BJP प्रत्याशी गोपालकृष्णन ने फ्लेक्स बोर्ड लगाकर जनता से सवाल पूछा कि गुरुवायुर जैसे मंदिर वाले शहर में मुस्लिम MLA क्यों चुने जा रहे हैं। केरल में विधानसभा चुनाव हैं। सभी पार्टियों ने अपना पूरा दम खम झोंका हुआ है।
सभी अपने-अपने तरीके से जनता से कनेक्ट कर रहे हैं। इस बीच, केरल की धार्मिक नगरी गुरुवायूर में बीजेपी प्रत्याशी भी जनता से कनेक्ट कर रहे हैं। हालाँकि इस चुनाव में राजनीतिक पार्टियाँ अलग-अलग फ्रंट से चुनाव लड़ रही हैं, जिसमें प्रोपेगेंडा वाली मीडिया (पीत पत्रकारिता) भी अपना काम करने में जुटी हुई हैं। इसी कड़ी में न्यूज मिनट नाम की प्रोपेगेंडा वेबसाइट ने एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जो जनता से जुड़ाव की कोशिशों को सांप्रदायिक घोषित करने पर तुली है।
इस मामले में आगे बढ़ें, इससे पहले देख लीजिए न्यूज मिनट की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट। इसका शीर्षक है- ‘Why no Hindu MLA: Guruvayur becomes BJP's laboratory for a new pitch in Kerala‘

न्यूज मिनट का यह लेख साफ-साफ एंटी हिंदू और एंटी भाजपा है। यह हिंदुओं के सही सवाल को सांप्रदायिक का ठप्पा लगाकर दबाने की कोशिश कर रहा है। गुरुवायुर जैसे मशहूर श्री कृष्ण मंदिर के शहर में पिछले पचास साल से मुस्लिम विधायक का राज चल रहा है। भाजपा के उम्मीदवार बी गोपालकृष्णन ने बड़ा फ्लेक्स बोर्ड लगाकर सीधा सवाल पूछा- ‘क्या तुम यह नहीं देख रहे?’ उसमें 1977 से 2021 तक के मुस्लिम विधायकों की पूरी सूची दिखाई।
न्यूज मिनट इसे नया प्रयोग और आक्रामक हिंदू प्रतीकवाद बता रहा है। लेकिन असल बात यह है कि गुरुवायुर श्री कृष्ण मंदिर का दिल है। लाखों हिंदू तीर्थयात्री हर साल वहाँ आते हैं। मंदिर की अर्थव्यवस्था चलती है। भक्तों की आस्था जुड़ी है। फिर वहाँ पचास साल तक हिंदू विधायक न चुनना विकास की अनदेखी और आस्था की उपेक्षा नहीं तो और क्या है? न्यूज मिनट जानबूझकर इस सवाल को घुमा रहा है ताकि हिंदू खुद को गलत महसूस करें और चुप हो जाएँ। यह हिंदुओं पर मानसिक दबाव बनाने का तरीका है।

लेख की शुरुआत ही देख लें। न्यूज मिनट कहता है कि सोशल मीडिया पर एक फ्लेक्स बोर्ड घूम रहा है। उसमें भाजपा उम्मीदवार के साथ मुस्लिम विधायकों की सूची है और सवाल है- ‘क्या तुम नहीं देख रहे?’ वह इसे ‘पचास साल की उपेक्षा’ बताते हुए एनडीए उम्मीदवार को चुनने का आह्वान बता रहा है। लेकिन न्यूज मिनट यह नहीं बताता कि गुरुवायुर केरल का सबसे बड़ा तीर्थ स्थान है। यहाँ बाल कृष्ण यानी गुरुवायुरप्पन की मूर्ति है। लाखों हिंदू भक्त यहाँ आते हैं। 1977 से 2021 तक के चुनावों में ज्यादातर विधायक मुस्लिम रहे- जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के एनके अकबर। क्या यह संयोग है? या वोट बैंक की राजनीति का नतीजा? लेख इसे प्रतिनिधित्व का सवाल बनाकर नहीं देखता। बल्कि ‘हिंदू विधायक’ शब्द को ही विवादास्पद बना देता है। गोपालकृष्णन ने चुनावी भाषणों में कहा कि गुरुवायुरप्पन ने उन्हें बुलाया है और इलाके को बचाना है। न्यूज मिनट इसे धार्मिक तस्वीर कहकर उड़ा देता है।

अरे, मंदिर के शहर में आस्था का जिक्र करना गलत कैसे? क्या मुस्लिम उम्मीदवार मस्जिद के पास चुनाव लड़ते हुए अपनी आस्था नहीं दिखाते? लेकिन न्यूज मिनट का दोहरा मापदंड यहीं से शुरू होता है।

लेख आगे कहता है कि केरल में भाजपा की बात पहले सीमित रहती थी। लेकिन इस बार गोपालकृष्णन ने शुरुआत से ही ‘हिंदू विधायक’ का मुद्दा उठाया। वे विकास के मुद्दे भी उठा रहे हैं - गंदा पीने का पानी, खराब श्मशान घाट, बंद स्वास्थ्य केंद्र, भ्रष्टाचार। लेकिन न्यूज मिनट का पूरा ध्यान सिर्फ धार्मिक मोड़ पर है। लेखक अपने साथी के साथ गोपालकृष्णन के घर गया और उनसे बात की। वहाँ गोपालकृष्णन ने विकास के मुद्दों पर विस्तार से बताया। लेकिन जब ‘हिंदू विधायक’ का सवाल आया तो न्यूज मिनट का लेखक कहता है कि स्वर बदल गए। गोपालकृष्णन ने पूछा- “तुम लोग ये असली मुद्दे क्यों नहीं दिखाते? मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, गंदा पानी दिखाया, लेकिन मीडिया ने अनदेखा कर दिया।”
न्यूज मिनट इसे जवाब दिए बिना जवाब देना बता रहा है। लेकिन असल में यही सच्चाई है। न्यूज मिनट जैसे मीडिया विकास को छोड़कर सिर्फ सांप्रदायिक कोण पर अटक जाता है। गोपालकृष्णन ने साफ कहा कि चुने गए विधायक मंदिर में आस्था नहीं रखते। कुछ उम्मीदवारों ने खुलकर कहा कि मंदिर में दीप जलाना हराम है और मूर्ति पूजा उनके विश्वास के खिलाफ है। अगर गुरुवायुर जैसी जगह पर उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है तो कम से कम मंदिर का सम्मान तो करे।

यहाँ न्यूज मिनट ने गोपालकृष्णन पर आरोप लगाया कि उन्होंने मौजूदा विधायक एनके अकबर पर कोई खास उदाहरण या सही बयान नहीं दिया। लेखक लिखता है कि अकबर ने कभी सार्वजनिक रूप से कहा नहीं कि मंदिर में दीप जलाना हराम है। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? इस्लाम के धर्म ग्रंथ में मूर्ति पूजा को सबसे बड़ा पाप माना जाता है। केरल में कई मुस्लिम नेता मंदिर की परंपराओं पर सवाल उठा चुके हैं। विधायक बनकर मंदिर के शहर में रहते हुए अगर कोई मंदिर की भावना का सम्मान नहीं करता तो विकास कैसे होगा? लेख कहता है कि गोपालकृष्णन ने मंदिर के कामकाज में दखल का सबूत नहीं दिया। लेकिन क्या दखल की जरूरत है? अगर विधायक का मन मंदिर से नहीं जुड़ा तो वह मंदिर की समस्याओं को प्राथमिकता नहीं देगा। यही मानसिक दबाव है - हिंदू सवाल पूछे तो ‘कोई सबूत नहीं’ कहकर खारिज कर दो।
बातचीत में गोपालकृष्णन ने तुष्टीकरण की राजनीति का मुद्दा उठाया। उन्होंने पास के चवक्काड में कंठापुरम अबूबकर मुसलियार की बड़ी रैली का उदाहरण दिया। वहाँ विधायक और नेता मौलवी के आने का इंतजार करते रहे। लेकिन दो किलोमीटर दूर कुंभ मेला जैसे हिंदू धार्मिक आयोजन में कोई नहीं गया। गोपालकृष्णन ने कहा, “मुझे कोई समस्या नहीं, यह उनकी आजादी है। लेकिन सच्चे सेकुलर होने के लिए दोनों आयोजनों में जाना चाहिए।”
न्यूज मिनट इसे पुराना तरीका बता रहा है। खास दावे से बड़े कथन में ले जाना। लेकिन यह बड़ा कथन ही सच्चाई है। केरल में राजनीतिक पार्टियाँ मुस्लिम वोट बैंक के लिए हिंदू आयोजनों से दूर रहती हैं। यही तुष्टीकरण है जो हिंदू मंदिरों पर हमले, लव जिहाद और मंदिर की जमीन पर कब्जे को बढ़ावा देता है। लेख गोपालकृष्णन के विकास और आस्था वाले तर्क को घुमावदार कहता है, “विकास की कमी इसलिए क्योंकि आस्था नहीं, इसलिए हिंदू विधायक चाहिए।” लेकिन क्या यह गलत है? मंदिर शहर में अगर विधायक मंदिर की आस्था से नहीं जुड़ा तो तीर्थयात्रा की अर्थव्यवस्था, सफाई, सड़कें कैसे सुधरेंगी? लाखों भक्त आते हैं लेकिन बुनियादी सुविधाएँ खराब। यही सवाल हिंदू पूछ रहे हैं।

असल बात यह है कि हिंदू अब जाग रहे हैं। पचपन प्रतिशत हिंदू आबादी वाले केरल में मंदिर शहर में गैर हिंदू विधायक का पचास साल का पैटर्न हिंदू पहचान पर हमला है। भाजपा नरम रहकर भी जमीन नहीं बना पा रही थी इसलिए अब अपनी असली विचारधारा दिखा रही है। लेख इसे पार्टी के अंदरूनी झगड़े कहकर भाजपा को बाँटने की कोशिश कर रहा है।
न्यूज मिनट केरल में लगातार ऐसा प्रोपेगेंडा चला रहा है। भाजपा को जमीन नहीं मिल रही इसलिए वह हिंदू मतदाता को जागरूक कर रही है। लेकिन न्यूज मिनट इसे नया प्रयोगशाला बता रहा है जैसे भाजपा हिंदुओं पर प्रयोग कर रही हो। केरल में लेफ्ट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का बारी बारी से राज चलता है। 1980 के दशक से मुस्लिम उम्मीदवार चुने जाते रहे। गुरुवायुर में तीर्थयात्रा की अर्थव्यवस्था पर ध्यान है लेकिन शासन की असफलताएँ आस्था की कमी से जुड़ी हैं।
लेख गोपालकृष्णन के पोस्टर, भगवा कपड़ों को उछालता है लेकिन मुस्लिम उम्मीदवारों के हरे झंडे और इस्लामी नारों को सेकुलर मान लेता है। यह दोहरा मापदंड हिंदुओं को शर्मिंदा करने के लिए है। सोशल मीडिया पर अच्छी टिप्पणियों को भी दक्षिणपंथी कहकर नजरअंदाज कर देता है। हिंदू अपना मंदिर शहर में अपना विधायक माँगे तो यह नई आक्रामक शैली। लेकिन केरल की हकीकत देखो- मंदिरों पर हमले, हिंदू त्योहारों में दखल, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण। यही मानसिक दबाव है कि हिंदू खुद को दोषी महसूस करें।
यह नई बात नहीं। न्यूज मिनट ने कर्नाटक के धर्मस्थला मामले में भी ठीक ऐसी ही भ्रामक खबरें दी थीं। 2025 में न्यूज मिनट ने श्री क्षेत्र धर्मस्थला मंजुनाथ स्वामी मंदिर पर दो दर्जन से ज्यादा खबरें छापीं। एक ‘मास्क्ड म’" (पूर्व सफाई कर्मचारी) के दावों पर, जिसमें दावा किया गया था कि सैकड़ों हत्याएँ, बलात्कार, सामूहिक कब्र, मंदिर प्रशासन (वीरेंद्र हेगड़े, भाजपा राज्यसभा सांसद) ने छुपाया।
उस समय न्यूज मिनट की रिपोर्ट्स की हेडलाइन्स थी- ‘धर्मस्थला हॉरर’, ‘सूत्र विशेष’, ‘मास बरीअल केस’। उसने इस झूठों को बीबीसी और अल जजीरा तक पहुँचाया और हिंदू मंदिर को हत्या का अड्डा दिखाया। आस्था पर सवाल उठाए। हिंदू संस्थान को बदनाम करने की पूरी कोशिश की। लाखों हिंदू भक्तों की भावना को ठेस पहुँचाई। लेकिन एसआईटी जाँच में सच्चाई सामने आ गई। हालाँकि न्यूज मिनट ने तब भी इन मामलों की सच्चाई सामने रखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
धर्मस्थल मामले की याद इसलिए दिलाई गई, क्योंकि धर्मस्थल केस में भी केरल जैसा ही तरीका था, हिंदू मंदिर को निशाना, भ्रामक दावे, देश और विदेश के मीडिया में फैलाना, फिर सच्चाई आने पर चुप्पी। गुरुवायुर में भी यही हो रहा है। गोपालकृष्णन के विकास वाले इंटरव्यू को छिपाकर सिर्फ धार्मिक मोड़ पर ध्यान दिया जा रहा है। लेख का अंत सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक संदेश का रोना रोता है। लेकिन हिंदू अगर अपना मंदिर बचाने के लिए आवाज उठाए तो उसे ये प्रोपेगेंडा दिखता है, सच्चाई नहीं।

खैर, इस रिपोर्ट पर ही नजर डालें, तो ये रिपोर्ट भले ही लक्ष्मी प्रिया ने लिखा हो, लेकिन इसका संपादन खुद न्यूज मिनट की संपादक धन्या राजेंद्रन ने किया है। धन्या राजेंद्रन एंटी हिंदू और हिट जॉब वाली पत्रकारिता के लिए बदनाम रही हैं और इसके लिए उन्हें प्रोपेगेंडा फैलाने वाले संगठनों की तरफ से सम्मानित भी किया जा चुका है।
बहरहाल, केरल में हिंदू आबादी करीब पचपन प्रतिशत है। मंदिर शहर में पचास साल का मुस्लिम विधायक पैटर्न विकास और आस्था दोनों की अनदेखी है। भाजपा अगर हिंदू प्रतिनिधित्व की बात करे तो न्यूज मिनट जैसे पोर्टल नया तरीका कहेंगे। लेकिन यह पोर्टल लेफ्ट और कॉन्ग्रेस की एजेंडा का प्रचार कर रहा है।
ऐसे में जरूरत है कि केरल के हिंदू भाई बहन इस प्रोपेगेंडा को पहचानें, क्योंकि न्यूज मिनट का यह लेख हिंदू एकता तोड़ने की साफ तौर पर साजिश है। ऐसे में आप अपना वोट, अपनी आवाज अपनी सोच के हिसाब से इस्तेमाल करें।
अंत में सवाल यही है कि क्या मीडिया का काम केवल विवाद को उभारना है या फिर हर पक्ष को संतुलित तरीके से सामने लाना? अगर किसी क्षेत्र में हिंदू समाज अपने प्रतिनिधित्व की बात करता है, तो उसे तुरंत ‘ध्रुवीकरण’ का टैग देना क्या सही पत्रकारिता है? केरल जैसे संवेदनशील और विविधतापूर्ण राज्य में इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल राजनीतिक बहस को प्रभावित करती है, बल्कि समाज में अविश्वास भी बढ़ा सकती है। इसलिए जरूरत है कि मीडिया संस्थान आत्ममंथन करें और खबरों को संतुलित, तथ्यों पर आधारित और सभी पक्षों के प्रति निष्पक्ष तरीके से पेश करें।
