समुद्र में बने तेल और गैस के रिग प्लेटफॉर्म समुद्र मंथन योजना के तहत खोज कार्य के संदर्भ में दिखाई दे रहे हैं।
समुद्र में बने तेल और गैस के रिग प्लेटफॉर्म समुद्र मंथन योजना के तहत खोज कार्य के संदर्भ में दिखाई दे रहे हैं।
अपनी बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को सुरक्षित करने और विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वाकांक्षी कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप, देश के गहरे समुद्र में छिपे ऊर्जा संसाधनों को तलाशने के लिए 'समुद्र मंथन' (नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम) को आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है। प्राचीन हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित समुद्र मंथन की अवधारणा से प्रेरित यह आधुनिक कार्यक्रम समुद्र की गहराइयों में छिपे 'अमृत' यानी तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों को बाहर निकालने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
वर्तमान में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक वैश्विक बाजार पर निर्भर है। देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 से 89 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग आधा प्राकृतिक गैस आयात करता है। ऊर्जा की लगातार बढ़ती मांग के कारण विदेशी सप्लाई पर यह निर्भरता देश की आर्थिक और सामरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। खासकर वैश्विक स्तर पर उत्पन्न होने वाले भू-राजनीतिक तनावों और संकटों के बीच घरेलू स्तर पर ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी मांग बन गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इस वृहद योजना को अमलीजामा पहनाने का निर्णय लिया है।
इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 84,084 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च किए जाने का अनुमान है। यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसके माध्यम से गहरे और अति-गहरे समुद्र के उन अनछुए इलाकों में खोजबीन तेज की जाएगी जहाँ अपार ऊर्जा संसाधन मौजूद होने की संभावना तो है, लेकिन उच्च लागत और तकनीकी जोखिम के कारण अब तक वहां काम नहीं हो सका था। सरकार इस योजना के जरिए शुरुआती चरण के बेहद जोखिम भरे और खर्चीले कामों में वित्तीय सहायता प्रदान करेगी, जिससे बड़ी और दिग्गज ऊर्जा कंपनियों को समुद्र में खोज करने के लिए प्रोत्साहन मिल सके।
इस कार्यक्रम की रूपरेखा बेहद व्यापक है, जिसमें कई स्तरों पर कार्य किए जाने हैं। योजना के तहत आधुनिक सिस्मिक टेक्नोलॉजी का उपयोग करके समुद्र के तलछटी बेसिनों का व्यवस्थित और सटीक नक्शा तैयार किया जाएगा। इसके साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला भूगर्भिक डेटा जुटाने, वैज्ञानिक ड्रिलिंग करने और भविष्य में खोजे जाने वाले भंडारों से उत्पादन व निकासी के लिए साझा इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। इन तमाम प्रयासों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के भीतर ही हाइड्रोकार्बन के नए और बेहतर स्रोतों की समय रहते पहचान की जा सके।
सरकार को पूरी उम्मीद है कि इस दूरदर्शी पहल के परिणाम दूरगामी होंगे। समय के साथ इस योजना के सफल क्रियान्वयन से देश के तेल और गैस के कुल भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तेल के बराबर की भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है। हालांकि इन गहरे समुद्रों से वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने में अभी कुछ वर्षों का समय लग सकता है, लेकिन यह पहल देश की ऊर्जा सुरक्षा को एक नया आयाम देगी। घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से भविष्य में विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी, ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटेगी, नए निवेश आकर्षित होंगे और बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

