प्रोफेसर अपूर्वानंद ने द वायर में लेख लिखा, जिसमें उन्होंने तरुण हत्याकांड पर मुस्लिमों को पीड़ित बताया और हिंदुओं को अपराधी। 2002 के गोधरा कांड से लेकर 2020 के दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगे, पहलगाम का इस्लामी आतंकी हमला, उदयपुर के हिंदू दर्जी कन्हैयालाल की निर्मम हत्या और अब उत्तम नगर में मुस्लिम भीड़ द्वारा तरुण कुमार की लिंचिंग इन सभी घटनाओं में एक ही पैटर्न देखने को मिला है।
हर बार वामपंथी कट्टर गैंग ने इस्लामी हमलों को कम करके दिखाया और उसके जवाब में उठे हिंदू आक्रोश को ही बड़ा खतरा बताने की कोशिश की।
इतना ही नहीं, इस्लामियों द्वारा किए गए हिंदू-विरोधी अपराधों पर पर्दा डालने के लिए ये वामपंथी गिरोह हिंदुओं को ही बदनाम करने पर उतारू हो जाते हैं। इनकी कोशिश पूरे मामले को इस तरह घुमाने की होती है कि असली अपराधी को पीड़ित और पीड़ित को ही अपराधी साबित कर दिया जाए। इसी कड़ी में, वामपंथी पोर्टल 'द वायर' ने तरुण हत्याकांड को लेकर मुस्लिम विक्टिमहुड (पीड़ित होने का नाटक) का एक नया प्रोपेगेंडा लेख तैयार किया है, जिसका मकसद असल घटना से ध्यान भटकाना है।
वामपंथी पोर्टल 'द वायर' ने एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का शीर्षक 'दिल्ली के उत्तम नगर में नफरत आजाद है, लेकिन मुस्लिम सुरक्षा नहीं' लिखा है। प्रोफेसर अपूर्वानंद ने एक बार फिर 'मुस्लिम विक्टिमहुड' (पीड़ित होने का कार्ड) का पुराना राग अलापा है, जिसमें मुस्लिमों को पीड़ित दिखाया गया है। हैरानी की बात यह है कि यह लेख तब लिखा गया है जब हकीकत में एक हिंदू परिवार ने अपना बेटा खोया है।
पूरी घटना उत्तम नगर की है, जहाँ एक मुस्लिम महिला ने गलती से होली का रंग लग जाने को बर्दाश्त नहीं किया और भीड़ को उकसा दिया। इस मुस्लिम भीड़ ने तरुण कुमार की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी। इसके बावजूद, अपूर्वानंद जैसे बुद्धिजीवी इस क्रूर हत्या पर पर्दा डालकर उलटा हिंदुओं को ही दोषी ठहराने और मुस्लिमों को असुरक्षित दिखाने का प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं। यह पीड़ित और अपराधी के बीच के अंतर को जानबूझकर मिटाने की एक सोची-समझी कोशिश है।

वामपंथी न्यूज पोर्टल 'द वायर' ने 18 मार्च 2026 को छपे एक लेख में हिंदू समाज के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। अपूर्वानंद ने अपने लेख में दावा किया कि प्रशासन बस इसलिए तारीफ के काबिल है क्योंकि उसने उस 'हिंदू भीड़' को रोक कर रखा है, जो मुसलमानों का नरसंहार (massacre) करना चाहती है।
इसका जवाब देते हुए कट्टरपंथियों का पक्ष लेने वाले अपूर्वानंद कहते हैं कि हिंदू जो उग्र नारे लगा रहे हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं, उसे प्रशासन सिर्फ इसलिए बर्दाश्त कर रहा है क्योंकि एक हिंदू की मौत हुई है। अपूर्वानंद का तर्क है कि प्रशासन यह मानकर चल रहा है कि 'हिंदू की मौत पर दूसरे हिंदुओं का खून तो खौलेगा ही।'
अपूर्वानंद ने प्रदर्शनकारियों की उस कथित माँग (15 मिनट के लिए पुलिस हटने वाली बात) को भी उछाला, ताकि वे पूरी दुनिया को यह दिखा सकें कि हिंदू समाज मुस्लिमों के खून का प्यासा है। अपूर्वानंद ने एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर की गई हत्या (लिंचिंग) जैसी बड़ी और खौफनाक घटना को एक 'छोटी सी बात' बताने की कोशिश की है, ताकि दोषियों का बचाव किया जा सके और उल्टा पीड़ितों को ही हिंसक साबित किया जा सके।
'सर तन से जुदा' पर चुप्पी, हिंदू आक्रोश पर 'नरसंहार' का शोर: 'द वायर' का दोहरा चेहरा
'द वायर' के लेखक अपूर्वानंद की बातों से ऐसा लगता है जैसे वे चाहते थे कि हिंदू अपने बेटे (तरुण कुमार खटीक) की मौत के बाद भी चुपचाप घरों में बैठे रहें। उनके हिसाब से, हत्यारों के खिलाफ गुस्सा दिखाना और इंसाफ माँगना देश के 'भाईचारे' और 'गंगा-जमुनी तहजीब' के लिए खतरा है।
हैरानी की बात ये है कि एक तरफ अपूर्वानंद दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाते हैं कि वह हिंदू प्रदर्शनकारियों (जिन्हें वे 'हिंसक भीड़' कह रहे हैं) के साथ 'मिलीभगत' कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, वे खुद यह भी स्वीकार करते हैं कि पुलिस ने 'हिंदू भीड़' की उस कथित माँग को नहीं माना जिसमें 15 मिनट के लिए पीछे हटने और उन्हें खुली छूट देने की बात कही गई थी। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि अपूर्वानंद का मकसद सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करना और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाना है।
इस पूरे मामले में हिंदू प्रदर्शनकारियों और मुस्लिम भीड़ के बीच का फर्क साफ दिखता है। जहाँ एक तरफ हिंदू समाज तरुण कुमार के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए प्रशासन पर दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी भीड़ अक्सर कानून को हाथ में लेकर पत्थरबाजी और 'सर तन से जुदा' जैसे हिंसक रास्तों का सहारा लेती है।
साल 2022 का नूपुर शर्मा मामला इसका सबसे बड़ा सबूत है। पूर्व भाजपा नेता नूपुर शर्मा ने सिर्फ धार्मिक ग्रंथों का जिक्र किया था, लेकिन इसके बदले में कट्टरपंथियों ने उनके सिर कलम करने के नारे लगाए और देश के कई हिस्सों में दंगे भड़काए। इसी उन्माद के चलते उदयपुर में कन्हैयालाल और महाराष्ट्र में उमेश कोल्हे की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इसके बावजूद, न्यायपालिका से लेकर वामपंथी बुद्धिजीवियों तक, सभी ने नूपुर शर्मा को ही दोषी ठहराया। यह संदेश देने की कोशिश की गई कि हिंदुओं का अपनी बात कहना बड़ी समस्या है, जबकि मुस्लिम भीड़ का दंगे करना और गला काटना जैसे जायज हो।
इतिहास गवाह है कि कई मौकों पर मुस्लिम राजनेताओं, खासकर AIMIM से जुड़े लोगों ने हिंदुओं को खुलेआम धमकी दी है। उन्होंने बार-बार कहा है कि 'अगर 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दी जाए, तो वे हिंदुओं को अपनी ताकत दिखा देंगे।' हैरान करने वाली बात यह है कि तब अपूर्वानंद जैसे वामपंथियों को कोई दिक्कत नहीं हुई। उलटा, वे इसके पीछे यह तर्क देने लगते हैं कि बीजेपी-RSS ने मुस्लिम 'अल्पसंख्यकों' को इतना डरा दिया है कि उनके पास आक्रामक होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
अगर वर्तमान मामले की बात करें, तो आरोपित उमरदीन (49) और उसके बेटे मुजफ्फर (25) ने महज एक छोटी सी बहस के बाद तरुण कुमार की पीट-पीटकर हत्या कर दी। यह विवाद सिर्फ इसलिए शुरू हुआ था क्योंकि एक बच्चे ने पानी का गुब्बारा फेंका था, जिसका रंग गलती से आरोपित समुदाय की एक महिला पर गिर गया था। इसके बावजूद, 'द वायर' के पूरे लेख में तरुण कुमार की इस क्रूर लिंचिंग को अंजाम देने वाले असली अपराधियों के नाम तक नहीं लिखे गए हैं।
1984 के दंगों को 'हिंदू बनाम सिख' रंग देने की कोशिश: अपूर्वानंद का नया एजेंडा
हैरानी की बात यह है कि 'द वायर' के लेखक अपूर्वानंद ने उत्तम नगर में एक हिंदू युवक की बेरहमी से हुई हत्या (लिंचिंग) के सांप्रदायिक पहलू को जानबूझकर दबा दिया है। इसके बजाय, वे 1984 के सिख विरोधी दंगों का हवाला देकर एक झूठा नैरेटिव गढ़ रहे हैं कि 'हिंदू भीड़ ने सिखों पर हमला किया था', जबकि हकीकत में वह एक राजनीतिक हिंसा थी। इतना ही नहीं, अपूर्वानंद ने हिंदू समाज के साथ-साथ पुलिस और सेना तक को मुसलमानों के खिलाफ 'हिंसक हिंदू भीड़ का मददगार' बता दिया है।
अपूर्वानंद लिखते हैं, "1984 में न केवल दिल्ली, बल्कि भारत के अन्य हिस्सों में भी पुलिस ने इंदिरा गाँधी की हत्या से नाराज हिंदुओं को सिखों को लूटने और मारने की पूरी छूट दी। कई मामलों में तो पुलिस ने खुद लुटेरों और हत्यारों की मदद की।" वे आगे हाशिमपुरा कांड का जिक्र करते हुए आरोप लगाते हैं कि सेना और पुलिस ने न केवल भीड़ को अनुमति दी, बल्कि खुद भी मुसलमानों की हत्या की। उनके मुताबिक, आजादी के बाद से मुसलमानों का यह अनुभव रहा है कि पुलिस अक्सर उन पर होने वाली हिंसा में 'हिंदू भीड़' के साथ मिल जाती है।
'द वायर' में 1984 दंगों का जिक्रतरुण हत्याकांड के मामले में यह साफ है कि जिस मुस्लिम महिला पर गलती से होली का रंग गिरा था, उसने पड़ोस के हिंदू बच्चों की इस मासूम सी भूल को बर्दाश्त नहीं किया। इसके बजाय, उसने एक हिंसक भीड़ को इकट्ठा कर तरुण कुमार खटीक जैसे निर्दोष हिंदू युवक पर हमला करवा दिया।
इसके विपरीत, 1984 के सिख विरोधी दंगों में कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं था। वे हिंदू नहीं थे जो सड़कों पर उतरकर सिखों को निशाना बना रहे थे। हकीकत में, वे कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता थे, जिन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या का बदला लेने के लिए पार्टी नेतृत्व ने दंगों के लिए उकसाया था। यह सिखों के खिलाफ हिंदुओं का कोई स्वाभाविक गुस्सा नहीं था, बल्कि कॉन्ग्रेस द्वारा प्रायोजित एक सुनियोजित नरसंहार था।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने सिखों पर हमला करने और लूटपाट मचाने के लिए मिट्टी का तेल और अन्य हथियार उपलब्ध कराए थे। यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भी इस नरसंहार को यह कहते हुए जायज ठहराया था कि 'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती ही है।' इस बयान ने साफ कर दिया था कि वे सिख विरोधी दंगों को कितनी मामूली बात समझते थे।
2004 की नानावती आयोग की रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि 1984 के दंगों में कॉन्ग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ही भीड़ को उकसाया और मदद की थी। इसमें बीजेपी, RSS या आम हिंदुओं की कोई भूमिका नहीं थी। इसके उलट, आम हिंदुओं और RSS के स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सिखों को कॉन्ग्रेस के हमलावरों से बचाया और उन्हें पनाह दी थी।
इसके बावजूद, बीजेपी के धुर विरोधी अपूर्वानंद जैसे लेखकों का यह दावा करना बेहद दुस्साहस भरा है कि हिंदू भीड़ और पुलिस हमेशा से मुसलमानों को निशाना बनाने में शामिल रहे हैं। इसके लिए वे 'हाशिमपुरा कांड' का जिक्र करते हैं, जबकि हकीकत में वह हिंदू-पुलिस की मिलीभगत नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस का एक 'सेक्युलर' अपराध था।
22 मई 1987 को उत्तर प्रदेश की पीएसी (PAC) ने हाशिमपुरा इलाके से करीब 50 मुस्लिम युवकों को ट्रक में भरकर ऊपरी गंगा नहर के पास ले जाकर गोलियों से भून दिया था और उनके शव पानी में फेंक दिए थे। इस क्रूरता में 42 लोगों की जान गई थी। यह जघन्य अपराध किसी हिंदू भीड़ ने नहीं, बल्कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के इशारे पर पुलिस अधिकारियों ने अंजाम दिया था।
अपूर्वानंद जैसे लेखकों द्वारा पुराने नरसंहारों को सांप्रदायिक रंग देना और कॉन्ग्रेस के पापों का बोझ हिंदुओं के सिर मढ़ना सिर्फ एक दिखावा है। यह उनकी उस छटपटाहट को दिखाता है जहाँ वे पुरानी घटनाओं के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं ताकि आज के समय में हो रहे कट्टरपंथी अपराधों पर पर्दा डाला जा सके।
हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथियों का पक्ष लेने वाले अपूर्वानंद उन घटनाओं का जिक्र कभी नहीं करते जहाँ पुलिस ने निहत्थे हिंदुओं पर गोलियाँ चलाईं। उन्होंने 1966 के उस साधु नरसंहार का कोई उल्लेख नहीं किया जब इंदिरा गाँधी के आदेश पर दिल्ली पुलिस ने लाखों गौभक्त साधुओं पर हमला किया था। इसी तरह, वे 1990 में मुलायम सिंह यादव के आदेश पर अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग पर भी चुप्पी साधे रहते हैं।
2020 के दिल्ली दंगों का हवाला देते हुए अपूर्वानंद ने दावा किया कि हिंदू भीड़ ने 'दिल्ली पुलिस लाठी चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं' जैसे नारे लगाए, जिससे पुलिस ने हिंदुओं के साथ मिलकर मुस्लिमों को पीटा। वे सवाल उठाते हैं कि 'आखिर वो कौन सा पल होता है जब पुलिस से डरने वाली जनता को लगने लगता है कि पुलिस उनकी अपनी है?' उनके इस सवाल का असली मकसद पुलिस और हिंदू समाज को एक हिंसक गठबंधन के रूप में दिखाकर बदनाम करना है।

अपूर्वानंद के सवालों का सीधा जवाब यह है कि पुलिस से मदद हमेशा पीड़ित माँगते हैं, अपराधी नहीं। जो मुस्लिम भीड़ हिंदुओं के घरों, कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों पर पत्थर बरसा रही थी, वह भला यह क्यों कहेगी कि 'दिल्ली पुलिस लाठी चलाओ'? वे अच्छी तरह जानते हैं कि लाठियाँ किन पर चलनी चाहिए और किन पर नहीं।
लेकिन तर्क और सामान्य ज्ञान को ताक पर रखकर भारतीय पुलिस को ही 'सांप्रदायिक' घोषित कर देना इन वामपंथी-कट्टरपंथी विचारकों के लिए आम बात है। वे भूल जाते हैं कि भारतीय पुलिस में हर धर्म के जवान शामिल होते हैं। उनका एकमात्र मकसद मुस्लिमों को हमेशा 'पीड़ित' (Victim) दिखाकर अपना एजेंडा चलाना है।
यही नहीं, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कैसे पूरा 'लिबरल-सेक्युलर' गिरोह दिल्ली की सड़कों पर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा करने वाले कट्टरपंथियों को सुरक्षा दे रहा था। दिसंबर 2019 में जामिया दंगों के दौरान, दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जैसे नेताओं ने आरोप लगाया था कि बसों में आग प्रदर्शनकारियों ने नहीं, बल्कि बीजेपी के इशारे पर खुद दिल्ली पुलिस ने लगाई थी। यह सब केवल नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हो रहे हिंसक प्रदर्शनों का बचाव करने के लिए किया गया था।
'द वायर' के लेख में इस बात पर भी दुख जताया गया है कि भारतीय मुसलमानों को ईरान पर होने वाले हमलों के खिलाफ प्रदर्शन तक नहीं करने दिया जाता और उन्हें ईरान जाने की सलाह दी जाती है। लेखक अपूर्वानंद ने चतुराई से इस बात को छिपा लिया कि इन प्रदर्शनों में खुद प्रदर्शनकारी ही ईरान के समर्थन में युद्ध के मैदान में उतरने और अपनी जान देने की बातें कर रहे थे। इंटरनेट पर ऐसे वीडियो भी सामने आए जिनमें बुर्का पहनी महिलाएँ अपनी ही देश की सरकार पर ईरान को 'धोखा' देने का आरोप लगा रही थीं।
हैरानी की बात यह है कि 'द वायर' के लिए अपने देश से ऊपर विदेशी धार्मिक नेताओं के प्रति वफादारी दिखाना कोई समस्या नहीं है, लेकिन जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, वे उनकी नजर में गलत हैं। यहाँ भी वही पुराना तरीका अपनाया गया है- कट्टरपंथियों की उग्र हरकतों पर चुप्पी साध ली जाती है, लेकिन जब हिंदू उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, तो उदारवादी गिरोह उसे एक बड़ा मुद्दा बना देता है।
कसाब का मोह और दिल्ली दंगा: प्रोफेसर अपूर्वानंद के जिहादी कनेक्शन पर सवाल
मुसलमानों को 'पीड़ित' दिखाने वाला ऐसा खुला प्रोपेगेंडा अपूर्वानंद जैसे व्यक्ति की ओर से आना कोई हैरानी की बात नहीं है। यह वही शख्स है जिसका इतिहास 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब के प्रति सहानुभूति जताने का रहा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का यह प्रोफेसर, जो आज पुलिस पर 'हिंदू भीड़' का साथ देने का आरोप लगा रहा है, वह खुद 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों का आरोपित है।
दिल्ली दंगों की मुख्य आरोपितों में से एक, गुलफिशा (उर्फ गुल), जिसे UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया है, उसने दिल्ली पुलिस के सामने यह कबूल किया था कि प्रोफेसर अपूर्वानंद ही दिल्ली में दंगे भड़काने की साजिश के असली साजिशकर्ता थे। उनके मार्गदर्शन में ही दंगों की पूरी योजना तैयार की गई थी।
आरोपित गुलफिशा ने खुलासा किया था कि हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों से पहले प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ही औरतों की एक 'बुर्का-धारी टीम' तैयार की थी। गुलफिशा के मुताबिक, अपूर्वानंद ने दंगों से काफी पहले ही उन्हें आगाह कर दिया था कि हिंसा होने वाली है। इतना ही नहीं, जब दिल्ली दंगों की आग में झुलस रही थी, तब अपूर्वानंद ने इस खूनी खेल में शामिल छात्रों की जमकर तारीफ भी की थी।
गुलफिशा ने अपने बयान में यह भी बताया कि अपूर्वानंद ने उन्हें निर्देश दिया था कि 'जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी' (JCC) दिल्ली में 20-25 जगहों पर आंदोलन खड़ा करेगी। इस आंदोलन का असली मकसद भारत सरकार को दुनिया के सामने एक 'अत्याचारी शासन' के रूप में पेश करना था, जो मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है। गुलफिशा के शब्दों में, अपूर्वानंद का कहना था कि 'यह तभी संभव होगा, जब इन प्रदर्शनों की आड़ में दंगे भड़काए जाएँगे।'
तरुण की लिंचिंग को 'दो परिवारों का झगड़ा' बताकर झाड़ा पल्ला: अपूर्वानंद का सफेद झूठ
जब बात मुसलमानों को 'पीड़ित' (Victim) दिखाने की आती है, तो ये वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोग झूठ का जाल बुनने से पीछे नहीं हटते, भले ही असली शिकार हिंदू ही क्यों न हों। 'द वायर' और अपूर्वानंद ने तरुण की मॉब लिंचिंग के मामले में भी यही खेल खेला है। उन्होंने एक हिंदू युवक की बेरहमी से हुई हत्या को महज़ दो पड़ोसी परिवारों के बीच का 'मामूली झगड़ा' बताकर हल्का कर दिया।
अपूर्वानंद लिखते हैं, "भारत के बाहर बैठे दोस्त यह सब सुनकर दंग रह जाते हैं। वे देखते हैं कि दो परिवारों के बीच झगड़ा हुआ, लड़ाई हुई। एक परिवार मुस्लिम था और दूसरा हिंदू। दोनों तरफ के लोग घायल हुए, लेकिन हिंदू परिवार के एक शख्स की मौत हो गई। इसके बाद मुस्लिम परिवार के लगभग सभी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया।"
वे आगे तर्क देते हैं कि अब इस पर जाँच होगी, मुकदमा चलेगा और मुस्लिम परिवार का भी अपना पक्ष होगा क्योंकि वे भी घायल हुए थे। उनके अनुसार, दुनिया भर में चीजें इसी तरह चलती हैं। इस तरह के तर्कों के जरिए अपूर्वानंद ने एक सोची-समझी हत्या को एक साधारण विवाद का रूप देने की कोशिश की है, ताकि आरोपितों का बचाव किया जा सके।
अपूर्वानंद ने यह दावा भी किया है कि तरुण की हत्या पर स्थानीय हिंदुओं में कोई गुस्सा नहीं है और केवल 'बाहरी लोग' आकर माहौल खराब कर रहे हैं। हालाँकि, हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जब ऑपइंडिया (OpIndia) ने उत्तम नगर के स्थानीय हिंदुओं से बात की, तो उन्होंने इस मॉब लिंचिंग को लेकर अपना भारी आक्रोश व्यक्त किया। हिंदू पड़ोसियों ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि तरुण पर हुआ यह हमला कोई अचानक हुआ झगड़ा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश (Pre-planned) थी।
'द वायर' के संबंधित लेख से लिया गया अंशइससे पहले कि हम एक सोची-समझी 'मॉब लिंचिंग' को 'स्थानीय झगड़ा' बताकर उस पर पर्दा डालने वाली इस कोशिश पर कुछ कहें, तरुण कुमार हत्याकांड के असली तथ्यों को समझ लेना जरूरी है।
बुधवार, 4 मार्च को दिल्ली के उत्तम नगर में होली के जश्न के दौरान, 26 साल के तरुण कुमार की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। यह पूरी हिंसा सिर्फ इसलिए शुरू हुई क्योंकि होली के गुब्बारे का रंगीन पानी गलती से किसी पर गिर गया था। यह घटना दक्षिण-पश्चिम दिल्ली की जेजे कॉलोनी इलाके में त्योहार के दिन हुई।
पुलिस और परिवार के बयानों के अनुसार, तरुण के परिवार की एक 11 साल की बच्ची अपनी छत पर होली खेल रही थी। उसने नीचे खड़े अपने पिता पर पानी का गुब्बारा फेंका, जो गलती से सड़क पर गिर गया और उसका पानी पड़ोस की एक मुस्लिम परिवार की महिला पर जा गिरा। बस इसी बात पर दोनों परिवारों के बीच बहस शुरू हो गई, जिसने आगे चलकर एक खूनी शक्ल अख्तियार कर ली।
शुरुआत में जब हिंदू परिवार ने माफी माँग ली थी, तो मामला सुलझता हुआ दिख रहा था। लेकिन उसी शाम तनाव फिर से बढ़ गया। जब तरुण होली खेलकर अपने दोस्त के साथ बाइक से घर लौट रहा था, तभी 40-50 इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने उसे घेर लिया। उसे लोहे की रॉड, ईंटों और पत्थरों से इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी जान चली गई।
अपूर्वानंद ने बड़ी चतुराई से अपने 'विदेशी दोस्तों' का सहारा लेकर तरुण की इस सांप्रदायिक हत्या को कम करके आँकने की कोशिश की है। वे 'मुसलमान भी पीड़ित हैं' वाला नैरेटिव चला रहे हैं, जो पूरी तरह से बेईमानी है। सच्चाई यह है कि हिंदू परिवार ने एक उन्मादी भीड़ के हाथों अपना बेटा खो दिया है, जबकि आरोपित मुस्लिम परिवार को सिर्फ गिरफ्तारी और अपने अवैध निर्माण पर बुलडोजर कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
हद तो तब हो गई जब अपूर्वानंद ने अपराधी और पीड़ित की भूमिका ही पलट दी। उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि तरुण की हत्या के बाद उपजे हिंदू आक्रोश के डर से मुस्लिम परिवार ईद मनाने के लिए इलाका छोड़कर भाग रहे हैं। वे लिखते हैं, "किसी ने उन्हें नहीं रोका, किसी को यह जरूरी भी नहीं लगा। पुलिस कह सकती है कि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है, वे अपनी मर्जी से जा रहे हैं।" इस तरह उन्होंने हत्यारों के डर को ही 'पीड़ा' बनाकर पेश करने की कोशिश की है।
आखिर अपूर्वानंद स्थानीय हिंदुओं से क्या उम्मीद करते हैं? क्या वे चाहते हैं कि हिंदू लोग उन मुस्लिम घरों में जाकर उनका हाल-चाल पूछें? क्या वे एक निर्दोष हिंदू युवक की हत्या पर अपने गुस्से के लिए माफ़ी माँगें? या फिर वे उन आरोपितों के लिए चंदा इकट्ठा करें ताकि वे मृतक के परिवार के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ सकें? क्या वे हत्यारों के बचाव में 'ह्यूमन चेन' (मानव श्रृंखला) बनाएँ?
लेख में आगे बढ़ते हुए 'द वायर' कुछ ऐसे सवाल उठाता है, जिनका जवाब उन्हीं लोगों ने बहुत हिंसक तरीके से दिया है जिन्हें यह लेख 'पीड़ित' बताकर बचाने की कोशिश कर रहा है।
'द वायर' के लेख में पूछा गया है, "जब कोई मुस्लिम मारा जाता है, तो क्या पड़ोसी मुस्लिम हिंदू घरों को गिराने की माँग करते हैं? क्या प्रशासन आरोपित हिंदुओं के घर और दुकानें ढहा देता है? क्या मुस्लिम संगठन हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं? क्या मीडिया हिंदुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाता है? हमें इसका जवाब पता है।"
लेखक यहाँ यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि केवल हिंदुओं के मामलों में ही ऐसी सख्त कार्रवाई और आक्रोश देखने को मिलता है, जबकि वे उन अनगिनत दंगों और हिंसक प्रतिक्रियाओं को भूल जाते हैं जो कट्टरपंथी भीड़ द्वारा छोटी-छोटी बातों पर अंजाम दी जाती हैं।
उदयपुर में कन्हैयालाल और अमरावती में उमेश कोल्हे की बेरहमी से हत्या से लेकर, 2020 के दिल्ली दंगों में हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की गोली मारकर हत्या और आईबी ऑफिसर अंकित शर्मा की निर्मम हत्या तक, कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए हिंदुओं की सूची बहुत लंबी है। चाहे किशन भरवाड़ हों, कर्नाटक के प्रवीण नेट्टारू, बहराइच के राम गोपाल मिश्रा हों या अब उत्तम नगर के तरुण कुमार, इन सभी को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू थे।
कट्टरपंथी अक्सर मामूली बहानों पर हिंदुओं पर हमला करते हैं। वे पहले से ही छतों पर पत्थर और पेट्रोल बम जमा करके रखते हैं ताकि जब पुलिस आरोपितों को पकड़ने आए, तो उन पर भी हमला किया जा सके। हिंदुओं के विपरीत, वे प्रशासन द्वारा कार्रवाई किए जाने का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि खुद ही कानून हाथ में लेकर तबाही मचाना शुरू कर देते हैं।
इतना ही नहीं, कट्टरपंथी संगठनों और राजनेताओं ने लगातार मुस्लिमों को दंगे भड़काने के लिए उकसाया है। पश्चिम बंगाल में वक्फ विरोधी प्रदर्शन के दौरान हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा इसका जीता-जागता उदाहरण है कि उन्हें हमला करने के लिए किसी उकसावे की भी जरूरत नहीं होती। हमने देखा कि कैसे अमानतुल्लाह खान ने ताहिर हुसैन जैसे दंगों के आरोपितों का बचाव किया, जिसने खुद स्वीकार किया था कि उसका मकसद 'हिंदुओं को सबक सिखाना' था। असल में, खुद अमानतुल्लाह खान उस हिंसक भीड़ का हिस्सा थे। आज एक पूरा वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम मौजूद है जो इन दंगाइयों को न केवल बचाता है और उनका महिमामंडन करता है, बल्कि उन्हें कानूनी सहायता भी प्रदान करता है।
अपूर्वानंद या तो किसी गुफा में रह रहे हैं या उन्होंने जानबूझकर हिंदुओं के प्रति कट्टरपंथियों की बढ़ती असहिष्णुता से अपनी आँखें मूँद ली हैं, जिसके कारण उन्हें साफ दिख रही हकीकत भी नजर नहीं आती। हालाँकि, 'द वायर' जैसे पोर्टल से मुस्लिमों के अपराधों का दोष हिंदुओं के सिर मढ़ने की उम्मीद पहले से ही थी। इस वामपंथी पत्रिका का इतिहास रहा है कि यह हिंदू-विरोधी नैरेटिव गढ़ती है और उमर खालिद व शरजील इमाम जैसे दंगाई और राष्ट्रविरोधी तत्वों को मंच प्रदान करती है।
अपने इस प्रोपेगेंडा लेख के अंत में, अपूर्वानंद जोर देते हैं कि 'मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाना एक अपराध है', लेकिन उनके लिए हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलना कोई अपराध नहीं है। 'द वायर' के लिए कट्टरपंथियों की हिंसा पर हिंदुओं का स्वाभाविक गुस्सा तो 'जुर्म' है, लेकिन धार्मिक कट्टरता के कारण मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की हत्या करना सिर्फ एक 'मामूली झगड़ा' या 'स्थानीय विवाद' है। वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम का तरीका हमेशा से यही रहा है, अपराधी को पीड़ित बनाना और असली पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करना।
गोधरा कांड से तरुण हत्याकांड तक: मुस्लिमों के अपराध को हिंदुओं के सिर मढ़ने का वामपंथी खेल
पिछले साल 2025 अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के बाद, जहाँ जिहादियों ने चुन-चुनकर हिंदुओं को निशाना बनाया, उनसे कलमा पढ़वाया और उनकी धार्मिक पहचान पक्की करने के लिए उनकी शारीरिक जाँच (खतना) तक की, तब मासूम हिंदुओं की इस हत्या पर देश भर में स्वाभाविक गुस्सा था। इस गुस्से की एक बड़ी वजह यह भी थी कि मुस्लिम समुदाय इस हमले के धार्मिक पहलू को नकार रहा था और इसे इस्लाम से अलग बताने की कोशिश कर रहा था, जबकि यह पूरी तरह से मजहबी नफरत से प्रेरित हमला था। उस समय भी पूरे वामपंथी-लिबरल गिरोह ने 'इस्लामोफोबिया' का हौआ खड़ा कर दिया, जो हिंदुओं के नरसंहार से भी बड़ा मुद्दा बना दिया गया।
ठीक यही तरीका नवंबर 2025 में लाल किला ब्लास्ट के बाद भी देखा गया। जब एक उच्च शिक्षित मुस्लिम डॉक्टर, उमर उन नबी ने 'काफिरों' को मारने के लिए फिदायीन हमला किया, तो लोगों का मुस्लिमों पर भरोसा करना, उन्हें फ्लैट किराए पर देना या मुस्लिम डॉक्टरों के पास जाना कम हो गया। किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए यह डर और सावधानी स्वाभाविक थी, क्योंकि जब डॉक्टर जैसा पढ़ा-लिखा वर्ग भी खुद को बम से उड़ाने वाला जिहादी बन जाए और अपनी शिक्षा का इस्तेमाल 'बायोटैरर' (जैविक हमले) की साजिश रचने के लिए करने लगे, तो समाज में असुरक्षा का भाव आना लाजिमी है।
यह कोई नया तरीका नहीं है, बल्कि 2002 के गोधरा कांड से ही चला आ रहा है। एक पूर्व-नियोजित साजिश के तहत मुस्लिम भीड़ द्वारा अयोध्या से लौट रहे 59 हिंदुओं को ट्रेन में जिंदा जला दिया गया था। लेकिन वामपंथी इकोसिस्टम ने इस मुख्य घटना को सार्वजनिक यादों से मिटा दिया और केवल उसके बाद हुई प्रतिक्रियात्मक हिंसा को ही उछाला, ताकि यह नैरेटिव बनाया जा सके कि हिंदुओं ने अचानक 'निर्दोष' मुस्लिमों पर हमला कर दिया था।
बीते वर्षों में, वामपंथी-कट्टरपंथी गिरोह ने सहानुभूति बटोरने और हिंदुओं को दोषी ठहराने वाले अनगिनत लेख लिखे हैं। वे इस बात पर रोते हैं कि मुस्लिम भीड़ की हिंसा, आतंकी हमलों और हिंदू मान्यताओं के अपमान के जवाब में हिंदू 'असहिष्णु' और हिंसक क्यों हो रहे हैं।
इसका एक उदाहरण देखिए, जब कुछ मुस्लिम पुरुषों ने पवित्र गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी की, मांसाहारी बिरयानी खाई और चबाई हुई हड्डियाँ नदी में फेंकी, तो कॉन्ग्रेस और उदारवादी गिरोह ने यह कुतर्क देते हुए उनका बचाव किया कि 'हिंदू भी तो गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करते हैं।' संक्षेप में, कट्टरपंथी चाहे जिहादी हमले करें, हिंदुओं की मॉब लिंचिंग करें या जानबूझकर उनकी आस्था का अपमान करें, हिंदुओं को कभी विरोध नहीं करना चाहिए। उन्हें बस कट्टरपंथियों की इस 'असहिष्णुता' को सहते रहना चाहिए।
अपूर्वानंद का 'द वायर' में लिखा यह लेख उसी पुराने वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है, जिसमें हिंदू-विरोधी हिंसा के तुरंत बाद मुस्लिम समुदाय को 'पीड़ित' (Victim) दिखाकर असली अपराध पर पर्दा डाल दिया जाता है।
कट्टरपंथियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले अपूर्वानंद ने अपने लेख का अंत एक सवाल से किया है, "ईद में अब बस कुछ ही दिन बचे हैं। क्या किसी भी समाज के लिए यह गौरव की बात है कि उसका पड़ोसी किसी त्योहार का इंतज़ार खुशी से नहीं बल्कि हिंसा के डर से करे? उत्तम नगर, दिल्ली और भारत के हिंदू इस बारे में क्या सोचते हैं?"
बेहतर होता यदि 'द वायर' और अपूर्वानंद यह सवाल मुसलमानों से पूछते कि क्या किसी समाज के लिए यह गौरव की बात है कि होली जैसे खुशी के त्योहार पर उनके पड़ोसी ने एक उन्मादी मुस्लिम भीड़ के हमले में अपना जवान बेटा खो दिया?
हमें अच्छी तरह पता है कि उत्तम नगर, दिल्ली और भारत के मुसलमान क्या सोचते हैं। लेकिन अगर वामपंथी गिरोह यह सवाल सीधे उन्हीं लोगों से पूछ ले जिनका वे अपनी पूरी ताकत लगाकर बचाव करते हैं, तो 'हिंदू-मुस्लिम एकता', 'शांति', 'धर्मनिरपेक्षता' और 'आइडिया ऑफ इंडिया' जैसे उनके सारे भ्रम एक झटके में चकनाचूर हो जाएँगे।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी हैं। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
