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सच्चाई vs भ्रम: मनुस्मृति में नारी को लेकर ऐसा लिखा क्या है? जिस पर होता है बवाल

सच्चाई vs भ्रम: मनुस्मृति में नारी को लेकर ऐसा लिखा क्या है? जिस पर होता है बवाल

हजार साल पुराना है उनका गुस्सा,

हजारों साल पुरानी है उनकी नफरत

गोरख पांडे के इन शब्दों को अगर आज के समाज की असलियत कहा जाए तो कोई गलती नहीं होगी। सोचिए एक किताब जिसे कुछ लोग धर्म की बुनियाद मानते हैं और वहीं कुछ लोग उसे सरेआम जलाकर अपना गुस्सा जाहिर करते हैं।

हम बात कर रहे हैं प्राचीन भारत के सबसे असरदार और शायद सबसे विवादित ग्रंथ की मनुस्मृति की। आप में से कितने लोगों ने मनुस्मृति को पढ़ा है? आप में से बहुत सारे लोगों ने गीता को पढ़ा होगा। रामचरितमानस को पढ़ा होगा, महाभारत को पढ़ा होगा। कुछ लोगों ने प्राचीन पुस्तकों को जो अलग-अलग पुस्तकें हैं उन्हें पढ़ा होगा। वेदों को पढ़ा होगा और इनसे आपने बहुत कुछ सीखा भी होगा। ऐसी ही एक प्राचीन पुस्तक है जिसे हम कहते हैं मनुस्मृति। राहुल गांधी ने एक बार फिर से मनुस्मृति को अपना निशाना बनाया है। पुणे में छात्रों की गूंज नाम के अपने कार्यक्रम में राहुल गांधी ने छात्रों से बात की थी और इस दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति में एक श्लोक का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे यह किताब महिलाओं की आजादी के खिलाफ है और इस पर हमें शर्म आनी चाहिए। ऐसा राहुल गांधी ने कहा। अब सवाल यह है कि आखिर राहुल गांधी बार-बार मनुस्मृति को ही अपना निशाना क्यों बनाते हैं? इस किताब का पूरा नाम मानव धर्म शास्त्र है। तो आज सबसे पहले आपको मनुस्मृति के बारे में बताते हैं।

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दो प्रकार के ग्रंथ देखने को मिलते हैं

जब हम भारत में धर्म ग्रंथों की बात करते हैं तो अमूमन शुरुआत में दो प्रकार के ग्रंथ देखने को मिलते हैं। एक जिनको हम श्रुति ग्रंथ कहते हैं जिनको सुना गया समझा गया। एक उनको स्मृति ग्रंथ जिनको सुनने के बाद याद किया गया और फिर उसे लिखा गया। कई बार इनको उनके डिसाइपल्स द्वारा लिखा गया। तो श्रुति के बाद स्मृतियों का जो महत्व है। हिंदू धर्म में या सनातन धर्म की अगर बात करें तो प्राचीन में बहुत सारे ग्रंथ जो थे वो इन्हीं विधियों से होकर आगे बढ़े हैं। वेदों की बात करें या अरण्यकों की बात करें। ब्राह्मस्य की बात करें या उन स्मृतियों की बात करें जिनमें से एक मनुस्मृति है। स्मृतियों की बात करें तो कुल लगभग 18 स्मृति है। अगर हम धर्मशास्त्र की बात करें तो 18 स्मृति है। जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क स्मृति, पराशर स्मृति, विष्णु स्मृति और बहुत सारी। इनमें से पहली स्मृति मनुस्मृति को कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो ब्रह्मा थे उन्होंने मनु को ज्ञान दिया। ठीक है? मनु ने यही ज्ञान अपने शिष्य भृगु को दिया और भृगु ने अपने इस ज्ञान को आगे मानवता तक बढ़ाया। शुरुआत में ज्ञान की परंपरा को ऐसे बताया गया है।

सृष्टि के पहले इंसान ने लिखी पुस्तक

इस किताब में 12 अध्याय हैं और लगभग 2694 श्लोक इस किताब में हैं। हिंदुओं की ऐसी मान्यताएं है कि इस पुस्तक को सृष्टि के पहले इंसान ने लिखा था और उन्होंने ही इसके जरिए मानवता को तमाम तरह के कानून दिए। मतलब जो सृष्टि में पहला मनुष्य है उसने इसे लिखा। इसीलिए इसे मनुस्मृति कहा जाता है। यहां मनु का मतलब है पहला मनुष्य। हालांकि कई विद्वानों का ऐसा मानना है कि यह पुस्तक आज से लगभग 2000 वर्ष पहले यानी 200 ईसा पूर्व से लेकर के के आसपास लिखी गई है और 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवी के बीच इसे लिखा गया है। इस ग्रंथ में मनु ने जीवन दर्शन, प्रशासन, समाज की रचना, नीतियां और कानून के बारे में विस्तार से बताया है। यानी समाज को कैसे चलाना है। राजा से लेकर प्रजा तक सबका धर्म क्या होना चाहिए? आचार विचार क्या होना चाहिए? व्यवहार कैसा होना चाहिए? ये सारी बातें इस पुस्तक में बताई गई है। यह जीवन जीने की एक पूरी पद्धति है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस समय यह पुस्तक लिखी गई तब तक ना तो बाइबल लिखी गई थी और ना ही कुरान लिखी गई थी। शासन और प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था में इस पुस्तक का इस्तेमाल ना सिर्फ भारत में बल्कि कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी हुआ जहां पर हिंदू साम्राज्य हुआ करते थे। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने हिंदू कोड बनाने में इस ग्रंथ का काफी इस्तेमाल किया था। लेकिन आजाद भारत के कानून में हमारे संविधान में इस पुस्तक की कोई जगह नहीं है।

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महिलाओं के पक्ष में भी लिखी गई कई बातें

यत्र नार्यस्तु पूजयंते रमंते तत्र देवता। हिंदी में इसका मतलब है जहां महिलाओं का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह पुस्तक आज से लगभग 2000 वर्ष पहले लिखी गई थी। इसे आज की नैतिकता से जज नहीं किया जा सकता। बाइबल दास प्रथा को, स्लेवरी को समर्थन देती है। और कई जानकारों का दावा है कि कुरान में भी कई ऐसी बातें हैं जो महिला विरोधी हैं और इस पर आज भी बहस होती रहती है। यह एक विवाद का विषय है। जबकि ये दोनों ही पुस्तकें मनुस्मृति के कई 100 वर्ष बाद लिखी गई थी। यह किताब दहेज के भी खिलाफ है। और तो और इसमें यह भी कहा गया है कि शूद्रों और महिलाओं को भी धर्म के रास्ते पर चलने का पूरा हक है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी जिक्र

2026 के एक फैसले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक विधवा के गुजारे भत्ते के अधिकार को सही ठहराने के लिए मनुस्मृति का ही हवाला दिया था। ये दिखाता है कि ये महज इतिहास के पन्नों में दबी हुई कोई किताब नहीं है। और ये कोई एक आध बार नहीं हुआ है। 2019 से पहले ही सुप्रीम कोर्ट सात से भी ज्यादा बार अपने फैसलों में मनुस्मृति का जिक्र कर चुका था। अगर हाई कोर्ट्स की बात करें तो वहां तो इसका इस्तेमाल और भी ज्यादा होता रहा है।

पहले जलाया फिर महिलाओं को हक दिलाने में श्लोकों का किया इस्तेमाल

25 दिसंबर, 1927 का दिन था जब डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया। अंबेडकर ने पहले से घोषणा कर दी थी कि वह इस हिंदू ग्रंथ को जलाएंगे। जो जगह उन्होंने इसके लिए चुनी वो महाड़ नाम का महाराष्ट्र का तटीय इलाका था, जो कोलाबा (अब रायगढ़) जिले में था। अंबेडकर मनुस्मृति को जातिवादी और पितृसत्तात्मक मानदंडों के खिलाफ मानते थे। बकौल उनके, मनुस्मृति ऐसा हिंदू ग्रंथ है, जो जाति उत्पीड़न को संस्थागत बनाता था। निचली जातियों, विशेषकर दलितों और महिलाओं के शोषण और भेदभाव को उचित ठहराता था। डॉक्टर अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाकर इसका विरोध किया था उन्हीं ने बाद में हिंदू कोड बिल की बहस में महिलाओं को प्रॉपर्टी में हक दिलाने के लिए मनुस्मृति के ही कुछ प्रोग्रेसिव श्लोकों का इस्तेमाल किया। डॉ. बी आर आंबेडकर ने यह तर्क दिया था कि महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की बात ऋषि मनु जैसे स्मृतिकारों द्वारा कही गई थी। 24 फरवरी 1949 को संविधान सभा की बहस के दौरान उन्होंने कहा था: इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिन दो स्मृतिकारों का मैंने उल्लेख किया है-याज्ञवल्क्य और मनु-वे उन 137 स्मृतिकारों में सर्वोच्च स्थान रखते हैं जिन्होंने स्मृतियों की रचना करने का प्रयास किया था। इन दोनों ने ही यह व्यवस्था दी है कि पुत्री एक-चौथाई हिस्से की हकदार है। यह अत्यंत खेदजनक है कि किसी न किसी कारणवश कुरीतियों और प्रथाओं ने इस मूल विधान के प्रभाव को नष्ट कर दिया; अन्यथा हमारी अपनी स्मृतियों के आधार पर भी पुत्री एक-चौथाई हिस्सा पाने की पूरी हकदार होती। उन्होंने आगे कानूनों की तुलना में रीति-रिवाजों और प्रथाओं को प्राथमिकता देने के लिए प्रिवी काउंसिल को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा न हुआ होता, तो मनुस्मृति ने वर्षों पहले ही महिलाओं और संपत्ति में उनके उत्तराधिकार के अधिकारों को सशक्त बना दिया होता।

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