Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story

कहाँ है बलिराजगढ़, जो ASI की खुदाई में उगल रहा मिथिला की प्राचीन सभ्यता और वैभव के अवशेष; राजा बलि से लेकर विदेह तक से है कनेक्शन

 बलिराजगढ़ की अहमियत को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें इसके पुराने इतिहास और पहले हुई खुदाइयों पर एक नजर डालनी होगी...

बिहार के मधुबनी जिले में स्थित ऐतिहासिक बलिराजगढ़ इन दिनों पुरातात्विक दुनिया में कौतूहल और गौरव का केंद्र बना हुआ है।

हाल ही में इस प्राचीन स्थल से मिले असाधारण पुरातात्विक साक्ष्यों ने न केवल इतिहासकारों को चौंकाया है, बल्कि मिथिलांचल के गौरवशाली अतीत को एक नया आयाम भी दिया है।

जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और संसदीय समिति के अध्यक्ष संजय कुमार झा के अनुसार, यहाँ चल रही वैज्ञानिक खुदाई में एक अत्यंत समृद्ध और उन्नत सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस स्थल की महत्ता को देखते हुए यहाँ अगले 10 वर्षों तक खुदाई जारी रखने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

इसके साथ ही इस सुदूर इलाके में ASI का एक नया दफ्तर खोलने और एक बड़ा संग्रहालय (म्यूजियम) बनाने की तैयारी भी चल रही है। रामायण काल से इसका जुड़ाव, राजा बलि से जुड़ी पुरानी लोककथाएँ और मौर्य व शुंग साम्राज्य की मजबूत दीवारें बलिराजगढ़ को भारत की प्राचीन सभ्यता का एक सबसे अनोखा केंद्र बनाती है।

 (फोटो साभार: The Print)

पुरातत्वविदों का कहना है कि स्थल पर मौजूद टीम एक ऐसी सभ्यता की खोज कर रही है, जो लौह युग के विदेह साम्राज्य की समझ को पूरी तरह से बदल सकती है, जिसका संबंध राजा जनक और रामायण से है। यह नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा भारत की प्राचीन जड़ों की गहराई में जाकर रामायण और महाभारत काल के ठोस प्रमाण खोजने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

खास खाइयों से मिले अनोखे सबूत: खुदाई में मिलीं पत्थर की गेंदें, दुर्लभ सिक्के और मिट्टी के खिलौने

बलिराजगढ़ में इस समय जो खुदाई चल रही है, उसमें पुरानी गलतियों से सीखकर बिल्कुल नए और आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले की खुदाइयों में जो सबसे बड़ी दिक्कत पानी भरने और मैपिंग की आती थी, उसे इस बार सैटेलाइट इमेजिंग, आधुनिक वैज्ञानिक ट्रेंचिंग और जीपीएस मैपिंग जैसी तकनीकों के जरिए दूर कर लिया गया है।

इस समय वैज्ञानिकों की टीम पूरी तरह से छह विशेष खाइयों (यानी ट्रेंच) पर काम कर रही है। इन्हें बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से दो मुख्य हिस्सों में बाँटा गया है-एक है किले की मुख्य दीवार का क्षेत्र (Fortification Area) और दूसरा है आम नागरिकों के रहन-सहन वाला दक्षिणी क्षेत्र (Southern Area)।

अगर हम इन खाइयों से मिली चीजों को देखें, तो किले वाले हिस्से की खाइयों (जैसे YC-30, YC-31 और YD-31) की खुदाई पूरी हो चुकी है, जहाँ से प्राचीन सुरक्षा दीवारें और दुश्मनों को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की भारी गेंदें मिली हैं। वहीं दूसरी तरफ इसका दक्षिणी हिस्सा प्राचीन लोगों के रोजमर्रा के जीवन के सबसे बड़े राज खोल रहा है।

यहाँ की एक खाई (YD-12) की गहराई तो 5.40 मीटर तक नीचे चली गई है, जहाँ से 13 परतों वाला मिट्टी के छल्लों से बना एक शानदार कुआँ (रिंग-वेल) मिला है। जानकारों का कहना है कि इसका इस्तेमाल पानी या फिर अनाज को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता होगा।

इसी तरह एक और खाई (ZD-16) से पानी निकालने की आधुनिक नाली और सोख्ता गड्डा मिला है, जबकि खाई YL-14 से सात परतों वाली ईंटों का एक बहुत बड़ा ढाँचा सामने आया है। यह गहरी खुदाई हमें वक्त के पहिए में सदियों पीछे ले जा रही है।

प्राचीन नगर नियोजन और मिट्टी से निकला पुरावशेषों का खजाना

बलिराजगढ़ की मिट्टी से इस समय जो भी ढाँचे और पुरानी वस्तुएँ बाहर आ रही हैं, वे उस जमाने के एक बेहद उन्नत और योजनाबद्ध शहर की कहानी सुनाती हैं। खुदाई में मिलीं सात परतों वाली ईंटों की दीवारें, घरों के आँगन और पक्के फर्श यह साबित करते हैं कि यहाँ के लोग मकान बनाने की कला (इंजीनियरिंग) में बहुत माहिर थे।

उनके घरों का लेआउट दिखाता है कि यह शहर अचानक या बेतरतीब नहीं बसा था, बल्कि इसे पूरी प्लानिंग के साथ बनाया गया था। गंदे पानी को निकालने के लिए बनाई गई नालियों की व्यवस्था और सोख्ता गड्ढे यह साफ करते हैं कि उस दौर के लोग साफ-सफाई और सेहत को लेकर कितने जागरूक थे।

इसके अलावा यहाँ की मिट्टी से रोजमर्रा की जिंदगी, खेल-कूद और व्यापार से जुड़ी ढेरों प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं। खुदाई में उस दौर के सबसे कीमती और शाही माने जाने वाले 'उत्तरी काली पॉलिश वाले बर्तन' (NBPW) के टुकड़े मिले हैं, जो आमतौर पर मौर्य और शुंग काल के अमीर और संपन्न परिवारों की पहचान होते थे।

इनके साथ ही लाल, काले और धूसर (ग्रे) रंग के चमकीले बर्तनों की मौजूदगी यह बताती है कि यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने की तकनीक कितनी लाजवाब थी।

बच्चों के खेलने के लिए मिट्टी की छोटी-छोटी खिलौना गाड़ियाँ, पासे, सुंदर मनके (बीट्स) और शिकार या सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की छोटी गेंदें यह साबित करती हैं कि यहाँ का सामाजिक जीवन बहुत खुशहाल और आर्थिक रूप से मजबूत था।

पुरानी खुदाइयों का इतिहासः 1962 से शुरू हुई खोज

बलिराजगढ़ की अहमियत को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें इसके पुराने इतिहास और पहले हुई खुदाइयों पर एक नजर डालनी होगी। यह पहली बार नहीं है जब यहाँ जमीन को खोदा जा रहा है, बल्कि मौजूदा खुदाई इस जगह को समझने का चौथा बड़ा वैज्ञानिक प्रयास है।

इस टीले के नीचे छिपे इतिहास को सबसे पहले साल 1962-63 में पहचाना गया था, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहाँ पहली बार शुरुआती खुदाई का काम शुरू किया था। उस समय मिले चंद अवशेषों ने ही यह इशारा कर दिया था कि इसके नीचे कुछ बहुत बड़ा और ऐतिहासिक छिपा हुआ है।

इसके बाद, साल 1972-75 के दौरान यहाँ दूसरे दौर की और ज्यादा व्यवस्थित खुदाई की गई, जिसने यहाँ की ऐतिहासिक कड़ियों को और मजबूत किया।

फिर तीसरे दौर की खुदाई वर्ष 1998-99 के आसपास हुई। इन शुरुआती तीनों खुदाइयों में पुरातत्वविदों को मौर्य साम्राज्य (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) और शुंग राजवंश के समय की विशाल ईंटों से बनी सुरक्षा दीवारें, दुर्लभ मुहरें, पुराने सिक्के और खास तरह के मिट्टी के बर्तन मिले थे।

हालाँकि उस समय तकनीकी कमियों, संसाधनों की किल्लत और सबसे बढ़कर बारिश के दिनों में जमीन के नीचे का पानी (भूजल स्तर) अचानक ऊपर आ जाने की वजह से काम को बीच में ही रोकना पड़ा था। लेकिन आज आधुनिक तकनीकों के साथ यहाँ चौथे दौर की सबसे बड़ी खुदाई शुरू की गई है, ताकि अधूरे रह गए इतिहास को पूरा किया जा सके।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बारिश की वजह से काम को फिलहाल के लिए रोक दिया गया है। बारिश थमने के बाद दोबारा खुदाई शुरू होने की संभावना है।

राजा बलि की कहानी और इस जगह के नाम का पुराना रहस्य

बलिराजगढ़ के नाम और इसकी पहचान के पीछे सदियों पुरानी लोककथाएँ और मान्यताएँ छिपी हुई हैं। यहाँ के स्थानीय लोग और बुजुर्ग हमेशा से यह मानते आए हैं कि इस विशाल मिट्टी के टीले और ऊँची दीवारों का संबंध पौराणिक काल के महाप्रतापी और दानी राजा बलि से है।

लोक-परंपराओं में कहा जाता है कि यह स्थान कभी राजा बलि की राजधानी या उनका ऐसा किला था जिसे कोई जीत नहीं सकता था। यह कहानी यहाँ के लोगों के दिलों में इस कदर रची-बसी है कि जब भी इस टीले के पास खुदाई की बात होती है, तो लोगों के मन में सबसे पहला कौतूहल राजा बलि के उसी प्राचीन महल और नगरी को देखने का जाग उठता है।

राजा बलि वही राजा हैं, जिनका जिक्र हिंदू पुराणों में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा में आता है। हालाँकि आज के पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए यह जगह किसी एक राजा की कहानी से कहीं आगे बढ़कर, समय की कई परतों को अपने अंदर समेटे हुए एक प्राचीन शहरी सभ्यता का जीता-जागता सबूत है।

रामायण काल से सीधा जुड़ाव और मिथिला का पुराना गौरव

बलिराजगढ़ का नाता सिर्फ पौराणिक कहानियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बहुत गहरा और सीधा संबंध रामायण काल और माता सीता की जन्मस्थली मिथिला से है। अगर नक्शे के हिसाब से देखें, तो यह जगह प्राचीन मिथिलांचल के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है।

यह वही महान भूमि है जो राजा जनक के ज्ञान, महर्षि याज्ञवल्क्य की विद्वता और भगवान राम-सीता के विवाह के इतिहास से महकती है। रामायण काल के रास्तों और जगहों पर शोध करने वाले जानकारों का मानना है कि प्राचीन समय में यह किला एक बहुत बड़ा प्रशासनिक या सुरक्षा केंद्र रहा होगा।

इस जगह की सबसे खास बात यह है कि यह माता सीता की जन्मस्थली पुनौराधाम (सीतामढ़ी) और नेपाल के जनकपुर के बीच एक बेहद मजबूत कल्पित सुरक्षा गढ़ या किले के रूप में दिखाई देता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार की मौजूदा सांस्कृतिक योजनाओं में बलिराजगढ़ को 'रामायण सर्किट' का एक बेहद जरूरी हिस्सा माना जा रहा है।

मोदी सरकार की कोशिश है कि भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़ी जितनी भी ऐतिहासिक जगहें हैं, उन्हें एक साथ जोड़कर विकसित किया जाए। बलिराजगढ़ की इस नई खुदाई से मिथिलांचल के उस दौर के पक्के भौतिक सबूत सामने आ रहे हैं, जो अब तक सिर्फ धार्मिक किताबों और कहानियों में सुने जाते थे।

इससे स्पष्ट है कि रामायण काल की मिथिला सिर्फ विचारों या ज्ञान की नगरी नहीं थी, बल्कि उसके पास एक बहुत ही मजबूत, सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से बसाया गया शहर भी था।

केंद्र सरकार के प्रयास और इस खोज से भविष्य में होने वाले बड़े बदलाव

बलिराजगढ़ से मिल रहे इन अनमोल और ऐतिहासिक सबूतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदलने के लिए एक बहुत बड़ा और लंबा प्लान तैयार किया है। सरकार की तरफ से यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया है कि यहाँ अगले 10 सालों तक लगातार वैज्ञानिक खुदाई का काम जारी रहेगा।

इतने लंबे समय तक चलने वाली खुदाई से यह फायदा होगा कि इतिहास का कोई भी पन्ना अछूता नहीं रहेगा और इस प्राचीन सभ्यता की पूरी कहानी दुनिया के सामने आ सकेगी। इस बड़े अभियान को अच्छे से चलाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक परमानेंट दफ्तर इसी ग्रामीण इलाके में खोला जा रहा है।

खुदाई से निकलने वाली हर छोटी-बड़ी चीज जैसे मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों को सुरक्षित रखने के लिए यहाँ एक भव्य और आधुनिक म्यूजियम (संग्रहालय) बनाया जाएगा। यह म्यूजियम न केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा, बल्कि देश-विदेश के इतिहासकारों और शोध करने वाले छात्रों के लिए पढ़ाई का एक बहुत बड़ा जरिया बनेगा।

इस पूरी खोज और विकास का सबसे बड़ा और सीधा फायदा आने वाले समय में पूरे मिथिलांचल और उत्तर बिहार के लोगों को मिलने वाला है। जब यह जगह रामायण सर्किट से पूरी तरह जुड़ जाएगी और यहाँ एक बड़ा म्यूजियम बन जाएगा, तो यहाँ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।

पर्यटन के इस विकास से इस सुदूर ग्रामीण इलाके में बेहतरीन सड़कें, होटल, गाड़ियाँ और संचार जैसी आधुनिक सुविधाएँ तेजी से पहुँचेंगी।

सबसे अच्छी बात यह होगी कि स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होटल, हस्तशिल्प और छोटे-मोटे व्यापार के रूप में रोजगार के हजारों नए मौके पैदा होंगे, जिससे इलाके के लोगों का आर्थिक जीवन सुधरेगा। यह खोज आने वाली पीढ़ियों को उनकी समृद्ध विरासत और मिथिला के गौरवशाली अतीत से रूबरू कराएगी, जिससे हर किसी को अपनी संस्कृति पर गर्व होगा।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: OpIndia Hindi