ब्रिटेन में AROPL पर बड़ी कार्रवाई, 9 गिरफ्तार। जानिए- इस विवादित अंतरराष्ट्रीय मजहबी आंदोलन की मान्यताएँ, इतिहास और आरोप। इंग्लैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बुधवार (29 अप्रैल 2026) की सुबह बड़ी पुलिस कार्रवाई हुई जिसमें 500 से अधिक पुलिस अफसरों ने ‘अहमदी रिलिजन ऑफ पीस एंड लाइट’ (AROPL) नामक मजहबी संगठन के ठिकानों पर एकसाथ छापेमारी की।
पुलिस ने तीन अलग-अलग जगहों पर वारंट के तहत तलाशी ली जिसमें चेशायर के क्रू शहर स्थित संगठन का मुख्यालय भी शामिल था।
यह मुख्यालय ‘वेब हाउस’ नाम की एक पुरानी अनाथालय की इमारत में है जो ग्रेड-II सूचीबद्ध ऐतिहासिक इमारत है। छापेमारी के दौरान कम से कम सात वैन और दर्जनों अफसर मौके पर मौजूद थे। गंभीरत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इस दौरान ऊपर से पुलिस का हेलीकॉप्टर भी मंडरा रहा था। इस बीच संगठन के सदस्य काली बीनी टोपियाँ पहने बाहर सड़क पर खड़े नजर आए।
किसे और क्यों गिरफ्तार किया गया?
इस पूरी कार्रवाई में 6 पुरुष और 3 महिलाओं समेत कुल नौ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार लोगों में दो अमेरिकी पुरुष और एक अमेरिकी महिला, दो मैक्सिकन पुरुष, एक इतालवी महिला, एक स्पेनिश पुरुष, एक स्वीडिश महिला और एक मिस्री पुरुष शामिल हैं। यानी यह संगठन पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप का है।
चेशायर पुलिस के अनुसार, इन सभी गिरफ्तारियों की वजह एक महिला की शिकायत है जो कभी इस संगठन की सदस्य थी। उस महिला ने मार्च 2026 में पुलिस से संपर्क करके बताया कि साल 2023 में उसके साथ गंभीर यौन अपराध, जबरन विवाह और आधुनिक दासता जैसे अपराध किए गए। पुलिस ने बताया कि यह सभी गिरफ्तारियाँ उसी महिला की शिकायत से जुड़ी हैं।
पुलिस का बयान और संगठन की प्रतिक्रिया
चेशायर कांस्टेबुलरी के मुख्य अधीक्षक गैरेथ रिगले ने कहा कि यह कार्रवाई एक विस्तृत और ठोस जाँच के बाद की गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी मजहब की जाँच नहीं है बल्कि उन गंभीर आरोपों की जाँच है जो पुलिस को बताए गए हैं।
उन्होंने आम नागरिकों को भरोसा दिलाया कि इस मामले से व्यापक समुदाय को कोई खतरा नहीं है और स्थानीय लोगों को आश्वस्त करने के लिए गश्त बढ़ा दी गई है। दूसरी तरफ AROPL संगठन ने मीडिया के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। हालाँकि, संगठन के वकीलों ने ‘द गार्जियन’ अखबार को बताया कि उनका मुवक्किल किसी भी गलत काम से पूरी तरह इनकार करता है।
कौन है यह संगठन और इसका इतिहास
अहमदी मजहब: शांति और प्रकाश (AROPL) एक नया मजहबी आंदोलन है जिसकी जड़ें शिया इस्लाम (खास तौर पर बारह इमामों को मानने वाले) से जुड़ी हैं। इस संगठन के लोग भी शिया मुसलमानों की तरह मानते हैं कि बारहवें इमाम (मुहम्मद अल-महदी) की मृत्यु नहीं हुई है। उनका विश्वास है कि वे ‘ओकल्टेशन’ यानी छुपी हुई अवस्था में हैं और आखिरी समय यानी कयामत के दौर में वापस आएँगे।
Religion Media Centre के मुताबिक, AROPL की मान्यता इससे आगे जाती है। इनके अनुसार, अब वही आखिरी समय आ चुका है और बारहवें इमाम पहले ही वापस आ चुके हैं। इस आंदोलन की किताबों में कहा गया है कि यही वह नया मजहब है जिसके बारे में पैगंबर मुहम्मद के परिवार ने पहले से भविष्यवाणी की थी। AROPL खुद को एकमात्र सच्चा और पूरी दुनिया के लिए बना धर्म मानता है और इसके अनुयायी खुद को ईश्वर द्वारा चुना हुआ मानते हैं।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि AROPL का पाकिस्तान में मौजूद अहमदिया मुस्लिम कम्युनिटी या भारत के अहमदियों से कोई संबंध नहीं है। दोनों पूरी तरह अलग संगठन हैं। इस संगठन की शुरुआत इराक में हुई थी और अब यह करीब 40 देशों में सक्रिय है। अनुमान है कि लगभग 7,000 लोग इस आंदोलन से जुड़ चुके हैं या इसके संपर्क में आ चुके हैं। 2018 में इसका मुख्यालय स्वीडन में था लेकिन 2021 से इसे इंग्लैंड में स्थानांतरित कर दिया गया।
कैसे शुरू हुआ यह आंदोलन?
AROPL की शुरुआत 1990 के दशक के अंत में बसरा (इराक) से हुई। सन् 1999 में इसके संस्थापक अहमद अल-हसन ने यह दावा किया कि उनकी मुलाकात बारहवें इमाम मुहम्मद अल-महदी से हुई है और इमाम ने उन्हें एक विशेष मजहबी मिशन सौंपा है। इसी के बाद से इस आंदोलन की नींव पड़ी और धीरे-धीरे लोग उनके आसपास जुड़ने लगे।
अहमद अल-हसन को उनके अनुयायियों ने ‘यमानी’ मानना शुरू कर दिया। शिया मान्यता के अनुसार ‘यमानी’ वह व्यक्ति होता है जो महदी के आने से पहले लोगों को तैयार करता है और उन्हें एकजुट करता है ताकि वे महदी का स्वागत कर सकें। सन् 2002 आते-आते अहमद अल-हसन ने दूसरी शिया संस्थाओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। उन्होंने ईरान और इराक के शिया संस्थानों को भ्रष्ट बताया। इसके बाद वे अचानक सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। आखिरी बार उन्हें 2007 में इराक में देखा गया था और उसके बाद से उनका कोई स्पष्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है।
उनके गायब होने के बाद उनके अनुयायी एकजुट नहीं रह सके और कई अलग-अलग गुटों में बँट गए। समय के साथ 2015 के बाद AROPL सबसे बड़ा गुट बनकर सामने आया जिसे ‘ब्लैक बैनर्स ऑफ द ईस्ट’ भी कहा जाता है। एक दूसरा गुट ‘व्हाइट बैनर्स’ या ‘नजफ का दफ्तर’ के नाम से जाना जाता है। इन दोनों गुटों के बीच गहरे मतभेद हैं, जहाँ AROPL का आरोप है कि दूसरा गुट इराकी सरकार के प्रभाव में है जबकि ‘व्हाइट बैनर्स’ AROPL को ही मजहब से बाहर मानते हैं।
इन सब के बीच AROPL का नेतृत्व अब अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक के हाथ में है। हाशम का जन्म अमेरिका में 1983 में हुआ था। उन्होंने 2015 में यह दावा किया कि अहमद अल-हसन ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी है कि वे दुनिया को बताएँ कि महदी के प्रकट होने का समय आ चुका है। AROPL में उन्हें ‘काइम’ कहा जाता है। ‘काइम’ का मतलब होता है वह व्यक्ति जो ईश्वर के आदेश पर खड़ा होता है और उसे आगे बढ़ाता है। हाशम का दावा है कि वे चाँद को गायब कर सकते हैं और घातक बीमारियाँ ठीक कर सकते हैं। हाशम पहले एक डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार थे जो UFO आधारित धर्म ‘रायलिज्म’ पर काम कर चुके थे।
यह आंदोलन अपने दावों के समर्थन में एक दस्तावेज का भी हवाला देता है जिसे पैगंबर मुहम्मद की ‘वसीयत’ कहा जाता है। इस दस्तावेज के अस्तित्व को सुन्नी मुसलमान स्वीकार नहीं करते लेकिन AROPL के अनुसार इसमें 12 इमामों और 12 महदियों के नाम लिखे हुए हैं। उनके मुताबिक, पहले दो महदियों के नाम ‘अहमद’ और ‘अब्दुल्लाह’ हैं जिन्हें वे अहमद अल-हसन और अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक से जोड़ते हैं।
अहमद अल-हसन (फोटो साभार: The Ahmadi Religion)एलियंस और इलुमिनाटी जैसी मान्यताएँ
AROPL के सदस्य अपनी मान्यताओं का आधार ‘The Goal of the Wise: The Gospel of the Riser of the Family of Mohammed’ नामक किताब को मानते हैं। यह किताब 2022 में प्रकाशित हुई थी और इसमें अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक की शिक्षाएँ और उनके ‘रहस्योद्घाटन’ (revelations) लिखे हैं। उनके अनुसार, इनमें से कई बातें उन्हें अहमद अल-हसन ने सिखाईं हैं।
इस आंदोलन की एक बड़ी मान्यता "सात वाचाओं" की है। इनके अनुसार ईश्वर ने समय-समय पर सात अलग-अलग लोगों के साथ समझौते (वाचा) किए- आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा, मुहम्मद और अहमद अल-हसन। उनका कहना है कि हर नई वाचा पिछली से बेहतर होती गई क्योंकि इंसानों ने पुरानी वाचाओं को तोड़ा जिसके बाद सजा मिली और फिर नई वाचा आई।
इस आंदोलन में कुछ रहस्यमय मान्यताएँ भी हैं। इसमें सपनों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उनके अनुसार सपनों के जरिए भविष्य की झलक, ईश्वर के संदेश या चेतावनियाँ मिल सकती हैं। सपनों की सही व्याख्या करना वे ईश्वर के दूत की पहचान मानते हैं।
इसके अलावा, AROPL के सदस्य पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। वे मानते हैं कि शिया विचार ‘रजआ’ (जिसमें महदी के आने के बाद कुछ मृत लोग वापस जीवित होते हैं) और पुनर्जन्म असल में एक ही बात है। उनका यह भी मानना है कि कई लोग असल में पुराने पैगंबरों के आध्यात्मिक रूप में दोबारा जन्म लेते हैं।
कुछ मान्यताएँ ऐसी भी हैं जिन्हें आम तौर पर षड्यंत्र सिद्धांत माना जाता है। AROPL के अनुसार, इंसान की शुरुआत आदम से हुई और विकासवाद का सिद्धांत इबलीस ने फैलाया। वे यह भी मानते हैं कि धरती पर ऐसे प्राणी मौजूद हैं जो इंसान और एलियन का मिश्रण हैं और अपना रूप बदल सकते हैं। इसी तरह ‘हयतान’ नाम की एक वानर जैसी प्रजाति के होने का भी दावा किया जाता है।
उनकी एक और मान्यता यह है कि जॉर्ज वॉशिंगटन असल में एडम वाइशाउप्ट थे जिन्हें इलुमिनाटी का संस्थापक माना जाता है और आज भी अमेरिकी सरकार पर उसी गुप्त संगठन का नियंत्रण है। वे कहते हैं कि अमेरिकी नोट और विज्ञापनों में दिखने वाली ‘एक आँख’ इसी का प्रतीक है। आर्थिक व्यवस्था को लेकर भी उनका अलग नजरिया है। AROPL के अनुसार, आज की मुद्रा प्रणाली एक धोखा है और जब उनका ‘दिव्य न्यायपूर्ण राज्य’ बनेगा तो पैसे की जरूरत खत्म हो जाएगी। उस व्यवस्था में हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा और अपनी जरूरत के अनुसार चीजें पाएगा।
भविष्य के राज की कल्पना
AROPL के अनुसार, अब सातवीं वाचा के बाद एक ‘दिव्य न्यायपूर्ण राज्य’ बनेगा और यही इस आंदोलन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। उनका मानना है कि इस राज्य में दुनिया के सभी धर्म एक हो जाएँगे और वहाँ एक ईश्वर द्वारा चुना गया राजा शासन करेगा, न कि लोकतंत्र। हालाँकि, वे लोकतंत्र को सही व्यवस्था नहीं मानते फिर भी चुनी हुई सरकारों का सम्मान करते हैं और उन्हें गिराने की कोशिश नहीं करते।
इस राज्य की कल्पना प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक The Republic में बताए गए आदर्श राज्य जैसी बताई जाती है, जहाँ ‘दार्शनिक राजा’ शासन करता है। AROPL के अनुसार, यह भूमिका मुहम्मद अल-महदी निभाएँगे। उनका यह भी मानना है कि यह राज्य पहले दुनिया के किसी एक हिस्से में बनेगा और धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल जाएगा। इसके लिए इराक, मिस्र, तुर्की, जर्मनी और स्वीडन को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस राज्य की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी बताई जाती है क्योंकि इसे वे सबसे आसान भाषा मानते हैं। ब्रिटेन में रहने वाले उनके अनुयायी इसी आने वाले राज्य की तैयारी के रूप में जीवन जीते हैं।
मुख्य इस्लाम से कैसे अलग हैं परंपराएँ
AROPL खुद को बाकी इस्लामी परंपराओं से काफी अलग मानता है। उनका दावा है कि लगभग हर मजहब यहाँ तक कि इस्लाम भी 99% तक गलत हो चुका है। वे खुद को ‘सच्चा इस्लाम’ और एक सार्वभौमिक मजहब बताते हैं।
इसी वजह से वे यह भी कहते हैं कि कुरान समय के साथ बदल (भ्रष्ट) हो गई है जो कि मुख्यधारा मुस्लिम मान्यताओं से बिल्कुल अलग बात है। AROPL की एक और अलग मान्यता काबा को लेकर है। जहाँ पूरी मुस्लिम दुनिया काबा (मक्का, सऊदी अरब) को सबसे पवित्र स्थल मानती है तो वहीं AROPL का मानना है कि असली काबा पेट्रा (जॉर्डन) में है।
उनकी धार्मिक प्रथाएँ भी अलग हैं। जहाँ इस्लाम में दिन में पाँच वक्त की नमाज अनिवार्य मानी जाती है तो AROPL के अनुसार प्रार्थना एक लगातार चलने वाली अवस्था है जिसमें इंसान हर समय दिल से ईश्वर से जुड़ा रह सकता है। इसी तरह रमजान को वे पारंपरिक इस्लामी कैलेंडर के बजाय दिसंबर में मनाते हैं। कुछ मान्यताएँ और भी ज्यादा विवादित हैं। उदाहरण के तौर पर, उनका कहना है कि जन्नत में जो पेड़ था वह दरअसल फातिमा का पिछला जन्म था। कई देशों, खासकर तुर्की में इस तरह की बात को ईशनिंदा (ब्लासफेमी) माना जाता है।
सामाजिक मुद्दों पर भी उनका नजरिया अलग है। AROPL में महिलाओं के लिए हिजाब या दुपट्टा अनिवार्य नहीं है। समलैंगिकता को वे बढ़ावा नहीं देते लेकिन LGBTQI+ लोगों को स्वीकार करते हैं और उनके अधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन भी कर चुके हैं। शराब को लेकर भी उनका रवैया पारंपरिक इस्लाम की तुलना में ज्यादा उदार माना जाता है।
इन्हीं अलग मान्यताओं और प्रथाओं की वजह से AROPL को कई मुस्लिम-बहुल देशों में विवादास्पद माना जाता है। कई जगह उनके अनुयायियों को विरोध और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा है क्योंकि उनकी बातें मुख्यधारा इस्लामी विश्वासों से काफी अलग और टकराव वाली मानी जाती हैं।
