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कार्बन बॉर्डर टैक्स पर भारत के लिए राहत की खबर, शुरुआती वित्तीय असर सीमित पर अनिश्चितता बरकरार

कार्बन बॉर्डर टैक्स पर भारत के लिए राहत की खबर, शुरुआती वित्तीय असर सीमित पर अनिश्चितता बरकरार

ई दिल्ली/ब्रसेल्स. यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लागू किए जा रहे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) को लेकर भारत और यूरोप के बीच महीनों से चले आ रहे कूटनीतिक और व्यापारिक तनाव के बीच, ब्रसेल्स स्थित थिंक टैंक सैंडबैग (Sandbag) की एक नई रिपोर्ट ने भारतीय निर्यातकों के लिए शुरुआती राहत का संकेत दिया है.

रिपोर्ट के विश्लेषण के अनुसार, CBAM के पूरी तरह लागू होने पर भारतीय निर्यात पर पड़ने वाला वित्तीय भार शुरू में "काफी सीमित" रहने की संभावना है, लेकिन इसके साथ ही यह अनिश्चितता भी बरकरार है कि लंबी अवधि में यह नीति भारतीय उद्योगों को किस तरह प्रभावित करेगी.

CBAM, जिसे अक्सर 'कार्बन टैक्स' के रूप में जाना जाता है, यूरोपीय उद्योगों को "कार्बन लीकेज" से बचाने के लिए डिज़ाइन किया गया है. 'कार्बन लीकेज' से तात्पर्य उस स्थिति से है जब सख्त जलवायु नियमों के कारण यूरोपीय कंपनियाँ उत्पादन लागत बढ़ने पर अपने कारखानों को उन देशों में स्थानांतरित कर देती हैं जहाँ कार्बन उत्सर्जन नियम कम सख्त हैं. CBAM के तहत, जनवरी 2026 से, यूरोपीय संघ में आयात की जाने वाली कार्बन-गहन वस्तुएँ-जैसे स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, फर्टिलाइज़र, बिजली और हाइड्रोजन-पर उनके उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाया जाएगा. यूरोपीय संघ का तर्क है कि यह एक "लेवल प्लेइंग फील्ड" बनाता है, लेकिन भारत, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका सहित कई विकासशील देशों ने इसे "जलवायु के नाम पर व्यापार बाधा" बताते हुए लगातार इसका विरोध किया है.

सैंडबैग की रिपोर्ट के अनुसार, CBAM के शुरुआती परिदृश्य में, EU में भारतीय वस्तुओं के आयातकों को कुल व्यापार मूल्य का लगभग 2.6 प्रतिशत का अतिरिक्त लागत भार झेलना पड़ सकता है. यह अतिरिक्त लागत लगभग 826 मिलियन यूरो (भारतीय मुद्रा में करीब ₹7,400 करोड़) होने का अनुमान है. हालांकि यह एक बड़ी राशि है, लेकिन यह उन भयावह अनुमानों से कम है जो पहले लगाए जा रहे थे.

सबसे महत्वपूर्ण राहत का संकेत भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल ही में हुए समझौते से आया है. इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ ने भारत की प्रस्तावित कार्बन ट्रेडिंग स्कीम को मान्यता देने की इच्छा जताई है. इस मान्यता का सीधा अर्थ यह होगा कि भविष्य में जब CBAM लागू होगा, तो भारतीय कंपनियाँ अपने उत्पादों पर पहले से चुकाए गए घरेलू कार्बन क्रेडिट की राशि को CBAM शुल्क से घटा सकेंगी. इस व्यवस्था से CBAM का राजस्व यूरोपीय संघ को जाने के बजाय भारत में ही रहेगा, जिससे घरेलू उद्योगों पर लगने वाले शुद्ध कर का दबाव कम होगा. सैंडबैग के विश्लेषण के अनुसार, यदि भारत की कार्बन ट्रेडिंग स्कीम यूरोपीय संघ के आंतरिक कार्बन मूल्य का मात्र 25 प्रतिशत भी हासिल कर लेती है, तो CBAM का कुल प्रभाव 42 प्रतिशत तक घटकर 480 मिलियन यूरो (करीब ₹4,300 करोड़) रह जाएगा, जो EU-भारत वस्तु व्यापार का केवल 1.5 प्रतिशत होगा.

इस नीति से भारत का स्टील सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित होगा, क्योंकि भारत के लगभग दो-तिहाई स्टील निर्यात यूरोप को किए जाते हैं, और स्टील इंडस्ट्री देश के कुल उत्सर्जन में बड़ी हिस्सेदारी रखती है. CBAM के लागू होने पर इन निर्यातकों को अपने उत्पादों के कार्बन फुटप्रिंट का प्रमाण देना अनिवार्य हो जाएगा.

हालांकि, भारत सरकार भी भविष्य के वैश्विक कार्बन मूल्य प्रणालियों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रही है. सरकार ने 2030 तक देश की अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना बढ़ाने और एक राष्ट्रीय कार्बन मार्केट शुरू करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है. ये कदम न केवल घरेलू उत्सर्जन को कम करेंगे बल्कि भविष्य में भारतीय उद्योगों को वैश्विक व्यापार नियमों के तहत प्रतिस्पर्धात्मक बनाए रखने में भी मदद करेंगे.

इस पृष्ठभूमि में, CBAM यूरोपीय संघ और भारत के बीच चल रही मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत में एक प्रमुख विवाद बिंदु बना हुआ है. भारत लगातार इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि विकसित देशों को, जो ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़े उत्सर्जक रहे हैं, जलवायु परिवर्तन से निपटने की अधिक ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए. वहीं, यूरोपीय संघ इसे वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन कम करने का एक न्यायसंगत तरीका बता रहा है. सैंडबैग की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि दोनों पक्षों के बीच अब "विरोध से संवाद" की दिशा में एक स्पष्ट बदलाव दिख रहा है, जहाँ भारत अपनी घरेलू नीति को अंतरराष्ट्रीय जलवायु नियमों से जोड़ने की कोशिश कर रहा है.

सैंडबैग ने अपनी रिपोर्ट के साथ ही एक नया CBAM सिम्युलेटर भी लॉन्च किया है. यह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध उपकरण नीति-निर्माताओं और उद्योगों को यह समझने में मदद करेगा कि घरेलू कार्बन कीमत में बदलाव या CBAM के दायरे में विस्तार होने पर व्यापारिक लागत और उत्सर्जन पर क्या प्रभाव पड़ेगा.

रिपोर्ट का अंतिम निष्कर्ष यह है कि भले ही शुरुआती वित्तीय असर सीमित हो, यह नीति आने वाले वर्षों में भारतीय उद्योगों के लिए न केवल नई जिम्मेदारियाँ लाएगी, बल्कि उन्हें हरित उत्पादन की ओर बढ़ने के नए अवसर भी प्रदान करेगी. EU और भारत के बीच FTA बातचीत में CBAM अब केवल विवाद का विषय नहीं, बल्कि जलवायु, व्यापार और न्याय को एक साथ तौलने का एक संवाद फ्रेमवर्क बन गया है, जो वैश्विक व्यापार के भविष्य को आकार देने की क्षमता रखता है.

Source : palpalindia

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