Liquor Tetra Pack UP 2026: उत्तर प्रदेश में एक तरफ ड्रिंक एंड ड्राइव के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है, जिससे सड़क दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। दूसरी ओर नशा अब घरेलू हिंसा की एक बड़ी वजह बनकर सामने आ रहा है, जिससे परिवार और समाज दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
ऐसे हालात में उम्मीद यह की जाती है कि शराब की बिक्री पर सख्ती बढ़े, लेकिन इसके उलट अब इसे और आसान बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। दूध और जूस की तरह दिखने वाले टेट्रा पैक में शराब की बिक्री इसी कड़ी का हिस्सा बनकर सामने आई है, जिसने बहस को और तेज कर दिया है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ऐसी पैकेजिंग समाज के लिए एक नई चुनौती बन सकती है, खासकर तब जब नशे के दुष्परिणाम पहले से ही सामने आ रहे हों।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी 'जिसे खरीदना है, वो किसी भी रूप में खरीदेगा'
उत्तर प्रदेश में अब शराब भी उसी तरह के टेट्रा पैक में उपलब्ध कराई जा रही है, जैसे आमतौर पर दूध, जूस या मिल्कशेक मिलते हैं। यह बदलाव जहां एक तरफ सुविधा और मार्केटिंग के लिहाज से बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इससे जुड़े सामाजिक और नैतिक सवाल भी तेजी से उठ रहे हैं। खासकर बच्चों और छात्रों पर इसके संभावित असर को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी मुद्दे पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जो व्यक्ति शराब खरीदना चाहता है, वह किसी भी रूप में खरीद सकता है, इसलिए केवल पैकेजिंग के आधार पर रोक लगाना उचित नहीं होगा।
टेट्रा पैक में शराब की शुरुआत कैसे हुई
उत्तर प्रदेश में हर साल एक्साइज पॉलिसी के तहत शराब की बिक्री के नियम तय किए जाते हैं। लेकिन हाल ही में एक प्रशासनिक फैसले के जरिए छोटे पैक में शराब बेचने की अनुमति दी गई, जिसमें टेट्रा पैक भी शामिल है। यह पैकिंग हल्की होती है, आसानी से कैरी की जा सकती है और टूटने का खतरा भी नहीं रहता। यही वजह है कि कंपनियां इसे एक नए विकल्प के तौर पर बाजार में ला रही हैं। हालांकि, जब इस मुद्दे को अदालत में उठाया गया तो यह बात सामने आई कि मौजूदा एक्साइज नीति में टेट्रा पैक का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसके बावजूद फरवरी 2025 में लिए गए प्रशासनिक फैसले के आधार पर इसकी बिक्री शुरू की गई। यही अस्पष्टता विवाद की बड़ी वजह बनी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई क्यों बंद की, क्या रही अहम टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत (Justice Surya Kant) की बेंच ने यह स्पष्ट किया कि केवल आशंका के आधार पर किसी नीति को रोका नहीं जा सकता। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह की पैकेजिंग से स्कूलों या कॉलेजों में कोई वास्तविक समस्या सामने आई है। कोर्ट ने कहा कि शराब खरीदने वाला व्यक्ति पैकेजिंग नहीं देखता, बल्कि उसकी मंशा मायने रखती है। इसलिए टेट्रा पैक को लेकर अलग से रोक लगाने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। इसी वजह से अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वे अपनी बात संबंधित अधिकारियों के सामने रख सकते हैं।
बच्चों और छात्रों पर असर को लेकर क्यों उठी चिंता
याचिकाकर्ता मीनाक्षी तिवारी ने अपनी याचिका में इस बात को प्रमुखता से उठाया कि टेट्रा पैक में शराब की बिक्री बच्चों और छात्रों के लिए खतरा बन सकती है। उनका कहना था कि छोटे और सामान्य दिखने वाले ये पैक आसानी से बैग में रखे जा सकते हैं और किसी को शक भी नहीं होगा। चूंकि ये पैक देखने में जूस या दूध जैसे लगते हैं, इसलिए बच्चों के बीच भ्रम की स्थिति भी बन सकती है। इसके अलावा, कम कीमत और छोटी मात्रा के कारण यह पहली बार शराब आजमाने वाले युवाओं के लिए आसान विकल्प बन सकता है, जो आगे चलकर आदत में बदल सकता है।
पैकेजिंग का मनोवैज्ञानिक असर, क्यों बदल सकता है व्यवहार
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी उत्पाद की पैकेजिंग लोगों के व्यवहार को प्रभावित करती है। जब शराब जैसी चीज को एक सामान्य और रोजमर्रा के पेय पदार्थ की तरह पेश किया जाता है, तो उसका डर और संकोच कम हो सकता है। टेट्रा पैक में शराब का मतलब यह भी है कि इसे खुलेआम ले जाना और इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। इससे खासकर युवाओं के बीच शराब को लेकर गंभीरता कम हो सकती है और यह एक सामान्य आदत की तरह विकसित हो सकती है।
अन्य जगहों पर क्या है स्थिति, क्या मिलते हैं ऐसे उदाहरण
दुनिया के कई देशों और भारत के कुछ राज्यों में छोटे पैक या कैन में शराब पहले से बिकती रही है। हालांकि टेट्रा पैक में शराब अभी नया प्रयोग माना जा रहा है।
याचिका के दौरान अहमदाबाद का उदाहरण भी दिया गया, जहां इस तरह की पैकेजिंग के बावजूद कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई। लेकिन हर क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए एक जगह का अनुभव दूसरी जगह पर पूरी तरह लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार के सामने क्या हैं चुनौतियां और आगे का रास्ता
अब जब अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया है, तो जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य सरकार और एक्साइज विभाग पर आ गई है। उन्हें यह तय करना होगा कि टेट्रा पैक में शराब की बिक्री को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं या नहीं।
सरकार के सामने यह भी चुनौती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि इस तरह की पैकेजिंग का गलत इस्तेमाल न हो, खासकर बच्चों और छात्रों के बीच। इसके लिए सख्त निगरानी, स्पष्ट चेतावनी और उम्र से जुड़े नियमों को और मजबूत करना जरूरी हो सकता है।
कानूनी स्थिति क्या कहती है, क्यों बना हुआ है असमंजस
कानूनी रूप से टेट्रा पैक में शराब की बिक्री पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, लेकिन इसे लेकर स्पष्ट अनुमति भी नीति में दर्ज नहीं है। यही वजह है कि यह मुद्दा अब भी चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में यही संकेत दिया कि यह नीति से जुड़ा मामला है और इस पर अंतिम निर्णय सरकार को ही लेना होगा।

