पश्चिम बंगाल के मालदा वाली घटना पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्वतंत्र जाँच के आदेश, प्रशासन की विफलता उजागर। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार में लोकतंत्र का मजाक बनना अब आम बात हो गई है।
बुधवार (1 अप्रैल 2026) को चुनावी ड्यूटी पर तैनात सात न्यायिक अधिकारियों जिनमें तीन महिलाएँ भी शामिल थीं, उनको मालदा जिले के एक BDO कार्यालय में घेर लिया गया।
ये अधिकारी SIR के तहत मतदाता सूची से जुड़े काम में लगे थे। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह सामने आया कि इन अधिकारियों को लगभग 9 घंटे तक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ा, जो राज्य प्रशासन की लापरवाही को दिखाता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपिन पंचोली की पीठ ने इस मामले का संज्ञान लिया। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना पर पश्चिम बंगाल सरकार और मालदा जिला प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई।
सोची-समझी और सोची-समझी चाल
कोर्ट ने कहा कि यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी और प्रेरित कोशिश थी, जिसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और लंबित मामलों में आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया को रोकना था। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को अपनी अधिकारिता के लिए सीधी चुनौती बताया।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों को निशाना बनाना, जो असल में इस अदालत का विस्तार हैं, एक खुली और दुस्साहसिक कोशिश है। यह न सिर्फ न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने का प्रयास है, बल्कि यह सीधे तौर पर इस अदालत की सत्ता को चुनौती देने जैसा है।
अदालत के मुताबिक, यह घटना किसी भी तरह से सामान्य नहीं मानी जा सकती और पहली नजर में यह एक सुनियोजित, सोची-समझी और जानबूझकर की गई कार्रवाई लगती है, जिसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ना और बाकी मामलों में चल रही सुनवाई की प्रक्रिया में बाधा डालना था।

पीठ ने आगे कहा कि न्यायिक अधिकारियों के मन में डर का माहौल बनाने की ऐसी कोशिशें, ताकि वे अपने कर्तव्यों का पालन न कर सकें और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ा जा सके, किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। अदालत ने मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव और उत्पीड़न को आपराधिक अवमानना का मामला बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, "हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हम किसी भी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं देंगे, ताकि न्यायिक अधिकारियों के मन में मनोवैज्ञानिक डर का माहौल बनाया जा सके, जो अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। ऐसा व्यवहार निस्संदेह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट, 1971 की धारा 2(सी) के तहत आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है।"

अदालत ने आगे कहा कि मालदा की यह घटना नागरिक और पुलिस प्रशासन की पूरी तरह विफलता को दिखाती है, खासकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के मामले में। पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि न्यायिक अधिकारियों को जानबूझकर खाने-पीने जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हमें जानकारी दी गई है कि स्थिति इतनी गंभीर थी कि न्यायिक अधिकारियों तक भोजन और पानी भी पहुँचने नहीं दिया गया। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने यह भी बताया कि न तो जिला मजिस्ट्रेट और न ही पुलिस अधीक्षक उस बीडीओ कार्यालय पहुँचे, जहाँ अधिकारियों को घेरकर रखा गया था।"
प्रशासन का आचरण बेहद निंदनीय: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्टीकरण माँगा
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने समय पर प्रभावी कदम नहीं उठाए, जबकि उन्हें घटना की पूरी जानकारी थी और न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित निकालना उनकी जिम्मेदारी थी।
अदालत ने कहा, "यह देखकर हमें दुख होता है कि मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का रवैया बेहद निंदनीय रहा। उन्हें इस अदालत को यह बताना होगा कि जब उन्हें दोपहर करीब 3:30 बजे न्यायिक अधिकारियों के घेराव की सूचना मिल गई थी, तब भी उनकी सुरक्षित निकासी के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए।"
अदालत ने आगे कहा कि राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी थी कि वह तुरंत भारतीय निर्वाचन आयोग को सूचना देता और जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बलों की तैनाती की माँग करता, ताकि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
मौखिक टिप्पणी में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य बन गया है, जहाँ हर कोई राजनीतिक भाषा में बात करता है। अदालत ने यह भी अफसोस जताया कि जिन न्यायिक अधिकारियों को निष्पक्ष एजेंट के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए था, उन्हें भी हमलों से नहीं बख्शा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए
मालदा की इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि SIR की प्रक्रिया में कोई रुकावट न आए और ड्यूटी पर तैनात न्यायिक अधिकारियों के जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और उनके परिवारों की सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित की जा सके।
अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह पर्याप्त केंद्रीय बलों की माँग करे और उन्हें उन सभी स्थानों पर तैनात किया जाए, जहाँ न्यायिक अधिकारी SIR प्रक्रिया के तहत आपत्तियों के निपटारे के लिए भेजे गए हैं।
इसके अलावा, अदालत ने आदेश दिया कि जिन होटलों और सरकारी गेस्ट हाउसों में न्यायिक अधिकारी और उनके परिवार रह रहे हैं, वहाँ पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जाए। साथ ही पुलिस प्रशासन को यह भी निर्देश दिया गया कि ड्यूटी पर तैनात न्यायिक अधिकारियों द्वारा बताए गए खतरे के स्तर का आकलन करे और तुरंत जरूरी कदम उठाए।
अदालत ने आगे भारतीय निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वे सभी जरूरी सुधारात्मक कदम उठाएँ, ताकि न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई जिम्मेदारियों का सुरक्षित और सुचारु रूप से पालन हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, सभी जिला मजिस्ट्रेट, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और अन्य पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि किसी भी समय आपत्तियाँ दाखिल करने या उनकी सुनवाई के दौरान परिसर में 5 से ज्यादा लोग प्रवेश न करें। इन अधिकारियों को अदालत में अनुपालन रिपोर्ट भी जमा करने का आदेश दिया गया है।
गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने मुख्य सचिव, मालदा के DGP, DM और SP को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों न की जाए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निर्देश भारतीय निर्वाचन आयोग को दिया गया है। अदालत ने कहा है कि मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव की घटना की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो या राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को सौंपी जाए।
अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करे, जबकि जाँच करने वाली एजेंसी को जाँच पूरी करने के बाद अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।
CEC ज्ञानेश कुमार ने मालदा हिंसा का मामला NIA को सौंपा
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए, मालदा हिंसा मामले की जाँच एक स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने के क्रम में, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को एक पत्र लिखा, जिसमें इस मामले की जाँच करने की जिम्मेदारी NIA को सौंपी गई।

पत्र में लिखा गया है, "मुझे माननीय सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार (2 अप्रैल 2026) के आदेश (स्वतः संज्ञान रिट याचिका (सिविल) संख्या 3/2026, प्रति संलग्न) के संदर्भ में यह बताने का निर्देश दिया गया है। यह मामला मालदा जिले के कालियाचक क्षेत्र के BDO कार्यालय में SIR के तहत काम कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों को असामाजिक तत्वों द्वारा घेरने से जुड़ा है। इस संबंध में आपसे अनुरोध है कि इस मामले की आवश्यक जाँच/पड़ताल की जाए और माननीय अदालत के निर्देशों के अनुसार अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट सीधे अदालत में प्रस्तुत की जाए।" यह पत्र भारतीय निर्वाचन आयोग के सचिव सुजीत कुमार मिश्रा द्वारा हस्ताक्षरित है।
मालदा हिंसा मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की एक घटना से जुड़ा है, जहाँ बुधवार (1 अप्रैल 2026) की शाम को सात न्यायिक अधिकारियों जिनमें तीन महिला जज भी शामिल थीं उनको एक बड़ी भीड़ ने 9 घंटे से ज्यादा समय तक घेरकर रखा। ये अधिकारी कालियाचक के BDO कार्यालय में SIR के तहत मतदाता सूची से जुड़े काम कर रहे थे।
घटना की शुरुआत दोपहर करीब 3:30 बजे हुई, जब बड़ी संख्या में लोग कार्यालय के बाहर इकट्ठा हो गए और मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ विरोध करने लगे। भीड़ ने पूरे परिसर को घेर लिया, जिससे न्यायिक अधिकारी कई घंटों तक बाहर नहीं निकल सके।

अदालत के अनुसार, यह स्थिति देर रात तक तनावपूर्ण बनी रही और स्थानीय प्रशासन की तरफ से तुरंत कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं दिखी। आखिरकार पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ही आधी रात के बाद न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सका।
हालाँकि, रिहा होने के बाद भी उनकी सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं थी। जब वे अपने ठहरने के स्थानों की ओर लौट रहे थे, तब उनके गाड़ियों पर पत्थरों और डंडों से हमला किया गया, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "चौंकाने वाली बात यह है कि जब न्यायिक अधिकारियों को आधी रात के आसपास छोड़ा गया और वे अपने-अपने ठिकानों की ओर लौट रहे थे, तब उनके गाड़ियों पर पत्थर फेंके गए और बांस की लाठियों व ईंटों से हमला किया गया।"
अदालत ने यह भी कहा कि मालदा हिंसा की यह घटना उन न्यायिक अधिकारियों पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी, जो बिना छुट्टी लिए लगातार अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
