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अनुबंध सेवा और वित्तीय लाभ के मामले में Supreme Court ने हिमाचल सरकार को घेरा, कहा- "सरकार शेर तो कर्मचारी मेमने जैसे.", जानिए क्या है पूरा विवाद

अनुबंध सेवा और वित्तीय लाभ के मामले में Supreme Court ने हिमाचल सरकार को घेरा, कहा- "सरकार शेर तो कर्मचारी मेमने जैसे.", जानिए क्या है पूरा विवाद

Supreme Court News: हिमाचल प्रदेश के हजारों अनुबंधित कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा दायर उस विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के कर्मचारियों के पक्ष में दिए गए फैसले को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार की अपील को निरस्त करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को यथावत रखा है।

बता दें कि हिमाचल प्रदेश सरकार के अनुबंध कर्मचारियों की नियमितीकरण नीति, वरिष्ठता और सेवा लाभों से जुड़े मामले पर बीते दिन सर्वोच्च न्यायालय में एक अहम सुनवाई संपन्न हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यदि अनुबंध सेवा की पूरी अवधि को वरिष्ठता, वार्षिक वेतन वृद्धि और एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन के लिए गिना जाता है, तो केवल शिक्षा विभाग पर ही 6,000 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष वित्तीय बोझ आ जाएगा। राज्य प्रशासन ने अपने जवाब में तर्क दिया है कि उसकी आर्थिक स्थिति इतनी विशाल राशि का भुगतान करने में पूरी तरह असमर्थ है।

राज्य सरकार के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि वर्ष 2003 में हिमाचल प्रदेश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था और सरकार के पास नए नियमित पदों के सृजन के लिए पर्याप्त बजटीय प्रावधान नहीं थे। इसके बाद वर्ष 2004 में सेवा नियमों में संशोधन करके अनुबंध के आधार पर नियुक्तियां करने का प्रावधान शामिल किया गया था। राज्य का दावा था कि कर्मचारियों को अनिश्चित काल तक अनुबंध पर न रखने की मंशा से समय-समय पर नियमितीकरण नीतियों में ढील दी गई।

अदालत को दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2006-07 में 8 वर्ष की अनुबंध सेवा पूरी करने के बाद नियमितीकरण की नीति लागू की गई थी। बाद में इस अवधि को घटाकर क्रमशः 6 वर्ष, 5 वर्ष, 3 वर्ष और वर्तमान में 2 वर्ष कर दिया गया। मौजूदा व्यवस्था के तहत किसी व्यक्ति को 2 वर्ष के अनुबंध पर रखा जाता है और उसके बाद उसकी सेवाओं को नियमित कर दिया जाता है। हालांकि, यह विवाद तब गहराया जब 'ताज मोहम्मद' मामले में उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया कि अनुबंध सेवा अवधि को वरिष्ठता और सभी परिणामी लाभों के लिए गिना जाना चाहिए।

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राज्य सरकार के अनुसार, उच्च न्यायालय ने ताज मोहम्मद मामले के फैसले का विस्तार करते हुए इसे टेन्योर, मानदेय और अन्य गैर-नियमित कर्मचारियों पर भी लागू कर दिया। इससे कर्मचारियों की ओर से पुरानी अनुबंध अवधि के आधार पर वित्तीय लाभों और एसीपी की मांग की जाने लगी। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि उसने वैधानिक ढांचे में संशोधन करके अदालती फैसलों के कानूनी आधार को बदल दिया है और सरकार को भूतलक्षी प्रभाव से नीतिगत बदलाव करने का वैधानिक अधिकार है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार की दलीलों पर गंभीर आपत्तियां जताईं। अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार एक 'शेर' की भांति है और कर्मचारी एक असहाय 'मेमने' की तरह हैं, जहां संविदा शर्तों के जरिए कर्मचारियों का शोषण किया जाता है। पीठ ने कहा कि सरकार कर्मचारियों को उनका कानूनी हक न देने के लिए वित्तीय बाधाओं और हजारों करोड़ रुपये के आंकड़े गिनाती है, जबकि अन्य मदों में खर्च किया जाता है। अदालत ने सवाल उठाया कि नियमितीकरण के बाद पुरानी सेवाओं के लाभ रोकने को किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है।

पेंशन योजना के संदर्भ में राज्य सरकार के वकील ने स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश में अब नई पेंशन योजना से जुड़ा गतिरोध समाप्त हो चुका है और राज्य में सभी कर्मचारियों के लिए एक समान पेंशन व्यवस्था लागू है। सुनवाई के अंत में एडवोकेट जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत से राज्य की व्यावहारिक वित्तीय कठिनाइयों को दर्शाने वाले आंकड़े और चार्ट प्रस्तुत करने का अवसर मांगा, जिस पर अदालत ने मामले के संतुलन और कानूनी सिद्धांतों के तहत आगे विचार करने का संकेत जरुर दिया।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला और समय सीमा
हालांकि सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय सुनाया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के विवादित निर्णय या आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

याचिका खारिज होने के तुरंत बाद, हिमाचल प्रदेश राज्य की ओर से पेश हुए विद्वान महाधिवक्ता ने अदालत से एक विशेष अनुरोध किया। उन्होंने अदालत से प्रार्थना की कि सक्षम न्यायालयों द्वारा पारित निर्णय का पालन करने के लिए राज्य सरकार को कुछ उचित समय प्रदान किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा किए गए अनुरोध की प्रकृति और इसमें शामिल राशि पर विचार किया। अदालत ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को आदेश के अनुपालन के लिए आज की तारीख से चार महीने का समय प्रदान किया है। इसके साथ ही, इस याचिका से संबंधित यदि कोई लंबित आवेदन था, तो उसे भी अदालत द्वारा निस्तारित घोषित कर दिया गया।

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