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बच्चों की पैरासिटामोल दवा का सैंपल फेल, एक साल बाद आई रिपोर्ट ने खोली सिस्टम की पोल

बच्चों की पैरासिटामोल दवा का सैंपल फेल, एक साल बाद आई रिपोर्ट ने खोली सिस्टम की पोल

बलपुर. सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की एक ऐसी लापरवाही सामने आई है जिसने न केवल मासूम बच्चों की जान को जोखिम में डाला है बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। शहर के सरकारी अस्पतालों, उप-स्वास्थ्य केंद्रों और संजीवनी क्लीनिकों में बच्चों को दी जाने वाली पैरासिटामोल सिरप का सैंपल भोपाल की सरकारी लैब में जांच के दौरान फेल पाया गया है।

सबसे चौंकाने वाली और डराने वाली बात यह है कि इस दवा की गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट आने में सिस्टम को पूरे एक साल का वक्त लग गया। इस एक साल की लंबी देरी का नतीजा यह रहा कि घटिया स्तर की दवा का जो स्टॉक अस्पतालों में सप्लाई किया गया था, वह रिपोर्ट आने से पहले ही मरीजों को बांटा जा चुका है। स्वास्थ्य विभाग ने अब आनन-फानन में इस दवा के वितरण पर रोक तो लगा दी है, लेकिन यह कार्रवाई 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत' वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है।

पूरा मामला जबलपुर जिले के सरकारी अस्पतालों में सप्लाई की गई पेरासिटामोल पेडियाट्रिक ओरल सस्पेंशन आईपी 125 एमजी से जुड़ा है। इस दवा का निर्माण इंदौर की कंपनी मेसर्स जेनिथ ड्रग्स लिमिटेड द्वारा किया गया था, जिसका बैच नंबर 41507 बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, यह दवा नवंबर 2024 में तैयार की गई थी और इसकी एक्सपायरी अक्टूबर 2026 निर्धारित है। सरकारी प्रोटोकॉल के तहत सप्लाई के बाद दवा का सैंपल जांच के लिए भोपाल भेजा गया था, लेकिन विभागीय सुस्ती और लैब की कछुआ चाल के कारण इसकी रिपोर्ट 30 अप्रैल 2026 को सामने आई। जब तक रिपोर्ट में दवा को अमानक घोषित किया गया, तब तक अस्पतालों के रिकॉर्ड के अनुसार लगभग पूरा स्टॉक बच्चों को पिलाया जा चुका था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर दवा में कोई घातक अशुद्धि होती, तो उन मासूमों की जान का जिम्मेदार कौन होता जो पिछले एक साल से इस दवा का सेवन कर रहे थे।

जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नवीन कोठारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जिले के सभी स्वास्थ्य केंद्रों को निर्देश जारी किए हैं कि इस विशिष्ट बैच की दवा का वितरण तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए और बचे हुए स्टॉक को वापस जमा किया जाए। हालांकि, विभागीय अधिकारी अब भी इसे एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बता रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि गुणवत्ता नियंत्रण की यह प्रक्रिया पूरी तरह से विफल साबित हुई है। यह पहला मौका नहीं है जब मध्य प्रदेश में सरकारी दवाओं के सैंपल फेल हुए हों, इससे पहले भी कई बार इंदौर की संबंधित कंपनी और अन्य फार्मा कंपनियों की दवाएं मानक स्तर पर खरी नहीं उतरी हैं। बार-बार होने वाली इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि दवा सप्लाई और क्वालिटी चेक के बीच कोई तालमेल नहीं है और न ही लैब से समय पर रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए कोई सख्त समय सीमा तय की गई है।

इस घटना के बाद शहर के सामाजिक कार्यकर्ताओं और परिजनों में गहरा आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी सिस्टम की फाइलों में दबी रिपोर्टों के कारण आम जनता के बच्चों को 'जहर' समान दवाएं दी जा रही हैं। यदि जांच रिपोर्ट आने में एक साल का समय लगता है, तो ऐसी जांच का कोई औचित्य नहीं रह जाता। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग स्टॉक की जांच करने की बात कह रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि सिस्टम की इस पोल ने सरकारी अस्पतालों पर जनता के भरोसे को एक बार फिर हिलाकर रख दिया है।

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