Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
शिमला में नवजात अदला-बदली मामले में अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय, 30 लाख रुपये मुआवजा

शिमला में नवजात अदला-बदली मामले में अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय, 30 लाख रुपये मुआवजा

Newz Fatafat 5 days ago

हिमाचल प्रदेश में अदालत का निर्णय

हिमाचल प्रदेश समाचार: शिमला में एक अस्पताल की लापरवाही के मामले में अदालत ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने नवजात के अदला-बदली के मामले में सरकार को पीड़िता को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

यह निर्णय सिविल जज कोर्ट नंबर-5 द्वारा लिया गया।

लापरवाही का आरोप

सिविल जज सुष्मिता शर्मा की अदालत ने कमला नेहरू अस्पताल में प्रसव के दौरान हुई गंभीर लापरवाही के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार को शीतल ठाकुर को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों की ड्यूटी के दौरान हुई लापरवाही के लिए राज्य सरकार की वाइकेरियस लायबिलिटी बनती है। शीतल ठाकुर को 26 मई 2016 को प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था।

मामले का विवरण

शीतल ठाकुर को रात करीब 11:10 बजे लेबर रूम में ले जाया गया। प्रसव के बाद, ड्यूटी पर मौजूद आया ने परिवार को लड़का होने की सूचना दी, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें एक नवजात बच्ची सौंप दी गई। बच्ची के कपड़े भी बदले हुए थे। परिवार ने अस्पताल के कर्मचारियों के सामने आपत्ति जताई, लेकिन उनकी शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद दंपती ने निजी लैब में डीएनए जांच कराई, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि बच्ची उनकी जैविक संतान नहीं है।

डीएनए मिलान की प्रक्रिया

हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत डीएनए मिलान कराया गया, जिससे दोनों नवजातों के जैविक माता-पिता की पहचान हुई और शीतल को उनका बेटा वापस मिल सका। इसके बाद पीड़िता ने न्याय और मुआवजे की मांग को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

सरकार का इनकार

सुनवाई के दौरान सरकार ने अस्पताल में किसी भी प्रकार की लापरवाही से इनकार किया। सरकारी पक्ष ने एक महिला अटेंडेंट के बयान का हवाला देते हुए कहा कि प्रसव के दौरान किसी ने शिकायत नहीं की थी।

अदालत का अंतिम निर्णय

अदालत ने सरकारी पक्ष की जांच रिपोर्ट और दलीलों को विश्वसनीय नहीं माना। कोर्ट ने पाया कि जांच रिपोर्ट में न तारीख थी और न ही गवाहों के बयान या दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख था। गवाह यह भी नहीं बता सके कि जांच किसने और कब की थी। अदालत ने माना कि अस्पताल की लापरवाही के कारण माता-पिता अपने नवजात बच्चे के प्राकृतिक प्यार और स्नेह से लंबे समय तक वंचित रहे और उन्हें गंभीर मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी।


Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Newz Fatafat