नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सेवा संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) उसके स्वयं के कारण नहीं, बल्कि नियोक्ता की गलत कार्रवाई के कारण उपलब्ध नहीं है, तो केवल इसी आधार पर उसे पदोन्नति, चयन वेतनमान (सेलेक्शन स्केल), सुपर टाइम स्केल या अन्य सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता.
शीर्ष अदालत ने कहा कि कोई भी नियोक्ता अपनी ही गलती का लाभ उठाकर कर्मचारी के वैधानिक अधिकारों को नहीं छीन सकता.
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह फैसला राजस्थान हाईकोर्ट बनाम अभय जैन मामले में सुनाया. अदालत ने कहा कि यदि आवश्यक एसीआर उपलब्ध नहीं होने के लिए नियोक्ता स्वयं जिम्मेदार है, तो कर्मचारी की पात्रता का मूल्यांकन उपलब्ध वैध एसीआर के आधार पर किया जाना चाहिए.
मामला अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अभय जैन से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2016 में सेवा से हटा दिया गया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च 2022 को उनके बर्खास्तगी आदेश को अवैध घोषित करते हुए उन्हें सेवा की निरंतरता, वरिष्ठता, सभी संबंधित सेवा लाभों तथा 50 प्रतिशत बकाया वेतन के साथ बहाल करने का आदेश दिया था. अदालत ने उस समय यह भी कहा था कि केवल गलत न्यायिक आदेश पारित करने के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को सेवा से नहीं हटाया जा सकता.
इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्टीकरण याचिका दायर कर पूछा कि क्या "सभी संबंधित सेवा लाभ" में चयन वेतनमान और सुपर टाइम स्केल भी शामिल होंगे, जबकि वर्ष 2016 से 2022 तक की अवधि की अधिकांश एसीआर उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि अधिकारी उस दौरान सेवा से बाहर थे.
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का यह तर्क स्वीकार करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि संबंधित अवधि की एसीआर उपलब्ध नहीं होना स्वयं हाईकोर्ट द्वारा किए गए अवैध बर्खास्तगी आदेश का परिणाम है. ऐसी स्थिति में कर्मचारी को नुकसान पहुंचाना न्यायसंगत नहीं होगा.
पीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि कानून किसी भी पक्ष को अपने ही गलत कार्य का लाभ उठाने की अनुमति नहीं देता. यदि नियोक्ता की अवैध कार्रवाई के कारण कर्मचारी सेवा से बाहर रहा और उस अवधि की एसीआर तैयार नहीं हो सकी, तो उसी कमी का हवाला देकर उसे सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के कई महत्वपूर्ण फैसलों-यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.वी. जानकीरमन, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम द्रगेंद्र सिंह जादौन, प्रभु दयाल खंडेलवाल बनाम यूपीएससी तथा आर.के. जीवनलता देवी बनाम मणिपुर हाईकोर्ट-का उल्लेख करते हुए दोहराया कि यदि कर्मचारी को गलत तरीके से सेवा से बाहर रखा गया है, तो उसकी पदोन्नति या अन्य सेवा लाभ केवल तकनीकी आधार पर नहीं रोके जा सकते.
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2022 के फैसले में पहले ही यह माना जा चुका था कि अभय जैन के विरुद्ध खराब कार्य प्रदर्शन या अनुशासनहीनता का कोई प्रमाण नहीं था. साथ ही वर्ष 2015 की एसीआर, जिसकी जानकारी उन्हें कभी नहीं दी गई थी, उनके विरुद्ध उपयोग नहीं की जा सकती.
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अभय जैन की पात्रता का आकलन वर्ष 2013 और 2014 की उपलब्ध वैध एसीआर के आधार पर किया जाए. इन एसीआर में उन्हें क्रमशः "बहुत अच्छा" (Very Good) और "अच्छा" (Good) ग्रेडिंग के साथ ईमानदारी प्रमाणपत्र भी प्राप्त था.
अदालत ने निर्णय दिया कि अभय जैन 16 जुलाई 2018 से चयन वेतनमान (Selection Scale) तथा चयन वेतनमान में तीन वर्ष पूरे होने के बाद 16 जुलाई 2021 से सुपर टाइम स्केल के पात्र हैं. न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि उनके साथ नियुक्त और उनसे कनिष्ठ अधिकारियों को इन तिथियों से यह लाभ पहले ही प्रदान किया जा चुका है.
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट को तीन माह के भीतर आदेश का पालन करते हुए अभय जैन का वेतन पुनर्निर्धारित करने, सभी सेवा लाभ संशोधित करने तथा देय बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया. हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि मौद्रिक लाभों की गणना पूर्व आदेश के अनुरूप ही होगी, जिसमें बकाया वेतन को 50 प्रतिशत तक सीमित रखा गया था.
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की प्रति देश के सभी हाईकोर्टों को भेजने का भी निर्देश दिया है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहां किसी कर्मचारी को नियोक्ता की अवैध कार्रवाई के कारण सेवा से बाहर रखा गया हो और बाद में एसीआर या अन्य तकनीकी आधारों का हवाला देकर उसके वैधानिक सेवा लाभों से इनकार किया जा रहा हो.
Source : palpalindiaआवारा पशु प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर नहीं, सड़क हादसों के पीड़ितों को मुआवजा दें राज्य : सुप्रीम कोर्ट

