मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि देशद्रोह के आरोपों की समीक्षा हमेशा वर्तमान सामाजिक ताने-बाने और माहौल को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। मद्रास उच्च न्यायालय (मद्रास हाईकोर्ट) ने हाल ही में देशद्रोह (Sedition) के एक मामले को रद्द करते हुए बेहद महत्वपूर्ण और अनोखी टिप्पणी की है।
अदालत ने कहा कि आज के सामाजिक परिवेश में तमिलनाडु को भारत से अलग करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की बात कहना देशद्रोह का अपराध नहीं माना जाएगा, बल्कि ऐसा बयान देने वाले व्यक्ति को समाज में ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं’ (Mental Health Issues) से पीड़ित माना जाएगा।
जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की एकल पीठ ने ‘कीरा बनाम राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में अगर कोई ऐसी बात कहता भी है, तो उससे आम जनता के मन में सरकार के प्रति कोई नफरत या असंतोष पैदा नहीं होगा, बल्कि लोग इसे एक फिजूल की बात मानकर नजरअंदाज कर देंगे। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या था, अदालत ने अपने फैसले में क्या-क्या महत्वपूर्ण दलीलें दीं और इस फैसले के बाद आम जनता के मन में किस तरह के सवाल उठ रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2014 का है, जब चेन्नई के आरकेवी प्रिव्यू थिएटर में एक किताब का विमोचन किया गया था। इस किताब के लेखक और संकलक ‘इलांगोवन’ नाम के व्यक्ति थे (जिनकी मामले की पेंडेंसी के दौरान ही मौत हो चुकी है)। इस किताब को प्रकाशित करने का आरोप दो प्रकाशकों कीरा उर्फ मूर्ति और थमिल बाला पर था, जो ‘कड़गम पथिपगम’ नाम का प्रकाशन गृह चलाते हैं।
अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) के अनुसार, इस किताब में साल 1967 के एक घटनाक्रम का जिक्र था। किताब में लिखा गया था कि 1967 में ‘तमिलारसन’ नाम के एक व्यक्ति ने कोयंबटूर में यह घोषणा की थी कि तमिलनाडु को भारत से अलग होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहिए। आरोप यह भी था कि किताब में देश से अलग होने (Secession) के लिए गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) जैसी हिंसक पद्धतियों को अपनाने का संदर्भ दिया गया था।
इसी को आधार बनाकर पुलिस ने प्रकाशकों के खिलाफ तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए (देशद्रोह) के तहत मामला दर्ज किया था, जो सैदापेट के 23वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित था। दोनों प्रकाशकों ने इस मुकदमे को रद्द कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट ने फैसले में क्या-क्या कहा?
जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रकाशकों के खिलाफ चल रहे देशद्रोह के मुकदमे को पूरी तरह से खारिज (Quash) कर दिया।
जस्टिस चक्रवर्ती ने मामले की गहराई से समीक्षा करते हुए प्रकाशकों के खिलाफ चल रहे इस मुकदमे को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। उन्होंने अपने फैसले में दलील दी कि देशद्रोह के आरोपों को हमेशा वर्तमान सामाजिक परिदृश्य की रोशनी में देखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि साल 1967 के दौर में जब तमिल लिबरेशन फ्रंट जैसी समूह सक्रिय थे, तब इस तरह के भाषण या प्रकाशन निश्चित रूप से भारत सरकार के खिलाफ नफरत भड़का सकते थे, लेकिन आज का भारत दिल और आत्मा से पूरी तरह एकीकृत हो चुका है।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस किताब में आज के समय में देश को तोड़ने का कोई नया आह्वान नहीं किया गया है, बल्कि यह सिर्फ दशकों पुरानी एक घटना का ऐतिहासिक रिकॉर्ड है और इतिहास में जो घटा उसे केवल दर्ज करना या लिखना अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
अदालत ने अपने फैसले में कई बेहद अहम कानूनी और सामाजिक टिप्पणियाँ कीं-
समय और सामाजिक परिवेश का महत्व: अदालत ने कहा कि देशद्रोह के आरोपों की समीक्षा हमेशा वर्तमान सामाजिक ताने-बाने और माहौल को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। जस्टिस चक्रवर्ती ने कहा, “यह सच हो सकता है कि 1967 के दौर में जब तमिलारसन ने ‘तमिल लिबरेशन फ्रंट’ का गठन किया था, तब इस तरह के भाषण या प्रकाशन से भारत सरकार के खिलाफ नफरत या अवमानना भड़क सकती थी। लेकिन आज के परिदृश्य में भारत एक राष्ट्र के रूप में दिल और आत्मा से पूरी तरह एकीकृत (Unified) है।”
नफरत नहीं, सिर्फ खीझ पैदा होगी: अदालत ने कहा, “अगर आज कोई व्यक्ति तमिलनाडु को बाँटकर एक अलग देश बनाने की बात करता है, तो निश्चित रूप से उसे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति माना जाएगा। इससे आम जनता के बीच कोई नफरत पैदा नहीं होगी, बल्कि यह बात अधिक से अधिक लोगों में थोड़ी झुंझलाहट या खीझ (Annoyance) पैदा कर सकती है।”
इतिहास को दर्ज करना अपराध नहीं: हाईकोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि विवादित किताब में आज के समय में देश को तोड़ने या अलग होने का कोई नया आह्वान नहीं किया गया है। इसमें केवल दशकों पहले (1967 में) जो कुछ घटित हुआ था, उसका एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जो कुछ इतिहास में हुआ, उसे महज दर्ज करना या लिखना, नफरत भड़काने की कोशिश के दायरे में नहीं आ सकता।”
मद्रास हाई कोर्ट के फैसले का हिस्साआम लोगों के मन में उठ सकते हैं अहम सवाल
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला जहाँ एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी और इतिहास लेखन के अधिकार को सुरक्षा देता है, वहीं दूसरी तरफ इसने आम जनता और कानूनी जानकारों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस फैसले के बाद लोगों के मन में कई तरह के सवाल और चिंताएं कौंध रही हैं:
देशद्रोह की परिभाषा और दायरा क्या है?: आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि देशद्रोह या देश को तोड़ने की बात करने की सीमा रेखा कहां तय होती है? अगर देश के किसी हिस्से को अलग राष्ट्र बनाने की माँग को सिर्फ ‘मानसिक बीमारी’ कहकर छोड़ दिया जाएगा, तो संप्रभुता (Sovereignty) की रक्षा कैसे होगी? जनता के एक वर्ग का मानना है कि अलगाववाद (Separatism) से जुड़े बयानों को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ना कानूनी रूप से इसे बेहद हल्का बना सकता है।
क्या हिंसक संदर्भों को नजरअंदाज किया जा सकता है?: मामले में सरकार की तरफ से यह दलील दी गई थी कि किताब में अलगाव के लिए ‘गुरिल्ला युद्ध’ जैसे हिंसक रास्तों का जिक्र है। जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल पुराना इतिहास होने के आधार पर देश के खिलाफ हथियार उठाने वाली विचारधारा के प्रचार को सुरक्षित माना जा सकता है? लोगों की चिंता यह है कि ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं का बार-बार महिमामंडन आज के युवाओं को गुमराह कर सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य का कानूनी इस्तेमाल: कोर्ट द्वारा ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर भी चर्चाएं तेज हैं। लोगों का सवाल है कि क्या भविष्य में देश विरोधी या भड़काऊ बयान देने वाले लोग इस अदालती टिप्पणी का हवाला देकर खुद को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर बच निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ लेंगे?
मद्रास उच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि आज का भारत आंतरिक रूप से बेहद मजबूत और एकजुट है, जिसे किसी छिटपुट अलगाववादी बयान से खतरा नहीं हो सकता। हालाँकि कानूनी सख्ती और वैचारिक स्वतंत्रता के बीच का यह संतुलन आने वाले समय में भी बहस का एक बड़ा केंद्र बना रहेगा।
