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आत्मा अमर और शरीर नश्वर, संग्रह नहीं सदाचार ही सच्ची पूंजी: कोटा में विवर्धनसागर जी महाराज का संदेश

आत्मा अमर और शरीर नश्वर, संग्रह नहीं सदाचार ही सच्ची पूंजी: कोटा में विवर्धनसागर जी महाराज का संदेश

Prathakal 6 days ago

स्वीर में कोटा के चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान नजर आ रहे श्रद्धालु और आचार्य की तस्वीर।

तस्वीर में कोटा के चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान नजर आ रहे श्रद्धालु और आचार्य की तस्वीर।

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में 'विराग वर्धन वर्षायोग-2026' के अंतर्गत समाधिस्थ गणाचार्य श्री 108 विरागसागर जी महाराज के सुशिष्य एवं पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ (6 पिच्छी) का भव्य चातुर्मासिक मंगल प्रवेश श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के वातावरण में जारी है। आयोजन अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज समिति, रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

इस दौरान गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ने द्रव्यसंग्रह ग्रंथ की गाथा का मर्म समझाते हुए कहा कि प्रत्येक जीव तीनों कालों में चार प्रमुख प्राणों-इंद्रिय, मन-वचन-कायबल, श्वासोच्छ्वास तथा आयुबल-के आधार पर जीवन धारण करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का वास्तविक जीवन उसकी आत्मा से संचालित होता है, क्योंकि आत्मा अविनाशी, शाश्वत और अमर है, जबकि शरीर नश्वर है और आत्मा अनंत यात्रा की पथिक है।

मुनिश्री ने कहा कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि जीव भगवान का स्मरण कर ले तो उसका कल्याण संभव हो सकता है। इसलिए सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर धर्म, आत्मसाधना और आत्मकल्याण को जीवन का आधार बनाना ही मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए।

प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने विश्वविजेता सिकंदर का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब उसने एक मुनिराज से अपनी शेष आयु के बारे में पूछा तो उत्तर मिला कि उसके जीवन के केवल तीन दिन शेष हैं। यह सुनकर उसने देश-विदेश से श्रेष्ठ वैद्यों और हकीमों को बुलाया, लेकिन मृत्यु को कोई रोक नहीं सका। इसके बाद सिकंदर ने अंतिम इच्छा व्यक्त की कि उसके अंतिम संस्कार के समय उसके दोनों हाथ ताबूत के बाहर खुले रहें, ताकि संसार यह देख सके कि पूरी दुनिया जीतने निकला व्यक्ति भी खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही चला गया। उन्होंने कहा कि धन, वैभव और साम्राज्य यहीं रह जाते हैं, जबकि साथ केवल कर्म और धर्म ही जाते हैं।

मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं महामंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं चित्र अनावरण के साथ हुआ। यह विधि सकल जैन समाज के अध्यक्ष प्रकाश बज, संजय बांझल, टीकम पाटनी, मुकेश मंगल एवं अशोक सांवला ने संपन्न कराई। कार्यक्रम का संचालन पारस कासलीवाल ने किया।

कार्यक्रम में सकल दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला, बसंत दोषी, निर्मल अजमेरा, प्रकाश पहाड़िया, मनोज निर्खी, सुरेश देईवाले, चंद्रप्रकाश बंसल, विनोद सरसोप, मोनू बाकलीवाल, नितेश खटोड़, सुरेंद्र पहाड़िया, पारस गोधा, अशोक पांडिया तथा चंद्रप्रभु दिगम्बर नवयुवक मंडल के सदस्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। प्रवचन में आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, मृत्यु की अनिवार्यता तथा धर्म और सदाचार को जीवन की वास्तविक पूंजी बताते हुए आत्मकल्याण का संदेश दिया गया।

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