-राजेश कुमार सिन्हा
बिहार की साहित्यिक और शैक्षणिक परंपरा में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जिनका प्रभाव केवल उनके समय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनकी विद्वत्ता और संस्कार पीढ़ियों तक प्रेरणा देते हैं.
ऐसे ही विद्वानों में डॉ. आनंद नारायण शर्मा का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है. हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान, संवेदनशील साहित्यकार, सफल शिक्षाविद् और कुशल प्रशासक के रूप में उन्होंने अपने जीवन को ज्ञान और समाज की सेवा के लिए समर्पित किया.
15 अप्रैल 1930 को पटना सिटी में जन्मे डॉ. शर्मा ने हिंदी भाषा और साहित्य को अपना कर्मक्षेत्र बनाया और उच्च शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने हिंदी में पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की. उनका अध्ययन केवल शैक्षणिक उपलब्धि तक सीमित नहीं था, बल्कि वह भारतीय संस्कृति, समाज और साहित्य की गहरी समझ से अनुप्राणित था.शिक्षा जगत में उन्होंने अनेक वर्षों तक अध्यापन किया और अंततः ए.पी.एस.एम. कॉलेज, बरौनी के प्राचार्य के रूप में संस्थान का नेतृत्व किया. उनके कार्यकाल में महाविद्यालय में अनुशासन, अध्ययन-अध्यापन की गुणवत्ता और शैक्षणिक वातावरण को विशेष महत्व दिया गया. वे मानते थे कि महाविद्यालय केवल डिग्री देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक चेतना का केंद्र होता है.
डॉ. शर्मा का व्यक्तित्व जितना प्रभावशाली शिक्षक का था, उतना ही सशक्त साहित्यकार का भी. उनकी रचनाएँ देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं ,उन्होंने कविता, कहानी, समालोचना और वैयक्तिक निबंध जैसी विविध साहित्यिक विधाओं में लेखन किया. उनकी भाषा में विचारों की गंभीरता, अभिव्यक्ति की सादगी और मानवीय संवेदनाओं की गहराई दिखाई देती है साथ ही उनकी साहित्यिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण पक्ष आकाशवाणी से उनकी रचनाओं का प्रसारण भी रहा. उस समय आकाशवाणी से प्रसारण किसी लेखक की साहित्यिक प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता था. इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया और नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने में योगदान दिया.
डॉ. शर्मा की प्रकाशित कृतियों में "सुकवि समीक्षा", "प्रभात जी और उनका राष्ट्र पुरुष" तथा "हिंदी साहित्य और सामाजिक सद्भाव" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. इन कृतियों से उनके आलोचनात्मक विवेक, साहित्यिक दृष्टि और सामाजिक सरोकारों का परिचय मिलता है. विशेष रूप से "हिंदी साहित्य और सामाजिक सद्भाव" उनके उस चिंतन को सामने लाती है जिसमें साहित्य को समाज में समरसता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों की स्थापना का माध्यम माना गया है.
सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने लेखनी नहीं छोड़ी. प्राचार्य पद से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात वे स्वतंत्र लेखन में सक्रिय रहे. उनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का माध्यम था.
डॉ. आनंद नारायण शर्मा का व्यक्तित्व सादगी, विनम्रता और विद्वत्ता का अद्भुत संगम था. वे मानते थे कि शिक्षक का वास्तविक परिचय उसके पद से नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और समाज पर पड़े उसके सकारात्मक प्रभाव से होता है. उनके अनेक विद्यार्थी बाद में शिक्षा, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में प्रतिष्ठित हुए, जो उनके शिक्षण की सार्थकता का प्रमाण हैं.
आज जब शिक्षा और साहित्य दोनों अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब डॉ. आनंद नारायण शर्मा जैसे शिक्षकों और साहित्यकारों का स्मरण हमें यह विश्वास दिलाता है कि ज्ञान, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की शक्ति कभी क्षीण नहीं होती. उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाना है और साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को अधिक संवेदनशील, विवेकशील और उदार बनाना है.
डॉ. आनंद नारायण शर्मा का जीवन हिंदी साहित्य, उच्च शिक्षा और सामाजिक चेतना के प्रति आजीवन समर्पण की प्रेरक गाथा है. उनकी विद्वत्ता, साहित्य-साधना और शैक्षिक योगदान सदैव आदर और कृतज्ञता के साथ स्मरण किए जाते रहेंगे.
Source : palpalindiaबिहार: सीएम सम्राट चौधरी का ऐलान, राज्य में 32,388 शिक्षकों की होगी भर्ती, ट्रांसफर पोर्टल भी शुरू

