एक तरफ मध्य प्रदेश HC कहता है कि दूसरे निकाह पर कोई सजा नहीं है। वहीं दूसरी तरफ SC और केरल HC ने इसे मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव बताया था। भारत में धर्म आधारित कानूनों और समान अधिकारों के बीच एक बड़ी बहस छिड़ी है।
एक तरफ मध्य प्रदेश HC ने अपने फैसले में कहा है कि मुस्लिम पुरुष के दूसरे निकाह करने पर कोई सजा नहीं दी जा सकती। वहीं सुप्रीम कोर्ट और केरल HC ने यह साफ किया था कि मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव होता है, जिसका समाधान UCC से हो सकता है और आईपीसी की धारा 494 में सभी नागरिकों के लिए सजा बराबर होती है।
हाई कोर्ट का फैसला: दूसरी निकाह पर क्यों नहीं हुई सजा?
मध्य प्रदेश HC ने मुस्लिम पुरुष के दूसरे निकाह और उस पर लगने वाले ‘द्विविवाह’ (Bigamy) के आरोपों को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर एक मुस्लिम पुरुष पहली बीवी के रहते हुए दूसरा निकाह करता है, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत सजा नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 494 की मुख्य शर्त यह है कि दूसरा निकाह तब अपराध है जब वह कानूनन अमान्य हो। मुस्लिम कानून में बहुविवाह (एक से अधिक बीवी रखना) की इजाजत है, इसलिए दूसरा निकाह स्वतः ही अवैध नहीं हो जाती। इस आधार पर कोर्ट ने शौहर के खिलाफ ‘द्विविवाह’ के आरोपों को रद्द (Quash) कर दिया।
हालाँकि कोर्ट ने दूसरे निकाह के आरोप को हटा दिया, लेकिन शौहर को पूरी तरह राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने कहा कि बीवी द्वारा लगाए गए अन्य गंभीर आरोपों पर मुकदमा चलता रहेगा, जैसे- वैवाहिक क्रूरता या प्रताड़ना, मारपीट और धमकी देना, गलत तरीके से बंधक बनाना।
भेदभाव का समाधान UCC: सुप्रीम कोर्ट
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट (मार्च 2026) में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बड़ी सुनवाई की थी।। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ‘पर्सनल लॉ’ की वजह से कई बार मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने साफ कहा कि इसका असली समाधान समान नागरिक संहिता (UCC) ही है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वह खुद सीधे किसी पुराने धार्मिक कानून को खत्म नहीं कर सकता, क्योंकि इससे कानूनी ‘शून्य’ पैदा हो जाएगा। यानी, अगर शरिया कानून हट जाए, तो उस समय निकाह या संपत्ति के बँटवारे के लिए कोई दूसरा कानून मौजूद नहीं होगा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने संसद को इशारा किया है कि वे UCC पर कानून बनाएँ ताकि सभी नागरिकों के लिए एक जैसे नियम हों।
इसके अलावा, केरल हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में कहा था कि दूसरी शादी करने पर सजा सभी नागरिकों के लिए बराबर होती है। चाहें वे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई.. किसी भी धर्म का हो। आईपीसी की धारा 494 किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है।
मुस्लिम महिलाओं की असली स्थिति
जमीनी हकीकत यह है कि मौजूदा पर्सनल लॉ के चलते मुस्लिम महिलाएँ अक्सर असुरक्षित महसूस करती हैं। जहाँ बाकी धर्मों में दूसरी शादी पर कड़ी सजा है, वहीं इस्लाम में पहली बीवी को यह समझौता करना पड़ता है कि उसका शौहर दूसरी बीवी ला सकता है।
इसके अलावा, विरासत के मामले में भी मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधा हिस्सा मिलता है। मध्य प्रदेश के केस में भी देखा गया कि महिला को बच्चा न होने पर पीटा गया और शौहर ने दूसरा निकाह कर लिया।
न्यायपालिका के इन दो अलग-अलग फैसलों से साफ है कि वर्तमान कानून पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट भविष्य में समानता की ओर देख रहा है। मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक तभी मिल पाएगा, जब निकाह और संपत्ति के नियम मजहब के आधार पर नहीं, बल्कि इंसान की गरिमा और समानता के आधार पर होंगे।
