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भारत और इंडोनेशिया मिलकर बदलेंगे समंदर का नक्शा, जानिए साबांग और ग्रेट निकोबार के नए गठजोड़ से क्यों परेशान है चीन

 मलक्का स्ट्रेट के एंट्री प्वॉइंट साबांग और निकोबार की दूरी 100 समुद्री मील से भी कम है। यहाँ से दुनिया का 25% समुद्री व्यापार होता है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया की आधिकारिक यात्रा पूर्वी हिंद महासागर और वैश्विक समुद्री व्यापार के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रही है।

जकार्ता के मर्देका पैलेस में राष्ट्रपति प्रबोवो के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल भुगतान पर सहमति के साथ-साथ इंडोनेशिया के साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के पूरक हब के रूप में विकसित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया।

इस यात्रा के दौरान रक्षा, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल भुगतान प्रणालियों के एकीकरण और क्रिटिकल मिनरल्स पर व्यापक सहमति बनी है। लेकिन जिस एक दूरगामी और रणनीतिक फैसले ने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान सबसे ज्यादा अपनी ओर खींचा है, वह है इंडोनेशिया के रणनीतिक साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के साथ एक पूरक समुद्री हब के रूप में विकसित करना।

दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों ने इस बात पर पूर्ण सहमति जताई है कि साबांग बंदरगाह और भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को जोड़ने वाले पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पूर्वी हिंद महासागर में न केवल व्यापारिक कनेक्टिविटी को अभूतपूर्व बढ़ावा देंगे, बल्कि दोनों देशों को एक अटूट रणनीतिक सुरक्षा कवच भी प्रदान करेंगे।

भौगोलिक संयोग से भारत-इंडोनेशिया कंट्रोल करेंगे मलक्का स्ट्रेट का एंट्री प्वॉइंट

वैश्विक समुद्री व्यापार के नक्शे पर साबांग और ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति किसी प्राकृतिक वरदान से कम नहीं है। इंडोनेशिया के सुमात्रा प्रांत के उत्तरी छोर पर वेह द्वीप पर स्थित साबांग और भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु ग्रेट निकोबार एक-दूसरे से महज सौ समुद्री मील से भी कम दूरी पर आमने-सामने स्थित हैं। यह पूरा क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मुहाने पर बैठता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री गलियारों में से एक माना जाता है। हर साल इस संकरे समुद्री रास्ते से अस्सी हजार से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज गुजरते हैं, जो पूरे एशिया को यूरोप, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका से जोड़ते हैं।

दुनिया का लगभग एक-चौथाई समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति (80,000 से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज) इसी संकरे जलमार्ग के रास्ते से होती है। ऐसे में साबांग और ग्रेट निकोबार को एक साथ एक साथ पूरक हब के रूप में विकसित करने की भारत-इंडोनेशिया की साझा योजना का मतलब है कि इस महा-जलमार्ग के प्रवेश द्वार पर दो सबसे भरोसेमंद लोकतांत्रिक देशों की सीधी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति होगी।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर भारत का नौ अरब डॉलर का मास्टरस्ट्रोक

भारत सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार में लगभग नौ अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से एक विशाल और बहु-आयामी बुनियादी ढाँचा परियोजना विकसित कर रही है। नीति आयोग की देखरेख में चल रही इस ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना का मुख्य आधार गलाथिया बे इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है। यह एक अत्याधुनिक डीप-वॉटर पोर्ट है जिसकी कंटेनर कार्गो क्षमता बेहद विशाल रखी गई है।

वर्तमान में भारत के पास इस क्षेत्र में गहरे पानी के बर्थ न होने के कारण देश का अधिकांश कंटेनर कार्गो कोलंबो, सिंगापुर या मलेशिया के पोर्ट क्लैंग के रास्ते रूट होता है, जिससे भारत को हर साल भारी वित्तीय और राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। गलाथिया बे में बीस मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई है, जो दुनिया के सबसे विशालकाय जहाजों को आसानी से संभालने की क्षमता रखती है।

इसके साथ ही इस मेगा-प्रोजेक्ट के तहत एक नया ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है, जो सालाना लाखों यात्रियों और कार्गो को संभालने में सक्षम होगा। इस पूरे हब को ऊर्जा देने के लिए एक आधुनिक गैस और सौर-आधारित बिजली घर और एक आधुनिक ग्रीनफील्ड टाउनशिप का निर्माण भी किया जा रहा है, जो आने वाले समय में वाणिज्य, पर्यटन और वैश्विक लॉजिस्टिक्स का एक बहुत बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।

साबांग और ग्रेट निकोबार का आर्थिक जुड़ाव अहम

इंडोनेशिया के रणनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चिंता रही थी कि भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना उनके अपने साबांग मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) के लिए एक आर्थिक खतरा बन सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा ने इस नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया है।

सफल और टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्थाएँ कभी भी अकेले या अलग-थलग रहकर काम नहीं करतीं, बल्कि वे हमेशा इंटर-कनेक्टेड नेटवर्कों के माध्यम से ही फलती-फूलती हैं। साबांग को साल 2000 में ही इंडोनेशिया सरकार ने फ्री ट्रेड एरिया और फ्री पोर्ट घोषित किया था, लेकिन विदेशी पूँजी निवेश की कमी और कमजोर लॉजिस्टिक्स के कारण यह क्षेत्र सुमात्रा द्वीप के पाँच करोड़ लोगों के लिए वह आर्थिक प्रवेश द्वार नहीं बन पाया, जिसकी कल्पना की गई थी।

अब भारत के ग्रेट निकोबार में हो रहे भारी निवेश के समानांतर जब साबांग को विकसित किया जाएगा, तो दोनों बंदरगाह एक-दूसरे के विरोधी बनने के बजाय पूरक साथी के रूप में काम करेंगे।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में चल रहे विशाल निर्माण कार्यों के लिए मुख्य भूमि भारत से संसाधन मंगाना बहुत महँगा पड़ता है, क्योंकि चेन्नई वहाँ से लगभग बारह सौ किलोमीटर दूर है। इसके विपरीत साबांग वहां से बेहद करीब है और कैंपबेल बे से इसकी दूरी महज 166 किलोमीटर है। ऐसे में इंडोनेशिया का सुमात्रा प्रांत सीमेंट, निर्माण सामग्री और कुशल श्रमशक्ति को बेहद कम लागत पर ग्रेट निकोबार भेज सकता है।

इसके अलावा दोनों बंदरगाह मिलकर आने-जाने वाले कार्गो जहाजों को रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस, वेयरहाउसिंग और ट्रांसशिपमेंट की संयुक्त सुविधाएँ दे सकते हैं। यदि भविष्य में किसी एक बंदरगाह पर ट्रैफिक का अत्यधिक दबाव बढ़ता है, तो दूसरा बंदरगाह एक बेहतरीन बैकअप के रूप में काम कर सकेगा, जिससे पूरे क्षेत्र की लॉजिस्टिक्स दक्षता कई गुना बढ़ जाएगी।

साबांग के विकास का इतिहास और भारत-इंडोनेशिया के ज्वॉइंड वर्किंग फोर्स की भूमिका अहम

भारत और इंडोनेशिया के बीच साबांग बंदरगाह को लेकर आधिकारिक और रणनीतिक बातचीत कोई नई बात नहीं है। इसकी वास्तविक शुरुआत मई 2018 में प्रधानमंत्री मोदी की पहली आधिकारिक इंडोनेशिया यात्रा के दौरान हुई थी, जब इंडोनेशिया के तत्कालीन समुद्री मामलों के समन्वय मंत्री लुहुत पंडजाइतन ने नई दिल्ली को साबांग के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। उसी समय दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक में समुद्री सहयोग पर एक ऐतिहासिक साझा दृष्टिकोण पत्र जारी किया था।

इसके तहत दोनों देशों ने एक 'संयुक्त कार्य बल' (Joint Task Force) का गठन किया। इस टास्क फोर्स की पहली बैठक 2019 में बांदा आचे (Aceh) में और दूसरी बैठक 2022 में पोर्ट ब्लेयर में हुई थी। भारत की सरकारी इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी कंपनी 'राइट्स' (RITES) ने साबांग बंदरगाह के बुनियादी ढाँचा विकास पर अपनी प्री-फिजिबिलिटी स्टडी भी पूरी कर ली है।

अब 2026 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो के बीच हुई बैठक ने इस संयुक्त परियोजना को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारने के लिए नए फंड और समय-सीमा को निर्धारित कर दिया है।

चीन का मुद्दा और साबांग को BRI से बाहर रखने की इंडोनेशियाई रणनीति

इस मेगा प्रोजेक्ट के भू-राजनीतिक निहितार्थों को समझने के लिए 'चीन के कोण' (China Angle) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दक्षिण-पूर्वी एशिया और हिंद महासागर में चीन अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) नीति के तहत बंदरगाहों का जाल बिछा रहा है। इंडोनेशिया में भी चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है, जिसमें जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड ट्रेन और 23 अरब डॉलर के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत चार प्रमुख आर्थिक कॉरिडोर (उत्तरी सुमात्रा, उत्तरी कालीमंतन, उत्तरी सुलावेसी और बाली) शामिल हैं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य बात यह है कि इंडोनेशिया ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत साबांग बंदरगाह को चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट्स से पूरी तरह बाहर रखा। हालाँकि एक समय चीन ने साबांग में भारी दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन इंडोनेशिया की सरकार ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए चीनी प्रस्तावों को आगे नहीं बढ़ाया और साबांग के विकास के लिए चीन के बजाय भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को प्राथमिकता दी।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि साबांग इंडोनेशिया की राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का एक अमूल्य प्रतीक माना जाता है। इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एकता को दर्शाने के लिए वहाँ के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में 'साबांग से मेरुके तक' का नारा लगाया जाता है, जो ठीक वैसा ही है जैसे भारत में हम 'कश्मीर से कन्याकुमारी तक' कहते हैं।

चूँकि साबांग इंडोनेशिया का सबसे पश्चिमी छोर है और इसके पास ही रोंडो और बेंगगाला जैसे संवेदनशील बाहरी द्वीप स्थित हैं, इसलिए इंडोनेशिया कभी नहीं चाहता कि यहाँ चीन जैसी किसी ऐसी विस्तारवादी ताकत का नियंत्रण या प्रभाव स्थापित हो जो भविष्य में उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा कर सके।

सैन्य अड्डा नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का माध्यम

भारत के रणनीतिक हलकों में अक्सर यह भ्रम फैल जाता है कि साबांग में विकास की अनुमति मिलने का मतलब है कि भारत को वहाँ 'सैन्य अड्डा' (Military Base) मिल रहा है। इंडोनेशिया की प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ देवी फॉर्च्यून अनवर और इंडोनेशियाई राजनयिकों ने हमेशा

है कि इंडोनेशिया की विदेश नीति 'स्वतंत्र और सक्रिय' (Bebas dan Aktif) के सिद्धांत पर चलती है, जो किसी भी विदेशी ताकत को अपनी धरती पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं देती।

इसलिए भारत की साबांग में एंट्री कोई सैन्य विस्तार नहीं है, बल्कि यह 'स्टेटस-सिग्नलिंग' (Status Signalling) और आर्थिक सुरक्षा का पुल है। साबांग परियोजना का सफल कार्यान्वयन भारत को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की तरह दक्षिण-पूर्वी एशिया में एक बड़े बुनियादी ढाँचा डेवलपर और आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह भारत के एक्ट ईस्ट' (Act East Policy) और महासागर विजन' (MAHASAGAR Vision) को वास्तविक ताकत प्रदान करता है।

इस प्रोजेक्ट के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ, हालाँकि भारत-इंडोनेशियान निकाल लेंगे हल

इस शानदार और महत्वाकांक्षी साझा समुद्री सपने के सामने कुछ वास्तविक और व्यावहारिक चुनौतियाँ भी खड़ी हैं जिनसे दोनों देशों को मिलकर निपटना होगा। सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड इस मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है और म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी कई परियोजनाएं काफी देरी से चल रही हैं।

साबांग के मामले में भारत को अपनी इस प्रशासनिक सुस्ती वाली छवि को पूरी तरह से बदलना होगा और कार्य की गति को तेज बनाए रखना होगा। इसके अलावा आचे और अंडमान के बीच पर्यटन, क्रूज जहाजों और नौकायन को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों को अपने आव्रजन, सीमा शुल्क और वीजा नियमों को बेहद सरल, सुलभ और डिजिटल रूप से आधुनिक बनाना होगा ताकि व्यापारियों और पर्यटकों को कोई असुविधा न हो।

एक और बड़ी चुनौती पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की है, क्योंकि ग्रेट निकोबार एक बेहद संवेदनशील जैव विविधता क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। भारत सरकार को यह पूरी तरह सुनिश्चित करना होगा कि बंदरगाह और बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ-साथ वहां की मूल जनजातियों के अधिकारों और प्राचीन वर्षावनों का संरक्षण पूरी कड़ाई के साथ किया जाए।

दो समुद्री सभ्यताओं का मिलन साबित हो सकता है ये मेगा प्रोजेक्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह इंडोनेशिया यात्रा साबांग और ग्रेट निकोबार को वैश्विक समुद्री व्यापार के नए जुड़वाँ स्तंभों के रूप में स्थापित करने की एक मजबूत और ऐतिहासिक नींव रख चुकी है। यह केवल दो बंदरगाहों का भौतिक विकास नहीं है, बल्कि दो महान समुद्री सभ्यताओं का एक ऐसा आधुनिक पुनर्मिलन है जो आने वाले कई दशकों तक पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शांति, स्थिरता, आर्थिक प्रगति और सुरक्षा की दिशा और दशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।

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