जबलपुर. नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में जूनियर छात्र की आत्महत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पांच सीनियर डॉक्टरों को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है.
हाईकोर्ट ने एफआईआर और ट्रायल कोर्ट में लंबित आपराधिक प्रकरण को निरस्त करने की मांग खारिज कर स्पष्ट कर दिया कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य प्रथम दृष्टया गंभीर आरोपों की ओर संकेत करते हैं और इसकी विधिवत सुनवाई होना आवश्यक है. अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए तथ्यों के आधार पर मुकदमे की कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं माना जा सकता.
मामला वर्ष 2020 का है, जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में ऑर्थोपेडिक्स विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे छात्र भगवत देवांगन ने अपने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. इस घटना ने पूरे चिकित्सा जगत और शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग की समस्या को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी थी. मृतक के भाई प्रहलाद देवांगन की शिकायत पर गढ़ा पुलिस ने 3 नवंबर 2020 को पांच सीनियर डॉक्टरों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 34 के तहत प्रकरण दर्ज किया था. बाद में जांच पूरी कर आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया.
मामले में आरोपी बनाए गए डॉक्टरों में सलमान खान, विकास द्विवेदी सहित अन्य वरिष्ठ छात्र शामिल हैं. सभी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और उनके विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्रवाई को निरस्त करने की मांग की थी. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मृतक छात्र मानसिक तनाव, अवसाद और व्यक्तिगत समस्याओं से जूझ रहा था तथा उसके आत्महत्या करने के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं. उनका कहना था कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उनके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता.
हालांकि पुलिस जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने मामले को गंभीर बना दिया. जांच के दौरान मेडिकल कॉलेज से जुड़े कई डॉक्टरों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए गए. गवाहों ने बताया कि सीनियर छात्रों द्वारा भगवत देवांगन को लगातार प्रताड़ित किया जाता था. उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता, शारीरिक दंड दिए जाते और रैगिंग के नाम पर उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हरकतें की जाती थीं. जांच में यह भी सामने आया कि उसे उसकी क्षमता से अधिक काम कराया जाता था और ऑपरेशन थिएटर में सजा के तौर पर 'मुर्गा' बनाकर खड़ा किया जाता था. कई मौकों पर नहाने जाते समय भी उसके साथ दुर्व्यवहार किए जाने की बातें सामने आईं.
पुलिस ने जांच के दौरान मृतक के मोबाइल फोन से भी महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य एकत्र किए. जांच एजेंसी का दावा था कि आरोपी यह जानते थे कि भगवत देवांगन मानसिक तनाव और अवसाद से गुजर रहा है, इसके बावजूद उसके साथ अपमानजनक व्यवहार जारी रखा गया. पुलिस के अनुसार लगातार मानसिक प्रताड़ना और दबाव ने छात्र को इस कदर तोड़ दिया कि उसने आत्मघाती कदम उठा लिया.
दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि मृतक पहले से मानसिक बीमारी का उपचार करा रहा था और एंग्जायटी व डिप्रेशन की दवाएं ले रहा था. उन्होंने यह भी बताया कि जुलाई और अगस्त 2020 में वह आत्महत्या का प्रयास कर चुका था. बचाव पक्ष ने यह तर्क भी रखा कि मेडिकल कॉलेज की एंटी-रैगिंग कमेटी ने अपनी जांच में रैगिंग की पुष्टि नहीं की थी और मृतक ने भी समिति के समक्ष कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी. इसलिए उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण को निरस्त किया जाना चाहिए.
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की एकलपीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने की अवधारणा को केवल प्रत्यक्ष शब्दों या स्पष्ट निर्देशों तक सीमित नहीं माना जा सकता. यदि किसी व्यक्ति के साथ लगातार ऐसा व्यवहार किया जाए जिससे वह मानसिक रूप से टूट जाए और उसे जीवन समाप्त करने के अलावा कोई विकल्प न दिखाई दे, तो वह भी उकसावे की श्रेणी में आ सकता है.
अदालत ने कहा कि जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्य प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ धारा 306 और 34 के तहत अपराध का मामला बनाते हैं. ऐसे में इस स्तर पर न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप कर एफआईआर या आपराधिक कार्रवाई को समाप्त करना उचित नहीं होगा. हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संस्थान की आंतरिक जांच और आपराधिक जांच का दायरा अलग-अलग होता है. यदि एंटी-रैगिंग कमेटी को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, तो इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस द्वारा एकत्र किए गए स्वतंत्र साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया जाए.
अदालत ने माना कि जांच एजेंसी ने पर्याप्त सामग्री एकत्र की है, जिसकी सत्यता और वैधानिकता का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर किया जाना चाहिए. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि मामले का ट्रायल जारी रहेगा.
हाईकोर्ट के इस फैसले को मेडिकल शिक्षण संस्थानों में रैगिंग और मानसिक प्रताड़ना के मामलों के प्रति न्यायपालिका के सख्त रुख के रूप में देखा जा रहा है. निर्णय ने यह संदेश भी दिया है कि यदि किसी छात्र के साथ लगातार अपमानजनक और अमानवीय व्यवहार किए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष न्यायिक जांच और सुनवाई आवश्यक है. अब इस बहुचर्चित मामले में सभी की निगाहें ट्रायल कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं, जहां साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी.
Source : palpalindiaजबलपुर: रेल मंडल के 24 कर्मचारी हुए रिटायर, दी गई भावभीनी विदाई, उज्ज्वल भविष्य की करी गई कामना

