे पाइजेन फॉल्ट नाम की सक्रिय फॉल्ट लाइन की पहचान की थी। यानी बांध ऐसी जगह पर बन रहा है जहां भूगर्भीय गतिविधि का खतरा मौजूद है।

हिमालय दुनिया की सबसे अधिक भूकंपीय गतिविधि वाले प्रमुख पर्वत क्षेत्रों में शामिल है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि भूकंप, हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं के आपस में जुड़ने से जोखिम कई गुना बढ़ सकता है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यारलुंग त्सांगपो?

मेदोग बांध को लेकर भारत की चिंता का सबसे बड़ा कारण नदी का रास्ता है। यारलुंग त्सांगपो तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। यहां इसे सियांग कहा जाता है। इसके बाद यह असम में ब्रह्मपुत्र के रूप में आगे बढ़ती है और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है।

इस तरह चीन नदी के ऊपरी हिस्से में है, जबकि भारत निचले हिस्से में स्थित है। इसलिए तिब्बत में नदी के प्रवाह से जुड़े बड़े बदलावों का असर भारत के उन इलाकों पर पड़ सकता है, जो इस नदी पर निर्भर हैं। भारत की चिंता केवल पानी की मात्रा को लेकर नहीं है। नदी में पानी छोड़ने के समय और मात्रा में बड़ा बदलाव भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

ज्यादा पानी आया तो बाढ़, कम हुआ तो दूसरी परेशानी

भारी बारिश के दौरान अगर जलाशय से अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है तो नीचे की ओर बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। दूसरी ओर, सूखे समय में पानी के प्रवाह में लंबे समय तक कमी रहने पर खेती, मछली पालन और स्थानीय समुदायों के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, ब्रह्मपुत्र को भारत में मानसून से मिलने वाली सहायक नदियों से भी बड़ी मात्रा में पानी मिलता है। इसके बावजूद भारत के लिए नदी के ऊपरी हिस्से पर चीन का नियंत्रण एक रणनीतिक चिंता बना हुआ है।

भारत भी बना रहा 11 हजार मेगावाट का प्रोजेक्ट

चीन के मेदोग बांध के जवाब में भारत अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर 11,000 मेगावाट के सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहा है। इसका एक उद्देश्य ऊपरी हिस्से में चीन की ओर से होने वाले बांध निर्माण के बीच भारत की अपनी जल-प्रबंधन क्षमता को मजबूत करना है। इससे पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी 2025 में सियांग और ब्रह्मपुत्र में पानी के प्रवाह में बड़ी कमी की आशंका जता चुके हैं। उन्होंने सियांग क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए भी इस परियोजना को गंभीर चिंता का विषय बताया था।

सबसे बड़ी चिंता चीन की बेपरवाही

भारत के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि नदी का ऊपरी हिस्सा तिब्बत में है और वहां होने वाली गतिविधियों पर भारत का सीधा नियंत्रण नहीं है। ऐसे में समय पर जानकारी मिलना बेहद जरूरी हो जाता है। यही बात नेपाल की हालिया आपदा ने भी सामने ला दी। काठमांडू के पत्रकार परशुराम काफ्ले ने आरोप लगाया कि नेपाल को नीचे की ओर बढ़ रही भारी मात्रा में पानी की समय रहते जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि नेपाल ने अपने पड़ोसियों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को संबोधित किया है, लेकिन इस घटना में शुरुआती चेतावनी नहीं मिलने से बड़ी जनहानि हुई।

भारत-चीन के बीच व्यापक जल समझौता नहीं

भारत और चीन के बीच ऐसा कोई व्यापक जल-साझाकरण समझौता नहीं है, जिसके तहत दोनों देश वास्तविक समय में नदी से जुड़ा हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करें। यही वजह है कि मेदोग बांध को लेकर केवल बांध की क्षमता ही चिंता का कारण नहीं है। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि तिब्बत में नदी के ऊपरी हिस्से में होने वाले बदलावों की जानकारी भारत को कितनी जल्दी और कितनी पारदर्शिता के साथ मिल पाएगी।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Newstrack Journalism Hindi