
भारत में सिविल सेवा को देश की स्थायी कार्यपालिका का वह आधार स्तंभ माना जाता है, जिसके बिना प्रशासनिक व्यवस्था की कल्पना भी अधूरी है। यह सेवा न केवल सरकार के विभिन्न स्तरों पर कार्यरत स्थायी अधिकारियों का समूह है, बल्कि यह वह महत्वपूर्ण कड़ी भी है जो नीति निर्माण और उसके जमीनी क्रियान्वयन के बीच सेतु का कार्य करती है।
केंद्र और राज्यों में फैली यह प्रणाली भारतीय प्रशासन की रीढ़ कही जाती है, जिसमें अखिल भारतीय सेवाएँ, केंद्रीय सेवाएँ और राज्य सिविल सेवाएँ शामिल होती हैं।
सिविल सेवक सरकार की नीतियों को आम जनता तक पहुँचाने के साथ-साथ सामाजिक आवश्यकताओं की पहचान, नीति विकल्पों का विश्लेषण और विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु सरकार को ठोस सुझाव भी प्रदान करते हैं। वर्ष 2010 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में केंद्र और राज्य सरकारों में लगभग 6.4 मिलियन सरकारी कर्मचारी कार्यरत थे, जिनमें ग्रुप A से लेकर ग्रुप D तक के अधिकारी शामिल थे। इनमें सबसे अधिक कर्मचारी केंद्रीय सचिवालय सेवा और भारतीय राजस्व सेवा (आयकर एवं सीमा शुल्क) में पाए जाते हैं।
ब्रिटिश शासनकाल में भारत की सिविल सेवा की नींव वारेन हेस्टिंग्स ने रखी, जबकि लॉर्ड कॉर्नवालिस ने इसमें सुधार कर इसे आधुनिक स्वरूप देने का कार्य किया। इसीलिए उन्हें भारत में सिविल सेवा का 'जनक' भी कहा जाता है। कॉर्नवालिस ने सिविल सेवाओं को दो भागों कवेनेंटेड और अनकवेनेंटेड में विभाजित किया, जहाँ उच्च पदों पर केवल यूरोपीय अधिकारियों की नियुक्ति होती थी, जबकि भारतीयों को निचले स्तर पर प्रशासन में स्थान दिया जाता था।
वर्ष 1919 के भारत सरकार अधिनियम के बाद प्रशासनिक ढांचे में बड़ा परिवर्तन हुआ, जिसके तहत अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवाओं को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया। 1924 तक आते-आते इन्हें केंद्रीय उच्च सेवाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हुई, जिनमें विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों और सेवाओं का समावेश था। ब्रिटिश काल में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को सबसे अधिक वेतन प्राप्त होता था, और यह स्थिति 1959 तक प्रभावी रही।
ब्रिटिश भारत में महिलाओं की स्थिति सिविल सेवाओं में बेहद सीमित थी। 1858 से 1947 के बीच किसी भी महिला को औपचारिक रूप से इम्पीरियल सिविल सर्विस में उच्च पदों पर नियुक्त नहीं किया गया। महिलाओं को केवल क्लर्क या टाइपिस्ट जैसे निम्न पदों तक ही सीमित रखा गया था, जबकि उच्च प्रशासनिक पदों पर उनकी भागीदारी लगभग नगण्य थी।
स्वतंत्रता के बाद 1947 में भारतीय सिविल सेवा का आधुनिक स्वरूप विकसित हुआ। सरदार वल्लभभाई पटेल की परिकल्पना के अनुसार इसे राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक समन्वय का मजबूत माध्यम बनाया गया। भारतीय सिविल सेवाओं की नींव निष्पक्षता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और योग्यता जैसे मूल्यों पर आधारित रखी गई, जो आज भी इसके मार्गदर्शक सिद्धांत बने हुए हैं।
आज के समय में सिविल सेवकों को आम बोलचाल में 'बाबू' कहा जाता है, जबकि नौकरशाही व्यवस्था को 'बाबूदम' के नाम से जाना जाता है। नई दिल्ली स्थित कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय सिविल सेवाओं के प्रशिक्षण, सुधार और पेंशन संबंधी कार्यों का प्रमुख केंद्र है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 312 राज्यसभा को दो-तिहाई बहुमत से नई अखिल भारतीय सेवाओं के गठन का अधिकार देता है, जिसके अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा जैसी प्रमुख सेवाएँ स्थापित की गई हैं।
सिविल सेवक अपने कार्यों के निष्पादन में निष्पक्षता, संविधान के प्रति निष्ठा, ईमानदारी, राष्ट्रीय गौरव, कर्तव्यपरायणता और पारदर्शिता जैसे मूल्यों से निर्देशित होते हैं। उन्हें अपने पद का दुरुपयोग न करने, जिम्मेदारी से कार्य करने और सामाजिक-आर्थिक विकास में सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है। भारत की सिविल सेवा न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की धुरी है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक संरचना को मजबूती प्रदान करने वाली वह प्रणाली भी है, जो नीति निर्माण से लेकर उसके क्रियान्वयन तक हर स्तर पर निर्णायक भूमिका निभाती है।
