
Kalyan Durgadi Fort dispute history : महाराष्ट्र के ठाणे जिले के अंतर्गत आने वाले कल्याण का ऐतिहासिक दुर्गाडी किला एक बार फिर भारी सांप्रदायिक और राजनीतिक तनाव के केंद्र में आ गया है।
हर साल बकरीद के त्योहार पर यहां कानून-व्यवस्था और धार्मिक अधिकारों को लेकर एक अनसुलझा और संवेदनशील माहौल देखने को मिलता है। इस वर्ष भी त्योहार के पावन मौके पर किले के भीतर शांति बनाए रखने के प्रशासनिक प्रयासों के बीच दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बेहद चरम पर पहुंच गया। इस स्थान पर सुरक्षात्मक कारणों से ईद के दिन हिंदू श्रद्धालुओं के मंदिर में प्रवेश पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध के विरोध में पिछले चार दशकों से चली आ रही एक अनूठी और आक्रामक धार्मिक परंपरा आज भी उतनी ही मजबूती से निभाई जा रही है, जिसने स्थानीय प्रशासन की रातों की नींद उड़ा दी है।
इस पूरे तनाव की पृष्ठभूमि और इसके पीछे का मुख्य कारण 'घंटानाद आंदोलन' है, जिसकी शुरुआत साल 1986 में कद्दावर शिवसेना नेता दिवंगत आनंद दिघे द्वारा की गई थी। चार दशक पुरानी घंटानाद की यह परंपरा वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी पूरी तरह कायम है। वर्तमान में इस विवादित स्थल को लेकर दोनों ही पक्षों की ओर से देश की सर्वोच्च कानूनी व्यवस्था और स्थानीय अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं, जिन पर न्यायिक सुनवाई की प्रक्रिया अब भी जारी है। अदालती विचाराधीन मामले के बावजूद आज एक बार फिर यहां नमाज के ठीक बाद बेहद तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई। किले परिसर में नमाज संपन्न होने के तुरंत बाद जहां एक पक्ष की ओर से जोरदार नारेबाजी की गई, वहीं इसके जवाब में दूसरे पक्ष के लोगों ने सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया, जिससे माहौल में अचानक कड़वाहट और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गईं।
संभावित सांप्रदायिक हिंसा और कानून-व्यवस्था के पूरी तरह बिगड़ने की आशंका को भांपते हुए ठाणे और कल्याण पुलिस प्रशासन ने दुर्गाडी क्षेत्र में अभूतपूर्व सुरक्षा घेरा तैयार किया है। भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) और विभिन्न दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा प्रशासन पर दबाव बनाने के उद्देश्य से पूर्व घोषित प्रदर्शनों के बाद से ही पूरा इलाका एक छावनी में तब्दील हो चुका है। विशेष रूप से कल्याण के लाल चौकी क्षेत्र और उसके आसपास भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है। एहतियात के तौर पर स्थानीय पुलिस ने दुर्गाडी किले की ओर जाने वाले तीनों मुख्य रास्तों को पूरी तरह से बैरिकेड लगाकर ब्लॉक कर दिया है ताकि किसी भी बाहरी तत्व या अनधिकृत भीड़ के प्रवेश को रोका जा सके और किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना पर तुरंत काबू पाया जा सके।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो मुंबई के सैटेलाइट शहर कल्याण में स्थित दुर्गाडी किला एक अनूठे धार्मिक सह-अस्तित्व और साथ ही एक गहरे विवाद की भूमि रहा है, क्योंकि इस किले के प्रांगण में जहां एक प्राचीन मंदिर मौजूद है, वहीं कुछ ही दूरी पर एक मस्जिद भी स्थित है। पूर्व के वर्षों में बकरीद के दौरान सुरक्षा कारणों का हवाला देकर जब हिंदुओं के मंदिर आने पर रोक लगाई जाती थी, तब महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के राजनीतिक गुरु माने जाने वाले तत्कालीन शिवसेना नेता आनंद दिघे ने इसे हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन बताते हुए इसके खिलाफ एक व्यापक आंदोलन छेड़ दिया था।
आनंद दिघे ने साल 1986 में दुर्गाडी किले में मौजूद इसी मंदिर से ऐतिहासिक घंटानाद आंदोलन की शुरुआत की थी और यह पुरजोर दावा किया था कि यह स्थान मूल रूप से हिंदुओं का मंदिर है और इस पर हिंदुओं का सांस्कृतिक व धार्मिक हक है। दिघे के उस कड़े रुख के बाद से ही कल्याण का यह किला संपूर्ण महाराष्ट्र की राजनीति और धार्मिक विमर्श का एक बेहद संवेदनशील केंद्र बन गया, जहां आज भी उनके उत्तराधिकारी और विभिन्न राजनीतिक दल हर साल इस घंटानाद परंपरा को दोहराकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यह विवाद न केवल ठाणे जिले की कानून-व्यवस्था की वार्षिक परीक्षा लेता है, बल्कि यह दर्शाता है कि चार दशक पुराना यह मुद्दा आज भी महाराष्ट्र की क्षेत्रीय राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को गहरे तक प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
