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दुनियाभर में जादू का लोहा मनवाने वाले जबलपुर के गौरव जादूगर आनंद अस्वस्थ, अस्पताल में चल रहा उपचार

दुनियाभर में जादू का लोहा मनवाने वाले जबलपुर के गौरव जादूगर आनंद अस्वस्थ, अस्पताल में चल रहा उपचार

बलपुर. दुनियाभर में अपनी जादुई कला का लोहा मनवाने वाले और देश के शीर्ष जादूगरों में शुमार जबलपुर के गौरव जादूगर आनंद इस समय गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं और जबलपुर के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा है।

जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हुई, पूरे देश और दुनिया के कला प्रेमियों के बीच चिंता की लहर दौड़ गई।

स्थानीय दैनिक जयलोक के संपादक सच्चिदानंद शेकटकर ने फेसबुक पर जादूगर आनंद की तस्वीर साझा करते हुए उनके स्वास्थ्य को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। करोड़ों लोगों को अपनी उंगलियों के इशारे पर दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर करने वाले आनंद पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे, लेकिन स्थिति बिगड़ने पर उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह खबर मिलते ही संस्कारधानी के नागरिक भावुक हो गए हैं । सांस्कृतिक जगत की कई हस्तियों और जनप्रतिनिधियों ने भी उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है।

वरिष्ठ कलाकारों का कहना है कि जादूगर आनंद ने अपनी कला के माध्यम से न केवल अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता फैलाई, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय प्रतिभा का परचम फहराया। उनके शो केवल मनोरंजन का जरिया नहीं होते थे, बल्कि उनमें एक गहरा संदेश और कड़ा अनुशासन झलकता था। आज वही जादुई हाथ जो हवा में चीजें पैदा कर देते थे, अस्पताल के बिस्तर पर बेबस पड़े हैं, लेकिन उनके प्रशंसकों का अटूट विश्वास है कि वे इस बीमारी को भी किसी जादुई खेल की तरह मात देकर जल्द ही स्वस्थ होकर बाहर आएंगे।

जादू की दुनिया का यह चिरपरिचित नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। करीब 73 वर्षीय आनंद अवस्थी पिछले 66 सालों से, यानी महज 7 साल की उम्र से ही अपने फन से लोगों को रोमांचित करते आ रहे हैं। मूल रूप से जबलपुर के रहने वाले आनंद का अपनी जन्मभूमि से गहरा लगाव रहा है। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में साझा किया था कि वे जबलपुर या भोपाल में एक भव्य मैजिक इंस्टीट्यूट स्थापित करना चाहते थे, ताकि इस विलुप्त होती कला को जीवित रखा जा सके। जब उनसे पूछा गया कि क्या जादू उन्हें विरासत में मिला है, तो उन्होंने बताया कि उनके परिवार में दूर-दूर तक कोई इस विधा को नहीं जानता था। उनके पिता मूल रूप से एक डॉक्टर थे और वे चाहते थे कि आनंद भी उसी राह पर चलें। लेकिन बचपन में अपने स्कूल के बाहर एक सड़क किनारे जादू दिखाने वाले को देखकर आनंद के मन में इस कला को सीखने की ऐसी जिज्ञासा जागी कि उन्होंने इसे ही अपना जीवन बना लिया। उन्होंने कई गुरुओं से ज्ञान लिया, ढेरों किताबों का अध्ययन किया और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इस विधा में पारंगत हुए।

जादू की परिभाषा को समझाते हुए आनंद अवस्थी हमेशा कहते रहे हैं कि जादू कई मिश्रित विधाओं की एक समग्र कला है। वे इसमें हिप्नोटिज्म यानी सम्मोहन को बहुत अहम मानते हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने हिप्नोटिज्म का ज्ञान महान विचारक ओशो रजनीश से लिया था। आनंद ने बताया था कि वे ओशो को जादू की बारीकियां सिखाते थे और बदले में ओशो उन्हें हिप्नोटिज्म की विधा सिखाते थे। उनका मानना है कि हिप्नोटिज्म वह कला है जिससे आप दर्शकों के दिमाग को उस दिशा में प्रेरित कर सकते हैं जो आप उन्हें दिखाना चाहते हैं। इसके साथ ही हाथ की सफाई, तकनीकी कौशल और वक्त के साथ खुद को अपडेट करने की चाहत ने उन्हें इस हुनर का माहिर बनाया। वे हमेशा कहते थे कि जो कलाकार समय के साथ खुद को नहीं बदलता, वह पीछे छूट जाता है। यही कारण है कि उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। वे अपने शोज को हमेशा नए कलेवर में पेश करते रहे ।

उनकी बातों में अक्सर मजेदार वाकये भी शामिल होते थे। उन्होंने एक बार कथक नृत्यांगना सितारा देवी के साथ हुई चर्चा का जिक्र करते हुए बताया था कि उन्होंने सितारा देवी को सुझाव दिया था कि वे अपने नृत्य के दौरान जादू के प्रयोग से हवा में उड़कर कुछ स्टेप्स करें, जिससे दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। हालांकि, सितारा देवी ने इसे अपनी कला के नियमों के विरुद्ध मानकर अस्वीकार कर दिया था। इस उदाहरण के जरिए आनंद यह समझाना चाहते थे कि यदि कोई भी कलाकार वक्त की नजाकत को समझते हुए अपनी कला को अपडेट करे, तो वह और अधिक सफल हो सकता है। वे हमेशा इस बात पर बल देते रहे कि जिंदगी और कला दोनों में अपडेशन अनिवार्य है।

जादूगर आनंद के मन में इस कला को लेकर एक बड़ा मलाल भी रहा है। उन्हें दुख था कि सरकार इस प्राचीन कला को लेकर नीरस बनी हुई है। उनकी इच्छा थी कि मध्य प्रदेश सरकार जादू को 'कला' का आधिकारिक दर्जा दे और एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का इंस्टीट्यूट बनाने में मदद करे। उनका मानना था कि यदि ऐसा होता है, तो कई युवाओं को स्वरोजगार मिल सकेगा। उन्होंने 150 करोड़ रुपये के बजट के साथ एक संस्थान का खाका तैयार किया था, जिसमें 12वीं पास छात्रों के लिए प्रवेश का प्रावधान था और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अनिवार्य रखा गया था ताकि वे विश्व स्तर पर अपनी बात रख सकें। उन्हें उम्मीद थी कि वे प्रदेश सरकार को इस दिशा में काम करने के लिए राजी कर लेंगे, लेकिन इससे पहले ही वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए। जबलपुर सहित पूरा देश आज ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा है कि जादू का यह बेताज बादशाह एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ा हो और उनके जादुई हाथ फिर से खुशियां बिखेरने लगें। उनकी मुस्कान ही उनके चाहने वालों के लिए सबसे बड़ा जादू साबित होगी।

Source : palpalindia

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