अजय कुमार, लखनऊ. गांव की पगडंडियों से लेकर कस्बों की गलियों तक, उत्तर प्रदेश में 'मास्टर साहब' का रुतबा किसी नेता से कम नहीं होता. बच्चों को पहाड़े रटाने वाला यही शिक्षक चुनाव के मौसम में पूरे मोहल्ले की राय बदलने की ताकत रखता है.
यही वजह है कि पिछले तीन महीनों में योगी आदित्यनाथ सरकार ने शिक्षकों, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के लिए घोषणाओं की मानो झड़ी ही लगा दी है. कैशलेस इलाज से लेकर करोड़ों के दुर्घटना बीमा तक, हर फैसला सीधे इस बड़े वोट-बैंक को साधने की कोशिश जैसा दिख रहा है.पहले जरा आंकड़ों की जमीन पर खड़े होकर समझें कि यह तबका है कितना बड़ा. अकेले बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत ही करीब पांच से छह लाख नियमित शिक्षक काम कर रहे हैं. इनके साथ डेढ़ लाख के आसपास शिक्षामित्र और लगभग पच्चीस हजार अंशकालिक अनुदेशक भी इसी तंत्र का हिस्सा हैं. इसके अलावा राजकीय और सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों और स्टाफ की संख्या दो से ढाई लाख के बीच बैठती है. जब इनमें रिटायर हो चुके शिक्षक और इन सबके परिवार जोड़ दिए जाएं, तो यह संख्या तीस से चालीस लाख वोटों तक पहुंच जाती है. सिर्फ संख्या ही नहीं, समाज में शिक्षक की जो साख होती है, वह इस असर को और बड़ा बना देती है. गांव का वोटर चुनाव के वक्त मास्टर साहब की बात को गंभीरता से लेता है, और चुनाव ड्यूटी से लेकर वोटर लिस्ट दुरुस्त करने तक का ज्यादातर काम भी इन्हीं के कंधों पर टिका होता है. शायद इसीलिए कोई भी सरकार इस तबके को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती.
अब बात करते हैं उन फैसलों की, जिन्होंने पिछले कुछ हफ्तों में सुर्खियां बटोरीं. जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री ने वाराणसी की धरती से 'मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना' की शुरुआत की. इस योजना के दायरे में करीब बारह से पंद्रह लाख शिक्षक, शिक्षामित्र, अनुदेशक और यहां तक कि स्कूलों में खाना बनाने वाली रसोइया बहनें भी आ गई हैं. हर परिवार को सालाना पांच लाख रुपये तक का इलाज मुफ्त मिलेगा, और इसका पूरा प्रीमियम खुद सरकार भरेगी. यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि लंबे समय से शिक्षक संगठन स्वास्थ्य सुरक्षा की मांग उठाते रहे हैं, खासकर कोविड के बाद जब अचानक इलाज का खर्च आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगा था.इसी कड़ी में सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक के साथ मिलकर एक बड़ा दुर्घटना बीमा कवर भी शुरू किया है. नियमित शिक्षकों के परिवार को अब किसी हादसे की सूरत में एक करोड़ रुपये तक मिल सकते हैं, जबकि संविदा पर काम कर रहे अनुदेशकों और शिक्षामित्रों को तीस से अस्सी लाख रुपये तक का कवर दिया गया है. यह उन तबकों के लिए बड़ी राहत है, जो अब तक किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा से वंचित थे.अनुदेशकों की बात करें तो उनकी कहानी थोड़ी अलग है. फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके बेहद कम मानदेय पर नाराजगी जताई थी, जिसके बाद मई में सरकार हरकत में आई और मासिक मानदेय नौ हजार से बढ़ाकर सीधे सत्रह हजार रुपये कर दिया. यह बढ़ोतरी एक अप्रैल 2026 से ही लागू मानी गई, यानी पीछे की तारीख से भी फायदा दिया गया. सालों से मामूली रकम में गुजारा कर रहे इन अनुदेशकों के लिए यह किसी बड़ी उम्मीद से कम नहीं था.
एक और मुद्दा जो लंबे समय से शिक्षकों को परेशान कर रहा था, वह था टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा. सुप्रीम कोर्ट ने आठवीं तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए यह परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया था, जिससे बरसों से नौकरी कर रहे शिक्षकों में डर बैठ गया कि उन्हें नए और युवा अभ्यर्थियों से सीधी टक्कर लेनी पड़ेगी. इसे भांपते हुए जुलाई की शुरुआत में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इन-सर्विस शिक्षकों के लिए अलग से टीईटी कराई जाए, ताकि वे बिना किसी अतिरिक्त दबाव के अपनी पात्रता साबित कर सकें. साथ ही जुलाई की यूपीटीईटी परीक्षा में बैठने वाले कार्यरत शिक्षकों को विशेष अवकाश भी दिया गया. इसके अलावा शहरी इलाकों के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी को देखते हुए दस हजार से ज्यादा नए पदों पर भर्ती का खाका भी नवगठित उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को भेजा जा चुका है.लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी उतना ही असरदार है. पुरानी पेंशन योजना यानी ओपीएस की मांग सालों से शिक्षक संगठनों की सबसे बड़ी मांग बनी हुई है, और सरकार अब तक इसे वित्तीय बोझ बताकर टालती रही है. चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते हैं, विपक्ष इस मुद्दे को हवा देने से नहीं चूकता. दूसरी बड़ी टीस शिक्षामित्रों की है. साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने सवा लाख से ज्यादा शिक्षामित्रों का सहायक शिक्षक पद पर समायोजन रद्द कर दिया था, और तब से यह मामला जस का तस अटका पड़ा है. मानदेय में मामूली सुधार तो हुए हैं, पर 'समान काम समान वेतन' और पूर्ण नियमितीकरण की मांग आज भी अधूरी है, और यह गुस्सा वक्त-वक्त पर सड़कों पर आंदोलन की शक्ल ले लेता है.
इसी साल जून-जुलाई में लागू हुई त्रि-स्तरीय तबादला और समायोजन नीति ने भी शिक्षकों को उलझन में डाल दिया. इसके अलावा स्कूलों में अनिवार्य की गई डिजिटल हाजिरी को लेकर भी प्रदेशभर में तीखा विरोध देखने को मिला. शिक्षकों का कहना है कि दूर-दराज के गांवों में जहां नेटवर्क ठीक से पकड़ता ही नहीं, वहां रोज ऑनलाइन हाजिरी लगाना व्यावहारिक तौर पर मुश्किल है. कुल मिलाकर देखा जाए तो कैशलेस इलाज, मोटा दुर्घटना बीमा और अनुदेशकों के मानदेय जैसी सौगातें सरकार के प्रति शिक्षकों की नाराजगी को काफी हद तक कम करने वाली साबित हो सकती हैं. अलग टीईटी का वादा भी इस तबके में राहत का माहौल बना गया है. पर पुरानी पेंशन और शिक्षामित्रों के नियमितीकरण जैसे बुनियादी सवाल अब भी जवाब मांग रहे हैं. आने वाले समय में यही देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये तमाम मरहम शिक्षकों के पुराने जख्मों को पूरी तरह भर पाते हैं, या फिर चुनाव नजदीक आते ही यह असंतोष एक बार फिर सतह पर आ जाता है.
Source : palpalindiaजौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर कार्रवाई से यूपी में सियासी घमासान, अखिलेश ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

