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20 जुलाई से संसद के मानसून सत्र में पीएम और सीएम पद से हटाने वाला विधेयक छा सकता है!

20 जुलाई से संसद के मानसून सत्र में पीएम और सीएम पद से हटाने वाला विधेयक छा सकता है!

ई दिल्ली. केंद्र सरकार ने संसद के मानसून सत्र की तारीखों का ऐलान कर दिया है. यह सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा. सरकार की ओर से इसे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा और महत्वपूर्ण विधायी कार्यों के लिए अहम सत्र बताया जा रहा है.

हालांकि राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस बार का मानसून सत्र कई संवेदनशील मुद्दों को लेकर काफी हंगामेदार रह सकता है. विशेष रूप से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों तथा केंद्रीय और राज्य मंत्रियों को गंभीर मामलों में लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहने की स्थिति में स्वत: पद से हटाने से जुड़े प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन विधेयक पर तीखी बहस होने के आसार हैं. इसके अलावा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ऑपरेशन सिंदूर को लेकर संसद में दिए गए बयान पर विशेषाधिकार हनन का विवाद भी विपक्ष के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहेगा.

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 20 जुलाई से संसद के दोनों सदनों का सत्र बुलाने की मंजूरी दे दी है. सरकार का कहना है कि इस सत्र में राष्ट्रीय महत्व के कई विषयों पर सार्थक चर्चा, बहस और निर्णय किए जाएंगे. वहीं विपक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि वह सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी कर रहा है.

सत्र का सबसे चर्चित विषय संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 रहने की संभावना है. इस विधेयक की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की बैठक 17 जुलाई को प्रस्तावित है, जिसमें रिपोर्ट को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है. राजनीतिक सूत्रों के अनुसार समिति इस विधेयक के उस विवादित प्रावधान को हटाने की सिफारिश नहीं करेगी, जिसके तहत यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र अथवा राज्य सरकार के मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें स्वत: पद छोड़ना होगा. हालांकि समिति यह जरूर सुझाव दे सकती है कि इस व्यवस्था का राजनीतिक प्रतिशोध या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए दुरुपयोग न हो, इसके लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान जोड़े जाएं.

यह प्रस्ताव सामने आने के बाद से ही राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है. सरकार का तर्क है कि देश के सर्वोच्च कार्यपालिका पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों के लिए जवाबदेही और नैतिक मानकों को और अधिक मजबूत करना आवश्यक है. सरकार का मानना है कि यदि किसी गंभीर आपराधिक मामले में कोई शीर्ष पदाधिकारी लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहता है तो जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए ऐसे प्रावधान जरूरी हैं.

दूसरी ओर विपक्षी दल इस प्रस्ताव का लगातार विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है. ऐसे में केवल न्यायिक हिरासत के आधार पर किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को पद से हटाना संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा. विपक्ष का आरोप है कि यदि यह प्रावधान लागू होता है तो राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जांच एजेंसियों के माध्यम से कार्रवाई कर लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर करने का रास्ता खुल सकता है. कई संवैधानिक विशेषज्ञ भी इस प्रस्ताव को कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन पर प्रभाव डालने वाला मुद्दा मान रहे हैं.

विधेयक के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसद में आवश्यक समर्थन जुटाने की है. चूंकि यह संविधान संशोधन से जुड़ा विधेयक है, इसलिए इसे संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य होगा. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है. इसके अलावा चूंकि यह संशोधन राज्यों की कार्यपालिका से भी संबंधित है, इसलिए संसद से पारित होने के बाद कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से इसकी पुष्टि भी आवश्यक होगी. ऐसे में केवल संसद में बहुमत होना ही पर्याप्त नहीं होगा.

पिछले संसद सत्र में केंद्र सरकार आवश्यक संख्या नहीं जुटा सकी थी, जिसके कारण संवैधानिक संशोधन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाए थे. हालांकि हाल के महीनों में विभिन्न दलों के कुछ सांसदों के पाला बदलने और राज्यसभा की नई राजनीतिक स्थिति के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत मानी जा रही है. इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संविधान संशोधन के लिए अभी भी सरकार को अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी. यदि विपक्ष पूरी ताकत के साथ मतदान में शामिल होता है तो सरकार के लिए विशेष बहुमत हासिल करना आसान नहीं होगा. हालांकि मतदान के दौरान अनुपस्थिति या कुछ दलों के तटस्थ रहने की स्थिति में आवश्यक संख्या का गणित बदल सकता है.

मानसून सत्र में दूसरा बड़ा राजनीतिक मुद्दा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ऑपरेशन सिंदूर को लेकर संसद में दिए गए बयान का रहेगा. कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के अन्य दलों ने आरोप लगाया है कि रक्षा मंत्री ने लोकसभा में कहा था कि ऑपरेशन के दौरान कोई भारतीय सैनिक शहीद नहीं हुआ, जबकि बाद में सरकार की ओर से सैनिकों के हताहत होने की पुष्टि की गई. कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इसे संसद को गुमराह करने का मामला बताते हुए राजनाथ सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है. विपक्ष का कहना है कि संसद में तथ्यों के विपरीत जानकारी देना गंभीर मामला है और इसकी जांच होनी चाहिए.

वहीं सरकार और भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है. सरकार का कहना है कि रक्षा मंत्री के बयान को संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया जा रहा है. भाजपा का दावा है कि राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन के एक विशेष चरण का उल्लेख किया था और उन्होंने पूरे सैन्य अभियान के दौरान हुए सभी घटनाक्रमों से इनकार नहीं किया था. विशेषाधिकार हनन का नोटिस स्वीकार किया जाएगा या नहीं, इसका अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को करना होगा.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मानसून सत्र में सरकार एक ओर महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, सुरक्षा, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका, किसानों के मुद्दों और हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर सरकार को घेरने का प्रयास करेगा. ऐसे में संसद के दोनों सदनों में तीखी बहस और कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिल सकता है.

संसद का यह मानसून सत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें सरकार की विधायी रणनीति, विपक्ष की एकजुटता और संविधान संशोधन जैसे बड़े मुद्दों पर राजनीतिक सहमति बनाने की क्षमता की भी परीक्षा होगी. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों से जुड़े प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन विधेयक पर होने वाली चर्चा न केवल संसद के भीतर बल्कि देशभर में भी व्यापक राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बनने की संभावना है. इसी कारण 20 जुलाई से शुरू होने वाला यह सत्र देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण संसदीय सत्रों में से एक माना जा रहा है.

Source : palpalindia

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